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सोमवार, 10 जनवरी 2011

भेड़ों की दहाड़ से सहमा सिंह

चिड़ियाघर के पिंजरे में बंद सिंह के सामने बच्चे भी आंख दिखा लेते हैं और जंजीरों में बंधे गजराज के आगे चूहे भी कूल्हे मटका लेते हैं। हैरत तो तब होती है जब शेर अपनी मांद में महज इसलिए दुबक जाये, क्योंकि बाहर भेडें बेखौफ दहाड़ रही हैं। जंगल में यह अचरज भरा दृश्य भले ही न दिखता हो लेकिन इस देश के राजनीतिक बियावन में हम अब ऐसे ही दुर्भाग्यपूर्ण घटनाक्रमों को देखने के आदी हो गए है।

क्या अजब हालात हैं। साठ साल से संकल्प समूचा काश्मीर हासिल करने का बना हुआ है और जमीनी असलियत यह है कि अपना घर भी दुश्मन के कब्जे में आता जा रहा है। लाहौर में तिरंगा फहराने के नारे थे और हकीकत यह है कि श्रीनगर में ही राष्ट्रध्वज फहराने में पतलून ढीली हो जा रही है। पाकिस्तान के पालतू हमारे घर में घुसकर गुर्रा रहे हैं, और हमारे पहरेदार हंटर जेब में रख उन्हें शांति के बयानों की बोटियां परोस कर अपने आप को धन्य मान रहे हैं। दुर्भाग्य यह है कि घर का मालिक सब कुछ जान कर भी पक्षाघात का शिकार बना टुकुर-टुकुर बस निहार रहा है। रगों में बह रहे बारह दलों के खून से जिंदा लकवाग्रस्त सरकार से इससे ज्यदा की उम्मीद भी क्या की जाये?

मामला जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर के लाल चौक पर गणतंत्र दिवस पर ध्वजारोहण का है। जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के प्रमुख यासीन मलिक का खुले आम ऐलान है कि जिसमें दम हो वो यहां ‘तिरंगा’ फहराकर दिखलाये।

भारतीय जनता युवा मोर्चा का संकल्प है कि हर हाल तिरंगा फहराया जायेगा।

इस परिदृश्य में बतौर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला मिमिया रहे हैं कि ‘‘अमन बनाये रखने की खातिर तिरंगा न फहराया जाये।’’ आश्चर्य उमर के बयान पर नहीं है, क्योंकि इस तरीके की अवसरवादिता उनकी खानदानी परंपरा रही है।

आक्रोश तो अनेक बैसाखियों के सहारे घिसट रही केन्द्र सरकार के प्रति है और अफसोस है देश के अवाम् की इस खामोशी पर, जिसके अंदर राष्ट के प्रति जज्बा शायद कहीं सो सा गया है।

उमर अब्दुल्ला के इस कदर गैर जिम्मेदाराना बयान को आये अड़तालीस घंटे से भी अधिक समय होने आया है और विरोध में कहीं से कोई दहाड़ तो दूर चूं तक नहीं हुई। अपने देश के सम्मान और अस्तित्व के प्रति हम इतने बेपरवाह-बेखबर हो चले हैं। हजारों जवान अर्से से कश्मीर की सरहद पर अपनी जवानियों को इस दिन को देखने के लिए बर्बाद होने दिये कि देश के भीतर ही अपना राष्ट्रध्वज फहराने के लाले पड़ जायें। क्या इस कीमत पर ‘अमन’ या ‘शांति’ के ख्वाहिशमंद हैं हम। आज तिरंगा न फहराना ‘शांति’ की गारंटी है कल उमर कह सकते हैं कि घाटी में शांति बनाये रखने के लिए मुख्यमंत्री पद की शपथ ‘पाकिस्तानी संविधान’ के तहत लिया जाना जरूरी है। तब भी सरकार और हम ऐसे ही खामोश बने रहेंगे? अंग्रेजी हुकूमत के दौर में हमारे पूर्वजों ने तिरंगा फहराने की कीमत ‘जेल’ और ‘फांसी’ के रूप में क्या इसी दौर को देखने के लिए चुकाई थी। गुलाम भारत में ध्वजारोहण एक चुनौती होना समझ में आता है, लेकिन स्वाधीन भारत में भी इसे ‘नापाक’ करार दिया जाना तो हर देशभक्त के लिए धिक्कार है। तिरेसठ साल की आजादी में ही क्या ‘स्वाराज’

की अकाल मौत हम सुनिश्चित कर चुके हैं? किस दौर में आ गया है देश।

अराजकता, आतंक, अशांति! यह ख्वाहिश तो हमारी भी कभी नहीं रही। लेकिन, क्या शांति हम देश का सम्मान और संप्रभुता को खोकर हासिल करना चाहते हैं?

यदि यही तय कर लिया है तो सरहदों से सेनायें वापिस बुला ली जायें। लद्दाख चीन को और घाटी पाकिस्तान के चरणों में बतौर चढ़ाव चढ़ा दी जाये, क्योंकि अशांति और आतंक के बीज तो वहीं से हमारी मिट्टी में अर्से से फैंके जा रहे हैं। और सत्ता की खातिर हमारे ही अवसरवादी राजनीतिज्ञ ‘अधिक स्वायतता’ जैसे बयानों की खाद-पानी देकर उसे सींचते आ रहे हैं।

अवसाद के इस दौर में अरुंधति और अग्निवेश जैसों की खामोशी खूब याद आती है। आम आदमी की आजादी के यह स्वयंभू पैरोकार ऐसे समय पर अपने मुंह में दही जमाये कहां छिप जाते हैं। जब देश ही आजाद नहीं रहेगा तो नागरिक की आजादी कहां रहेगी। कन्याकुमारी से कश्मीर तक की एक-एक इंच भूमि हमारे राष्ट्रध्वज के ससम्मान फहराने के लिए उपलब्ध रहे, यह किसी एक राजनैतिक दल या नेता का दायित्व न होकर इस देश के हर नागरिक का पावन कर्तव्य है।

बेहतर होगा कि दिल्ली की हुकूमत आदेश जारी कर उमर अब्दुल्ला को निर्देशित करें कि वह अशांति की आशंकाओं को खारिज कर हर कश्मीरी से लाल चौक पर ‘तिरंगा’ फहराने का आह्वान करें। क्योंकि घाटी में शांति की कीमत देश के अपमान के रूप में हरगिज नहीं चुकाई जा सकती।

भाजपा का आह्वान लाल चौक पर ‘भगवा’ फहराने का नहीं ‘तिरंगा’ लहराने का है। वह तिरंगा जो हमारे राष्ट्र के गौरव और समर्पण का सर्वोच्च प्रतीक है।

वक्त की नजाकत का तकाजा तो यह है कि आह्वान को एक दल के दायरे से बाहर निकालकर सर्वदलीय बनाया जाये और 26 जनवरी का मुख्य समारोह दिल्ली का ‘राजपथ’ न होकर श्रीनगर का ‘लाल चौक’ बनाया जाये। भारत को विश्व की महाशक्ति बनाने का दंभ भर रहे देश के हमारे हुकमरान कम से कम इतना तो ‘साहस’ दिखायें।

मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

मुस्लिम तुष्टिकरण

जिस देश का गृहमंत्री अपने ही देश के बहुसंख्यक समाज को आतंकवादी कहे जबकि वह उसी समाज का हिस्सा है, तो यह सोचना होगा कि वह कहीं मानसिक दिवालियेपन का शिकार तो नहीं हो रहे या फिर इसके पीछे उनका कोई स्वार्थ है। लेकिन इस दिवालियेपन का शिकार तो उस सरकार के मुखिया प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी है जिन्होंने उन लोगों को स्वायत्ताता अर्थात लगभग आजादी का आश्वासन दे दिया है जो भारत का तिरंगा जलाते है, भारत की फौज पर हमला करते है, भारत मुर्दाबाद के नारे लगाते है। किसी भी देश की सरकार के इस प्रकार के बयानो को क्या देशहित मे कहेंगे जो देश को पुन: विभाजन की और धकेल रहे है।

आजादी के समय से ही इस सोच का भारत में विकास होना शुरू हो गया था। वर्तमान सरकार के पितृपुरुष तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरुजी ने इसकी नींव कश्मीर में रखी थी। 20 अक्टुबर 1947 को पाकिस्तानी सेना व कबाईलियो ने कश्मीर पर कब्जा करने के लिये हमला किया महाराजा की सेना के मुस्लिम सिपाहियो ने पाक सेना के साथ चली गयी। पाकिस्तानी सेना के इस हमले का करारा जवाब हमारी फौजो ने देना ही शुरु किया था कि नेहरु जी ने आल इन्डिया रेडियों पर घोषणा कर दी कि भारतीय फौजे जहाँ है वही रुक जाये, हम शान्ति विराम की घोषणा करते है साथ ही जनमत संग्रह का आश्वासन कश्मीरी जनता को देते है। उनकी इस घोषणा के बाद कश्मीर का एक तिहाई क्षेत्र पाकिस्तान के कब्जे में चला गया। तबसे आज तक पाकिस्तान भारत पर निगाहे गढ़ाये बैठा है। हमारी सरकार ने भी कश्मीरियों को भारत से जोड़ने के नाम पर उस राज्य के अन्य क्षेत्र जम्मू और लद्दाख की इतनी उपेक्षा की जिसकी हद नहीं। जरा इन आंकड़ो का ध्यान करें :

- जम्मू कश्मीर राज्य का क्षेत्रफल 1947 में 2,22,236 वर्ग कि.मी. था जो आज घटकर 1,01,387 वर्ग कि.मी. रह गया है। आज पाकिस्तान ने 78,114 वर्ग कि.मी. व चीन ने 42735 वर्ग कि.मी भूमि पर कब्जा किया हुआ है। यह हमारी राजनैतिक कमजोरी का परिणाम है।

- जम्मू का क्षेत्रफल 26,293 वर्ग कि.मी., कश्मीर का क्षेत्रफल 15853 वर्ग कि.मी. व लद्दाख का क्षेत्रफल 59241 वर्ग कि.मी. है।

- जम्मू की जनसंख्या लगभग 25 लाख व कश्मीर की जनसंख्या 24 लाख के आसपास है इसमें से लगभग 5 लाख कश्मीरी पण्डित पूरे देश में विस्थापितों का जीवन बिता रहे है। दोनो क्षेत्रो की लगभग समान जनसंख्या होने के बावजूद 37 विधानसभा सीटे जम्मू में, 4 विधानसभा सीटे लद्दाख में व 46 सीटें कश्मीर में रखी गयी। इन नौ सीटो के अन्तर ने आज तक गैर कश्मीरी और गैर मुस्लिम को जम्मू कश्मीर राज्य का मुख्यमंत्री नहीं बनने दिया। क्या यह बगैर योजना के सम्भव है।

- जम्मू और लद्दाख के साथ यह भेदभाव अन्य क्षेत्रों में भी बरता गया है। जैसे राजस्व प्राप्ति जम्मू से 70 प्रतिशत व कश्मीर से 30 प्रतिशत होती है। लेकिन विकास के नाम पर जम्मू पर 28 प्रतिशत, लद्दाख पर 10 प्रतिशत व कश्मीर पर 62 प्रतिशत खर्च होता है।

- पूरे जम्मू में व्यवस्था देखने के लिये 4 कमिश्नर है जबकि कश्मीर में 31 कमिश्नर/सचिव है।

- रोजगार के नाम पर केवल 10 प्रतिशत कर्मचारी ही जम्मू से प्रशासनिक सेवाओं में है जबकि कश्मीर से 90 प्रतिशत।

- केन्द्र सरकार से सम्बन्धित सभी विभागों एवं 13 राज्य निगमों के मुख्यालय कश्मीर में है जिसमें सभी कर्मचारी कश्मीरी है।

इस तुष्टिकरण के बाद भी कश्मीर शांत नहीं है। कश्मीर घाटी का यह विवाद जिसका खामियाजा आज पुरा भारत आतंकवाद के रुप में भुगत रहा है, इसे प्रधानमंत्री स्वायत्ताता के नाम पर हवा दे रहे है। क्या यह भारत को पुन: विभाजन की और धकेलना नही है।

क्या यह तुष्टिकरण कभी रुकेगा जिसके अनुगामी केवल नेहरू गांधी वंशज ही नही अन्य नेता भी हो रहे है। मुस्लिम तुष्टिकरण के नाम पर शुरू हुये इस सत्ता के खेल ने आज हिन्दु समाज को भी भगवा आतंकवादी करार दे दिया है। कहीं इस तुष्टिकरण ने हिन्दु समाज को एक समुह मे इकठ्रठा कर दिया तो नेहरू गांधी वंशज व उनके विचार के अनुगामी नेता सोच ले उनका किया हश्र होगा।


बस एक सरदार (पटेल )चाहिए कश्मीर के लिये

कश्मीर में अब निर्णय की उम्मीद दिखेगी इस आस में हम २७ अक्टूबर १९४७ से प्रतिक्षारत है। पाकिस्तान ने अपनी फौज को छदम रूप में भेजकर उस समय तक अधर में लटके कश्मीर को हड़पने की साजिश रची थी। तब से लेकर आज तक कश्मीर की बीमारी दूर होने के बजाय कुछ ऐसे बढ़ी जैसे के ज्यों –ज्यों इलाज किया मर्ज बढाता ही गया। आजादी के पहले के कश्मीर राज्य का लगभग पैंतालीस प्रतिशत भारत के पास है। पैंतीस प्रतिशत नापाक, पाक के कब्जे में है और बचा हुआ लगभग बीस प्रतिशत चीन ने अवैध रूप से दबा रखा हैं। भारतीय कश्मीर के भी तीन भाग है ,जम्मू में हिंदुओं का बाहुल्य है तो लद्दाख में बौद्ध धर्म के अनुयायी बहुतायात में है और कश्मीर घाटी मुस्लिम बाहुल्य है।

पाक कश्मीर को छोड़े तो भारतीय हिस्से में भी तीन तरह की विचार धारा वाले लोग है। एक पक्ष भारत में ही रहना चाहता है ,दूसरा पक्ष पाकिस्तान के साथ अपना भविष्य उज्जवल देखता है वही तीसरा धड़ा कश्मीर को एक अलग राज्य के रूप में स्वतंत्र किये जाने की मांग करता है। इस त्रिकोण में कश्मीर के अच्छे लोग और पर्यटन का प्रमुख व्यवसाय घुट-घुट कर मरणासन्न स्तिथि में आ चुका है। ये अलगाववादी लोग और इनके कार्यकर्ता अपने आप को आतंकवादी के स्थान पर तथाकथित स्वतंत्रता सेनानी मानते है और ऐसा प्रचार भी करते है। अफज़ल गुरु को आज भी ये अतिवादी आतंकवादी नहीं मानते और उसे कश्मीर के कथित स्वतंत्रता की मुहिम का सिपाही प्रचारित करते है। इस विचारधारा से संघर्ष एक बड़ी चुनौती बन गया है।

सैंतालीस में महाराजा हरि सिंह के भारत में शामिल होने के निर्णय में २० अक्टूबर से २७ अक्टूबर तक का समय निकल गया और इतनी देर में पाक ने पैंतीस प्रतिशत भू-भाग पर कब्ज़ा कर लिया, जो सिद्धांत रूप से गलत है। क्योंकि महाराजा ने पूरे कश्मीर का विलय भारत में चाहा था, विभाजित कश्मीर का नहीं। इसके बाद धीरे–धीरे घाटी से मुस्लिमों के अतिरिक्त अन्य धर्मावलंबियों को छल से या बल से बाहर कर दिया गया। आज भी ऐसे कई परिवार है जो कश्मीर में अपनी जमीन–जायदाद छोड़कर देश के कई भागों में शरणार्थियों के रूप में जी रहें है।

भारत पाकिस्तान का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ था, और दुनिया में सिर्फ इस विभाजन को छोड़ दे तो सभी जगह भूमि के साथ जनता ने अपने को विभाजित किया है, बुल्गारिया –तुर्की ,पौलैंड –जर्मनी ,बोस्निया –सर्बिया सहित पाकिस्तान और बंगलादेश ने भी विभाजन के बाद अन्य धर्मों के लोगो को बाहर का रास्ता दिखा दिया या फिर पीड़ित और प्रताडित किया। घाटी में मुस्लिम आबादी की अधिकता को देखकर पाकिस्तान इस पर अपने दांत गडाये बैठा है ,तो हमारे धर्मनिरपेक्ष स्वरुप के कारण ये हमारे लिए भी प्रतिष्ठा की बात है। सैंतालीस से कारगिल तक और आज भी इस भूमि पर स्वामित्व का संघर्ष जारी है। लेकिन ये प्रतिष्ठा की लड़ाई अब तक ना जाने कितने ही मानव और अर्थ संसाधन लील चुकी है और नतीजा सिफर है। कश्मीर में कानून –व्यवस्था राज्य सरकार का जिम्मा है फिर केंद्र सरकारों को भी अपनी पूरी दम–ख़म का इस्तेमाल करना पड़ रहा है।

कश्मीर उस सोये हुए ज्वालामुखी के सामान हो गया है ,जो अचानक कभी भी फट पड़ता है और परेशानी इस बात की है कि कोई भी इसकी तीव्रता का अंदाज नहीं लग सकता। कांग्रेस और मुफ्ती सईद की पिछली सरकार के समय ये ज्वालामुखी लगभग शांत सा बना रहा और पर्यटकों ने फिर कश्मीर को अपने कार्यक्रमों में शामिल कर लिया था, लेकिन कांग्रेस के हिस्से की सरकार के दौरान अमरनाथ यात्रा से उपजे विवाद ने जो माहौल खराब किया,तब से लेकर अब तक दिन –ब –दिन हालात खराब होते जा रहें है और उसे उमर अब्दुल्ला की वर्तमान सरकार भी नहीं सम्हाल पा रही है। इस आग में घी का कम एक लेखिका के बयान ने कर दिया जो सदा ही नक्सलियों और अलगाववादियों के साथ है। ,इस बयान की ध्वनि और अलगाववादियों के सुर एक से लगते है, जो किसी भारतीय को ललकारते से प्रतीत हो रहें है। सर्व –दलीय संसदीय दल के दौरे के विफलता के बाद नियुक्त तीन वार्ताकारों से कुछ आस बंधी थी के ये गैर राजनीतिक लोग शायद कुछ कर सके पर अफ़सोस की ऐसा कुछ भी नहीं दिख रहा। इन नव नियुक्त वार्ताकारों का दल भी असफलता के पथ पर जाते दिख रहा है।

भारत में कम्युनिस्ट मांग कर रहें है के कश्मीर के लिए एक विधिवत गठित संसदीय समित हो जो कश्मीर और जम्मू में लोगों से बात करे साथ ही विशेष सेना शक्ति अधिनियम को वापस लिया जाये, क्यो कि इस अधिनियम की आड़ में सेना कथित रूप से मानव अधिकारों का हनन का करती है, यद्यपि ये अधिनियम उत्तर-पूर्व के राज्यों में भी लागू है। इस तरह से सरकार में शामिल दलों और विपक्षी दलों की सोच भी एकरूप नहीं है।

अमरीकी राष्ट्रपति की भारत यात्रा ने इस विवाद को और भी गरमा दिए है और कश्मीर के अलगाववादियों ने ओबामा से बहुत उम्मीद बांध रखी है। हुर्रियत कांफ्रेंस ने तो ब-कायदा ५ नवम्बर तक एक हस्ताक्षर अभियान भी चलाया है ,इन हस्ताक्षरों को ६ नवम्बर को दिल्ली में अमरीकी दूतावास को सौंपा जायेगा। इस अभियान के द्वारा हुर्रियत अमेरिकी प्रमुख से ये अपील करना चाहती है कि कश्मीर के मसले पर अमरीकी सोच में बदलाव आये और भारत पर ये दवाब बनाया जाये की कश्मीर में जनमत संग्रह कर वह के लोगो की राय के हिसाब से इस मामले को हल किया जाये।

इस समस्या ने इस मिथक को भी तोड़ दिया की विकास की योजनाओं और बुनियादी अवशक्ताओ की पूर्ति से किसी भी समस्या का हल ढूंढा जा सकता है, कश्मीर में वो सब प्रयास विफल रहे है। वो हाथ जो डल झील में नाव चलाते थे, अब पत्थर-बाजी में शरीक है।

इन स्थितियों में तो ऐसा लगता है काश आज सरदार पटेल के कद और राजनीतिक दृढता वाला कोई नेता देश में होता तो अब तक ये विवाद कब का हल हो गया होता। हम एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी बिना नतीजा तक इस समस्या को स्थानान्तरित तो कर ही चुके है। अब तो कोई कड़ा और कड़वा निर्णय ही कश्मीर समस्या का हल दे पायेगा। नहीं तो यह विवाद ऐसे ही धधकता रहेगा और हमारे बहुमूल्य संसाधनों को ईधन के रूप में डकारता रहेगा.

मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010

27 अक्टूबर, 1947: शौर्य और बलिदान की तिथि

जो देश अपने नायकों को याद नहीं रखता वहां भविष्य में नायक जन्म नहीं लेते। अफसोस है कि हम 27 अक्टूबर, 1947 के अपने वीर जवानों को भूल गए हैं। यह कश्मीर के इतिहास और शेष भारत से इसके संबंधों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण तिथि है। इस दिन भारतीय जवानों ने वीरता और शौर्य की नई गाथा लिखी थी। हममें से आज कितनों को एयर कमांडर मेहर सिंह की जाबाजी याद है, जब उन्होंने सामान्य से टेकोटा हवाई जहाज को बिना ऑक्सीजन के 23 हजार फीट की ऊंचाई तक उड़ाया था और इसे 11,555 फीट की ऊंचाई पर लेह की उबड़-खाबड़ हवाई पट्टी पर उतारकर लद्दाख में भारतीय सेना को पहुंचाने का मार्ग प्रशस्त किया था। मेजर जनरल केएस थिमैया ने 11,578 फीट की ऊंचाई पर बर्फ से ढके जोजिला दर्रे पर टैंक ले जाने का अद्भुत कारनाम कर दिखाया था। इसकी तुलना हनीबल द्वारा अपने हाथियों के साथ एल्प्स पर्वतमाला को लांघने से ही की जा सकती है।
आज शायद ही कोई इन घटनाओं को सलाम करता हो, किंतु सच्चाई यही है कि अगर ये अधिकारी इन साहसिक कारनामों को अंजाम न देते तो आज लद्दाख का विशाल भूभाग भी गिलगित और बाल्टिस्तान की तरह पाकिस्तान के हाथ में होता। क्या यह हमारे इतिहासबोध और एक गौरवशाली राष्ट्रनिर्माण की प्रेरणा पर दुखद टिप्पणी नहीं है? स्मरण होना चाहिए कि स्वतंत्रता के बाद सिद्धांत रूप में तमाम राज्य खुद को आजाद घोषित करने के लिए स्वतंत्र थे, किंतु व्यवहार में भारत या पाकिस्तान के साथ मिलना उनकी मजबूरी थी। तत्कालीन गृह सचिव लॉर्ड लिस्टोवेल ने इसे स्पष्ट किया था, 'ब्रिटिश सरकार किसी भी राज्य को प्रथक अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्रदान नहीं करेगी।' जून में लॉर्ड माउंटबेटन महाराजा हरिसिंह से उनकी इच्छा जानने श्रीनगर गए थे, किंतु महाराजा ने अपने पत्ते नहीं खोले। बाद में माउंटबेटन ने बताया, 'एकमात्र समस्या यह उठ सकती है कि कश्मीर किसी भी तरफ न जाए और दुर्भाग्य से महाराजा इसी रास्ते पर चल रहे थे।' हालांकि जिन्ना और उनके सलाहकारों ने धोखाधड़ी, हमले और घुसपैठ के माध्यम से राज्य पर कब्जा जमाने के प्रयास में जरा भी समय नहीं गंवाया। कागजों पर 15 अगस्त 1947 से ही पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में यथा-स्थिति समझौता किया हुआ था, किंतु असलियत में उसने कड़े आर्थिक प्रतिबंध थोप दिए। पाकिस्तानी समाचार पत्र डॉन के 16 अक्टूबर के अंक में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, 'कश्मीर सरकार गिर रही है। इसे अपने चार करोड़ के बजट में से दो करोड़ का पहले ही घाटा हो चुका है। कीमतों में जबरदस्त बढ़ोतरी से लोगों में असंतोष व्याप्त है।'
इससे पहले, जिन्ना ने अपने निजी सचिव को कश्मीर में भेजकर अपने पक्ष में माहौल तैयार करना शुरू कर दिया था। जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री एमसी महाजन के अनुसार, 'सांप्रदायिक सोच वाले लोगों और मुसलमानों को तैयार किया गया कि वे महाराजा पर कश्मीर के पाकिस्तान में विलय का दबाव डालें।' 23 अक्टूबर को ट्रिब्यून में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, 'पश्चिम पंजाब और फ्रंटियर पाकिस्तान के आततायी कश्मीर में घुस गए और छूरेबाजों व बंदूकचियों के दल बनाने लगे। इस सबमें जिन्ना का हाथ प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा था।' करीब-करीब इसी समय सीमा पर धावा बोल दिया गया ताकि राज्य की शक्तियों को छितराया जा सके। तब कश्मीर के पास महज नौ बटालियनें और दो माउंटेन बैटरीज थीं। 22 अक्टूबर से कबीलाई हमला बोल दिया गया, जिसे पाकिस्तान संचालित कर रहा था। कबीलाइयों का नेतृत्व पाकिस्तान का मेजर जनरल अकबर खान कर रहा था, जिसे कूट नाम जनरल तारिक दिया गया था। राज्य प्रशासन की तैयारी इतनी कम थी कि वह विस्फोटकों के अभाव में कृष्णा-गंगा पुल को नहीं उड़ा पाया। ब्रिगेडियर राजिंदर सिंह की कमान में राज्य के सुरक्षा बलों ने उड़ी में आखिरी सैनिक और आखिरी गोली तक बड़ी बहादुरी से मोर्चा लिया, यद्यपि उन्हें मुसलमान सैनिकों के विद्रोह का सामना करना पड़ रहा था। इस प्रकार उन्होंने हमलावरों को दो महत्वपूर्ण दिनों तक आगे नहीं बढ़ने दिया। ब्रिगेडियर राजिंदर सिंह एक हीरो की तरह शहीद हुए और उनके मूल्यवान सहयोग से राज्य को बचा लिया गया।
24-26 अक्टूबर को बारामूला पर हमलावरों का कब्जा हो गया। अपनी बर्बर प्रवृत्ति के कारण उन्होंने वहां बड़े पैमाने पर लूटपाट, आगजनी, दुष्कर्म और मार-काट मचानी शुरू कर दी। हमलावर नहीं जानते थे कि वे जो जघन्य अपराध कर रहे हैं उसकी सजा उन्हें मिलनी है। इसी मारकाट के कारण महाराजा 27 अक्टूबर को कश्मीर के भारत में विलय पर राजी हो गए और उन्होंने भारत से सहायता की मांग की। 27 अक्टूबर को भारतीय वायु सेना का लड़ाकू विमान श्रीनगर के हवाई अड्डे पर उतरा, जिसमें लेफ्टिनेंट कर्नल रंजीत राय के नेतृत्व में भारतीय सैनिकों की पहली टुकड़ी थी। कर्नल राय ने तुरंत अपनी टुकड़ी को बारामूला की तरफ कूच करने का आदेश दिया। इस खूनी जंग में उन्हें अपनी जान गंवानी पड़ी। 3 नवंबर को एक और साहसी कदम में मेजर सोमनाथ शर्मा ने बडगाम में हमलावरों से टक्कर ली। हमलावरों की तुलना में उनकी संख्या सात के मुकाबले एक थी। फिर भी उन्होंने अदम्य साहस का प्रदर्शन करते हुए दुश्मनों को भारी नुकसान पहुंचाया। इस लड़ाई में उन्हें अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।
जब हमलावर श्रीनगर के बाहर तक पहुंच गए थे और लेफ्टिनेंट रंजीत राय और मेजर सोमनाथ शर्मा शहीद हो चुके थे तब रक्षा मंत्री बलदेव सिंह के साथ गृहमंत्री सरदार पटेल राज्य की राजधानी पहुंचे और हालात का जायजा लिया। दिल्ली लौटकर उन्होंने श्रीनगर के ऊपर तमाम हवाई जहाजों की उड़ानें प्रतिबंधित कर दीं। यहां तक कि कश्मीर की रक्षा के लिए भारतीय सेना के इस्तेमाल का महात्मा गांधी ने भी तत्परता से अनुमोदन किया। भारतीय सेना को समय पर मिली मदद के कारण ब्रिगेडियर सेन हमलावरों को भारतीय सेना के जाल में फंसाने में कामयाब हो गए और 5 नवंबर को शलतांग के निकट उन पर तीन तरफ से हमला बोल दिया गया। करीब छह सौ हमलावर मारे गए और घाटी को बचा लिया गया। सोमनाथ शर्मा, रंजीत राय और राजिंदर सिंह जैसे वीरों का बलिदान और मेहर सिंह व थिमैया जैसे जाबाजों का अप्रतिम शौर्य बेकार नहीं गया है। हमें साल में कम से कम एक बार उन्हें सलाम करना नहीं भूलना चाहिए। अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी का कथन हमेशा याद रखना चाहिए, 'एक राष्ट्र खुद का आकलन उन लोगों के आधार पर करता है जिनका वह सम्मान करता है, जिन्हें वह याद रखता है।'
[27 अक्टूबर 1947 को कश्मीर में भारतीय सैनिकों की वीरता को याद कर रहे हैं जगमोहन]

सोमवार, 25 अक्टूबर 2010

दिल्ली में कश्मीर आज़ादी के नारे- Aal iz well

पिछले दिनों कश्मीर के मुद्दे पर दिल्ली में एक सेमिनार करवाया गया जिसका विषय था- "आज़ादी: एक ही रास्ता", इस सेमिनार में कश्मीर के अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी, माओवादियों के प्रति सहानुभूति रखने वाले तेलुगू कवि वरवर राव, लेखिका अरुंधति रॉय जैसे लोगों ने हिस्सा लिया, ये लोग कौन है और इनका अतीत कैसा रहा है ये हमसे छुपा नहीं है, इन लोगो का चयन वाकई शानदार है, न तो इनका विश्वास भारत में है और न ही भारतीयता में, ऐसे भारत की राजधानी में बैठ कर भारत विरोधी उवाच, धन्य है हिंदुस्तान और इसकी उदारता आखिरकार भारतीय संविधान देश के सभी नागरिकों को बोलने की आज़ादी का अधिकार देता है.

बहुत सारे लोग बुश को एक राक्षश के रूप में मानते है , हो सकता है की वो हो भी, पर सच ये भी है की अमेरिका अब ज्यादा सुरक्षित है, सलमान खान से जब ये पूछा गया की अमेरिका में एयरपोर्ट पर इतनी चेकिंग होती है तो उन्हें बुरा नहीं लगता तो उन्होंने कहा की “नहीं”, काश अपने यहाँ भी ऐसा होता कम से कम सुरक्षा की गारंटी तो मिलती, बुश ने जिस तरह स्पष्ट शब्दों में दुनिया से ये कहा (चेतावनी) था की या तो आप हमारे साथ है, या हमारे खिलाफ, उसने अमेरिका की मानसिकता को बताया था, बताया था की एक राष्ट्र अपनी सुरक्षा, एकता और अखंडता के लिए कितना ढृढ़ है, मुझे लगता है राष्ट्रीय एकता, अखंडता और नागरिक सुरक्षा के मामले में हम एक रीढविहीन देश है

खैर लौटते है पुरानी चर्चा पर, विचारों की स्वतंत्रता का महत्व है यह माना, ये भी माना की हमारे लोकतंत्र में हमें ये आज़ादी मिली है की हम सरकार और यहाँ तक की स्टेट के खिलाफ भी भावना और विचारो की अभिव्यक्ति कर सकते है, लेकिन देशद्रोहियों को देश की राजधानी में पाकिस्तान का प्रचार और भारत विरोधी नारे लगाने की की इजाजत देना केवल मूर्खता ही कही जायेगी। गिलानी और अरुंधती राय के जहरीले राष्ट्रीय बयानों पर न तो सरकार ने पहले भी कुछ किया था और अब भी ढुलमुल रवैया ही है , बिडम्बना यह थी कि इसी जगह प्रदर्शन कर रहे रूट्स इन कश्मीर, भारतीय जनता युवा मोर्चा के लडको को लाठियो से मार कर भगा दिया गया. हो सकता है की उनके विरोध प्रदर्शन का तरीका गलत हो, हो सकता नहीं माना की उनका तरीका गलत था, लेकिन अब आपको ये चुनना ही होगा की कोई बाहरी ताकतों का एजेंट आपको आकर आपकी जगह पर गाली दे और आपके अपने लड़के जब उसका विरोध करे तो आप किसके हितो की रक्षा करेंगे.... अफ़सोस की ज्यादातर मीडिया ने इस घटना पर विशेष ध्यान नहीं दिया

हकीकत ये है की गिलानी समेत इन तमाम लोगो ने घाटी को तालिबान के रंग में रंग दिया है, ध्यान रहे की ये रंग इस्लाम का रंग हरगिज़ नहीं है, ये रंग है सामंती तालिबानी इस्लाम का, कश्मीर के तालिबानीकरण ने वहां की पुरानी सूफी परम्परा को भी ध्वस्त कर दिया है। वहाबी मुस्लिम कट़टरवाद ने घाटी में हिन्दू मुस्लिम एक्य के तमाम पुलों को ही तोड़ दिया है। अगस्त में मै जम्मू में था, जो थोडा बहुत पता लगाया पाया या जितना मैंने देखा उसके पता चला की घाटी में हिन्दू महिलाओं का बाजार में बिन्दी लगाकर चलना असंभव हो गया है, हिन्दू पुरूष और महिलाएं अपनी पहचान छिपा कर चलना ज्यादा मुनासिब और सुरक्षित मानते हैं। श्रीनगर में पहले हजारो की संख्या में हिन्दू परिवार थे। आज वहां सिर्फ बीस-तीस परिवार ही बचे हैं। उन्हें भी निकल जाने के लिए पिछले साल धमकियां मिली थीं। जब स्थानीय कश्मीरी हिन्दू संगठनों के नेता पुलिस अधिकारियों से मिली तो उन्होंने उनकी मदद करने से कदम पीछे हटा लिए। एक वरिष्ठ अधिकारी ने उनसे कहा कि यदि आपको सच में हिफाजत चाहिए तो आप सैयद अली शाह गिलानी के पास जाएं। मजबूर होकर वे हिन्दू गिलानी के पास गये तो उन्हे हिफाजत मिली। इस प्रकार अलगाववादी नेता अपनी शर्तें सिख व हिन्दू परिवारों से भी मनवाने में कामयाब रहते हैं। पूरे कश्मीर में एक ज़माने में करीब डेढ़ लाख से अधिक रहने वाले सिख्खो में से बचे खुचे पच्चास हजार सिखों को इस्लाम कबूल करने वरना घाटी छोड़ने की धमकी मिली, ये धमकी उसी सिलसिले के तहत है जिसके अन्तर्गत पहले सात सौ से अधिक मन्दिर तोड़े गए , पांच लाख हिन्दुओं को निकाला गया , लद्दाख के बौद्धों को सताया और छितीसिंह पुरा जैसे सिख नरसंहार किए गए। दिल्ली में भी गिलानी के साथ स्टेज पर एक सरदार को बैठे देखा तो सोचा धन्य है "भय" और उसकी "सत्ता".

वैसे गिलानी एंड कंपनी की प्लानिंग शानदार है, इस वक़्त कश्मीर की जिंदगी में में पत्थरबाजी, आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाएं आम बात है। नवजवानों में सुरक्षाबलों के खिलाफ ज़हर और आक्रामकता पैदा की जा रही है। जानबूझकर ऐसी स्थिति गिलानी एंड कंपनी बना रही है की सुरक्षाबलों को आत्मरक्षा के लिए गोली चलानी पड़े - वे पहले पानी की बौछार फेंकते हैं, फिर रबर की गोलियां चलाते हैं। रबर की गोली भी यदि नजदीक से लगती है तो जानलेवा साबित हो सकती है , ऐसे में कोई पत्थरबाज लड़का मारा जाता है तो उसकी प्रतिक्रिया में और हिंसा भड़कती है और इस प्रकार एक दुष्चक्र चल पड़ता है और चलती रहती है गिलानी एंड कंपनी की दूकान भी .

इसी कम्पनी में एक महिला भी है जिनके बारे में जम्मू-राजधानी के सफ़र में मुझे पता चला, इनका नाम है “असिया अन्दराबी”। यह मोहतरमा कश्मीर की आज़ादी के आंदोलन (?) की प्रमुख नेता मानी जाती हैं, एक कट्टरपंथी संगठन भी चलाती हैं जिसका नाम है “दुख्तरान-ए-मिल्लत” (धरती की बेटियाँ)। अधिकतर समय यह मोहतरमा अण्डरग्राउण्ड रहती हैं और परदे के पीछे से कश्मीर के पत्थर-फ़ेंकू गिरोह को नैतिक और आर्थिक समर्थन देती रहती हैं। मसला ये है की मैडम ने घाटी के बच्चो से और युवको से शिक्षा के बहिष्कार की अपील की है, यही नहीं स्कूल कालेज जाने वालो को बाकायदा रोकती भी है, न मानो तो रूकवाती भी है, एक बयान में असिया अन्दराबी ने कहा कि “कुछ ज़िंदगियाँ गँवाना, सम्पत्ति का नुकसान और बच्चों की पढ़ाई और समय की हानि तो स्वतन्त्रता-संग्राम का एक हिस्सा हैं, इसके लिये कश्मीर के लोगों को इतनी हायतौबा नहीं मचाना चाहिये… आज़ादी के आंदोलन में हमें बड़ी से बड़ी कुर्बानी के लिये तैयार रहना चाहिये…”...क्या बात है........., आपको लग रहा होगा की कश्मीर की आज़ादी के लिये मैडम कितनी समर्पित नेता हैं.............लेकिन 30 अप्रैल 2010 को जम्मू-कश्मीर के उच्च न्यायालय में दाखिल दस्तावेजों के मुताबिक इस फ़ायरब्राण्ड नेत्रीअसिया अन्दराबी के सुपुत्र मोहम्मद बिन कासिम ने पढ़ाई के लिये मलेशिया जाने हेतु आवेदन किया है और उसे “भारतीय पासपोर्ट” चाहिये… चौंक गये, हैरान हो गये न आप? जी हाँ, भारत के विरोध में लगातार ज़हर उगलने वाली अंदराबी के बेटे को “भारतीय पासपोर्ट” चाहिये… और वह भी किसलिये? बारहवीं के बाद उच्च अध्ययन हेतु…। यानी कश्मीर में जो युवा और किशोर रोज़ाना पत्थर फ़ेंक-फ़ेंक कर, अपनी जान हथेली पर लेकर 200-300 रुपये रोज कमाते हैं, उन गलीज़ों में उनका “होनहार” शामिल नहीं होना चाहता… न वह खुद चाहती है, कि कहीं वह सुरक्षा बालो के हाथो मारा न जाये…। कैसा पाखण्ड भरा आज़ादी का आंदोलन है यह? एक तरफ़ तो कई महीनो कश्मीर के स्कूल-कॉलेज खुले नहीं हैं जिस कारण हजारों-लाखों युवा और किशोरो ने अपनी पढ़ाई का नुकसान झेला, इनके चक्कर में आकर बेचारे 200-300 रुपये के लिए पत्थर फ़ेंक रहे हैं… और दूसरी तरफ़ यह मोहतरमा लोगों को भड़काकर, खुद के बेटे को विदेश भेजने की फ़िराक में हैं…

इसी तरह के तमाम ड्रामो से भरी है ये गिलानी और इसकी कम्पनी..... नेशनल मीडिया में बैठे तमाम तत्वों को कश्मीर की कलह दिखती है पर लाखो की तादात में कश्मीर से विस्थापित हुए लोगो का दर्द कभी नहीं, आज विस्थापित जम्मू में जिस तरह रह रहे है- वो इन्हें कभी द्रवित नहीं करता.. दिल्ली में गिलानी और अरुंधती राय जैसे भारत विरोधी तत्वों की उपस्थिति और उनके जहर बुझे बयान यदि किसी दूसरे देश में हुए होते तो या तो सरकार कड़े से कड़ा कदम उठाती जिसमे जेल में डालना शायद सबसे सरल कदम होता, और अगर सरकार ऐसा न करती तो जनता में इतना गुस्सा उमड़ता कि सरकार पलट जाती, पर धन्य है हम, ……वैसे भी "आल इज वेल" हमारा नया नारा है, लेकिन ये सवाल आपके लिए ज़रूर है की आखिरकार गिलानी और अरुंधती के भारत विरोधी बयान क्या विचार स्वतंत्रता की श्रेणी में आते हैं , और क्या उन्हें इतनी सरलता के साथ स्वीकार किया जाना चाहिए था. खैर छोडिये, चलिए पता लगते है की ये साले संघी अब देश को कौन सा नुक्सान करने वाले है .अंत में Aaal iz well , Aaal iz well, Aaal iz well, Aaal iz well

गिलानी के आज़ाद कश्मीर फ्री बंटेगी शराब

"राज करेगा गिलानी " हम क्या चाहते आज़ादी जैसे नारों के बीच दिल्ली के एल टी जी सभागार आज़ाद कश्मीर का मनोरम दृश्य प्रस्तुत कर रहा था लेकिन गुस्साए कश्मीरी पंडित के नौजवान बन्दे मातरम का नारा लगाकर आज़ादी के इस महान उत्सव का रंग फीका कर रहा था .आज़ादी द ओनली वे के इस महान जलसे मे सैयद अली शाह गिलानी अपने आज़ाद कश्मीर मे न्याय और कानून व्यवस्था पर कुछ इस तरह प्रकाश डाल रहे थे "आजाद कश्मीर मे बहुसंख्यक मुसलमानों को शराब पीने की इजाजत नही होगी यानि वे शरियत के कानून से बंधे होंगे जबकि दुसरे हिन्दू ,सिख और बौध तबके को शराब पीने की पूरी आज़ादी होगी .वे जहाँ और जब चाहे शराब पी सकते है और कानून इतना सख्त होगा कि अगर धोके मे भी कोई मुसलमान किसी के शराब की बोतल तोड़ेगा तो उसे इसका हर्जाना देना होगा ." .गिलानी साहब के इस आज़ादी को समर्थन करने अरुंधती राय के आलावा देश के कई नामी अलगाववादी नेता इस समारोह मे जमा हुए थे .खालिस्तान के समर्थक से लेकर माओवाद के समर्थक ,मिज़ो विद्रोही से लेकर नागा विद्रोही हर ने भारतीय अस्मिता को रौंदते हुए भारत की संप्रभुता और अखंडता पर सवाल उठाने मे कोई कसर नही छोड़ी .क्योंकि ये भारत है, क्योंकि प्रजातंत्र मे इन्हें कुछ भी बोलने किसी भी मत का प्रचार करने का पूरा हक है .देश का कानून भले ही इसका इजाजत नही दे लेकिन फिर बुद्धिजीवी कहलाने का मतलब क्या होगा अगर इन्होने कुछ अलग नही कहा .सो खालिस्तान समर्थक बुद्धिजीवी ने इंडिया एज ए नेशन को बकवास करार दिया तो गिलानी ने अपनी तुलना सुभाष चन्द्र बोस से की .अरुंधती राय ने देश के तमाम अलगाववादियों और विद्रोहियों से कश्मीर को आजाद कराने और गिलानी के हाथ मजबूत करने की अपील की .कई नामी गिरामी प्रोफेसर कई नामी गिरामी भुत पूर्व उग्रवादी भारत के खिलाफ जहर उगलकर गिलानी के समर्थन मे महान ऐतिहासिक तथ्यों को प्रस्तुत करते नज़र आये .इस विहंगम दृश्य का अवलोकन मेरे जैसे नाचीज पत्रकार और सैकड़ो की तादाद मे उपस्थित कानून के पहरुए भी कर रहे थे लेकिन सबकी अपनी जिम्मेदारी थी अपना ज्ञान बढ़ाने के अलावा और कोई चारा नही था ,ऐसी ही कुछ मजबूरी गृह मंत्री चिदम्बरम की भी थी जो पहले तो राजधानी दिल्ली मे इस तरह के सम्मलेन पर चुप रहे अब कारवाई की बात कर रहे है लेकिन जम्मू के जसविंदर को प्रो सुजाता भद्रो की बात बेहद अपमानित लगा तो उसने मंच पर अपना जूता उछाल दिया .जसविंदर को पुलिस ने तुरंत गिरफ्तार कर लिया था लेकिन वह यह जरूर बता गया कि जम्मू कश्मीर का मतलब सिर्फ गिलानी नही है .
जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री ओमर अब्दुल्ला ने इस घटना की निंदा करते हुए जम्हूरियत मे सबको अपनी बात रखने और बोलने की आज़ादी का सम्मान करने की नशिहत दे डाली .लेकिन दो दिन पहले मुख्यमंत्री अब्दुल्ला की विजय पुर रैली मे किसी ने ओमर अब्दुल्ला के कश्मीर पर दिए गए बयान की निंदा करने की कोशिश की तो पुलिस ने मुख्यमंत्री के सामने उसकी जमकर धुनाई कर दी.शायद धारा ३७० मे किसी को मुख्यमंत्री के खिलाफ बोलने की आज़ादी नही है .इसी धारा ३७० की व्याख्या करते हुए ओमर अब्दुल्ला कहते है कि रियासते जम्मू कश्मीर का पूर्ण विलय अभी भारत के साथ नही हुआ है .अब्दुल्ला मानते है कि भारत के साथ जम्मू कश्मीर का इह्लाक कुछ शर्तों के साथ हुआ था .ओमर अब्दुल्ला आज वही बात कह रहे है जो ७० के दौर मे उनके महरूम दादा शेख अब्दुल्ला ने कहा था .तो क्या ओमर अब्दुल्ला मान रहे है कि कश्मीर मे सियासत भारत के खिलाफ माहोल बनाकर ही की जा सकती है या अपनी निष्क्रियता को छिपाने के लिए ओमर अब्दुल्ला ने भारत विरोधी बयानों का सहारा लिया है .
रियासत जम्मू कश्मीर का भारत मे विलय मुल्क के ६०० राजे रजवाड़े के विलय की एक कड़ी थी. लेकिन कश्मीर मे मुस्लिम बहुसंख्यक मे थे इसलिए पाकिस्तान यहाँ अपना सियासी आधार लगातार दुढ़ता रहा .उधर कश्मीर के सियासत दा लगातार इस कोशिश मे रहे कि कश्मीर को लेकर भारत पर एक दवाब बना रहे .१९४८ से लेकर १९७५ तक इसी दवाब को जारी रखने के लिए शेख अब्दुल्ला ने कई बार अपना सियासी पैतरा बदला .जब कभी भी कश्मीर मे शेख अब्दुल्ला को अपना अस्तित्वा खतरे मे पड़ते दिखा उसने भारत के खिलाफ जहर उगलना शुरू कर दिया .लेकिन कभी भी कश्मीर मे लोकतंत्र को विकसित नही होने दिया .४०० से ज्यादा बोली ५० से ज्यादा धार्मिक मान्यता मानने वाले लोग ,अलग अलग संस्कृति अलग क्षेत्र अलग पहचान लेकिन रियासत मे सियासत की डोर हमेशा कश्मीर के ७ जिलो के संपन्न सुन्नी मुस्लिम तबके के हाथ रही .तक़रीबन २० फिसद की आवादी वाला यह समुदाय मुख्यधारा की सियासत मे अपनी पकड़ बनाने मे कामयाबी पायी तो कश्मीर मे अलगाववाद की सियासत को इसी तबके ने चलाया .बन्दूक उठाने वाले लोग भी इसी तबके से थे तो मौजूदा दौर मे पत्थर उठाने वाले नौजवान भी इसी तबके से है . सरकार मे आला अधिकारी से लेकर निचले स्तर के अहलकारो मे इसी तबके का बोलवाला है .इस हालत मे यह सवाल उठाना लाजिमी है कि क्या कश्मीर के पंडित समुदाय ,गुज्जर बकरवाल ,सिया समुदाय ,जम्मू के हिन्दू ,लदाख के बौध शायद इसलिए अपनी सियासी आधार मजबूत नही कर पाए क्योंकि इनका लगाव भारत से है या फिर भारत की सियासत ने इन्हें अपना मानकर इन्हें त्रिस्क्रित कर दिया है .कश्मीर के लोग अपना ऐतिहासिक आधार राज्तार्न्गिनी मे ढूंढ़ते है .वे अपने को भारत की परंपरा की एक मजबूत कड़ी मानते है .क्या इस ऐतिहासिक तथ्य को झुठलाया जा सकता है .क्या आज़ादी की बात करने वाले लोगों को नही पता है कि वे जिस संयुक्त राष्ट्र का हवाला देते है उसके रेजोलुसों मे भारत या पाकिस्तान किसी एक को चुनने की बात की गयी है .आज़ादी वहां कोई विकल्प नही है .क्या उन्हें नही पता कि जनमत संग्रह कराने के लिए पाकिस्तान कभी तैयार नही होगा क्योंकि उसे अपने कब्जे के कश्मीर से अपनी फौज हटानी होगी .आज गिलगित बल्तिस्तान पाकिस्तान का एक प्रान्त का दर्जा पा चुका है तो पाकिस्तान मक्बुजा कश्मीर की पूरी आवादी ही बदल गयी है .लेकिन फिर अगर गिलानी रायशुमारी की बात कर रहे है तो जाहिर है वे कश्मीर के लोगों को गुमराह कर रहे है .ऐसी गुमराह करने वाली बाते ओमर अब्दुल्ला भी कर रहे है तो इनकी सियासत को समझा जा सकता है .
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वाकई मे भारत के आमलोगों को कश्मीर की जरूरत है .क्या कश्मीर की अपार खनिज संपदा भारत को आर्थिक ताक़त बना सकता है ?आज भारत के आर्थिक संसाधन का सबसे ज्यादा उपयोग कश्मीर के लोग कर रहे है .भारत की आर्थिक संसाधनो की सबसे ज्यादा लूट इसी कश्मीर मे है लेकिन यहाँ के सियासतदान इस लूट को छिपाने के लिए भारत जब तब नशिहत भी देते है .पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला कहते है कि रियासत अपने संसाधनों से अपने कर्मचारियों को एक महीने की तनख्वा भी नही दे सकती है इस संसाधन से आम लोगों की तरक्की की बात तो सोची भी नही जा सकती लेकिन फिर भी फारूक साहब को ऑटोनोमी चाहिए तो गिलानी को आज़ादी .भारत के पैसे से फारूक साहब बनायेंगे खुशहाल कश्मीर ? तो पाकिस्तान के पैसे से गिलानी साहब बाटेंगे फ्री शराब ...

पूर्ण विलय के पश्चात जनमत संग्रह का औचित्य?

जम्मू-कश्मीर में आत्मनिर्णय या जनमत संग्रह कराने की मांग का कहीं कोई औचित्य नहीं है। ये मांगें किसी भी प्रकार से न तो संवैधानिक हैं और न ही मानवाधिकार की परिधि में ही कहे जाएंगे। अलगाववादियों द्वारा इस विषय को मानवाधिकार से जोड़ना केवल एक नाटक भर है। क्योंकि इससे विश्व बिरादरी का ध्यान ज्यादा आसानी से आकृष्ट किया जा सकेगा। यह सारा वितंडावाद विशुद्ध रूप से कश्मीर को हड़पने के लिए पाकिस्तानी नीति का ही एक हिस्सा है।

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के भारत आगमन से पूर्व पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी गतिविधियों में यकायक बढ़ोतरी हुई है। यहाँ तक कि कश्मीर घाटी के अलगाववादी संगठन और उसके नेता भी ज्यादा सक्रिय दिखने लगे हैं। अलगाववादी हुर्रियत नेता गिलानी का नई दिल्ली में “आजादी ही एक मात्र रास्ता” विषयक सेमीनार में शिरकत करना विश्व बिरादरी का ध्यान आकृष्ट कराने के अभियान का ही एक हिस्सा है। सेमीनार की खास बात यह रही कि इसमें कश्मीरी अलगाववाद के समर्थक कई जाने-माने बुद्धिजीवी भी भारत के खिलाफ जहर उगलने के लिए उपस्थित थे। सेमीनार में गिलानी के बोलने से पहले ही उनके सामने कुछ राष्ट्रवादी युवकों ने जूता उछाल दिया। इससे भारी शोर-शराबा हुआ, जिसको देखते हुए सेमीनार बीच में ही रोकना पड़ा। इस कारण से अलगाववादियों की सारी सोची-समझी रणनीति धरी की धरी रह गई।

ओबामा की भारत यात्रा के मद्देनजर पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी रणनीतिक दृष्टि से अमेरिका में थे। यहां पर कुरैशी ने अमेरिका से कश्मीर मसले के समाधान के लिए भारत-पाकिस्तान के बीच दखल देने का अनुरोध किया। लेकिन अमेरिका ने पाकिस्तान के अनुरोध को सुनने से ही इन्कार कर दिया। अमेरिका का कहना है कि कश्मीर मसला दो देशों के बीच का मामला है। इसलिए दोनों देशों के बीच में दखल देना या मध्यस्थता करना उसके लिए संभव नहीं है। इस तरह से अमेरिका ने कश्मीर मसले पर भारत के रुख का ही समर्थन किया है।

जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में पाकिस्तान समर्थित अलगाववादियों की मांगे विशुद्ध रूप से भारत के एक और विभाजन की पक्षधर हैं। आत्मनिर्णय के अधिकार या जनमत संग्रह और मानवाधिकार की बड़ी-बड़ी बातें तो अलगाववादियों का महज मुखौटा भर है। क्योंकि जम्मू-कश्मीर का सशर्त विलय नहीं बल्कि पूर्ण विलय हुआ है। जम्मू-कश्मीर रियासत के तत्कालीन महाराजा हरिसिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को एक विलय पत्र पर हस्ताक्षर करके उसे भारत सरकार के पास भेज दिया था। 27 अक्टूबर 1947 को भारत के गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबेटन द्वारा इस विलय पत्र को उसी रूप में तुरन्त स्वीकार कर लिया गया था। यहाँ इस बात का विशेष महत्व है कि महाराजा हरिसिंह का यह विलय पत्र भारत की शेष 560 रियासतों से किसी भी प्रकार से भिन्न नहीं था और इसमें कोई पूर्व शर्त भी नहीं रखी गई थी।

प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने देशहित को अनदेखा करते हुए इस विलय को राज्य की जनता के निर्णय के साथ जोड़ने की घोषणा करके अपने जीवन की सबसे बड़ी भूल की। इस हेतु 26 नवंबर 1949 को संविधानसभा में अनुच्छेद-370 का प्रावधान रखा गया, जिसके कारण इस राज्य को विशेष दर्जा प्राप्त हुआ। विशेष बात यह है कि राज्य को अपना संविधान रखने की अनुमति दी गई। भारतीय संसद के कानून लागू करने वाले अधिकारों को इस राज्य के प्रति सीमित किया गया, जिसके अनुसार, भारतीय संसद द्वारा पारित कोई भी कानून राज्य की विधानसभा की पुष्टि के बिना यहां लागू नहीं किया जा सकता। इन्हीं सब कारणों से उस दौर के केंद्रीय विधि मंत्री डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने इस अनुच्छेद को देशहित में न मानते हुए इसके प्रति अपनी असहमति जताई थी। संविधान सभा के कई वरिष्ठ सदस्यों के विरोध के बावजूद नेहरू जी ने हस्तक्षेप कर इसे अस्थाई बताते हुए और शीघ्र समाप्त करने का आश्वासन देकर पारित करा लिया।

हम सब जानते हैं कि भारत का संविधान केवल एक नागरिकता को मान्यता प्रदान करता है लेकिन जम्मू-कश्मीर के नागरिकों की नागरिकता दोहरी है। वे भारत के नागरिक हैं और जम्मू-कश्मीर के भी। इस देश में दो विधान व दो निशान होने का प्रमुख कारण यह कथित अनुच्छेद है। सबसे बड़ी बिडंबना यह है कि 17 नवबंर 1956 को जम्मू-कश्मीर की जनता द्वारा विधिवत चुनी गई संविधान सभा ने इस विलय की पुष्टि कर दी। इसके बावजूद भी यह विवाद आज तक समाप्त नहीं हो सका है।

तत्कालीन कांग्रेस नेताओं की अदूरदर्शिता का परिणाम आज हमारे सामने है कि महाराजा द्वारा किए गए बिना किसी पूर्व शर्त के विलय को भी शेख की हठधर्मिता के आगे झुकते हुए केन्द्र सरकार द्वारा ‘जनमत संग्रह’ या ‘आत्मनिर्णय’ जैसे उपक्रमों की घोषणा से महाराजा के विलय पत्र का अपमान तो किया ही साथ-साथ स्वतंत्रता अधिनियम का भी खुलकर उल्लघंन हुआ है। इस स्वतंत्रता अधिनियम के अनुसार, राज्यों की जनता को आत्मनिर्णय का अधिकार न देते हुए केवल राज्यों के राजाओं को ही विलय के अधिकार दिए गए थे।

ये बातें एकदम सिद्ध हो चुकी हैं कि 63 वर्षों बाद भी यदि जम्मू-कश्मीर राज्य की समस्या का समाधान नहीं हो सका है तो इसके जिम्मेदार कांग्रेसी राजनेता हैं। नेहरू का कश्मीर से विशेष लगाव होना, शेख अब्दुल्ला के प्रति अत्यधिक प्रेम और महाराजा हरिसिंह के प्रति द्वेषपूर्ण व्यवहार ही ऐसे बिंदु थे, जिसके कारण कश्मीर समस्या एक नासूर बनकर समय-समय पर अत्यधिक पीड़ा देती रही है, उसी तरह समस्या के समाधान में अनुच्छेद-370 भी जनाक्रोश का विषय बनती रही है।

इस विघटनकारी अनुच्छेद को समाप्त करने की मांग देश के बुद्धिजीवियों और राष्ट्रवादियों द्वारा बराबर की जाती रही है। दूसरी ओर पंथनिरपेक्षता की आड़ में मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति करने वाले इसे हटाए जाने का विरोध करते रहे हैं। अस्थाई रूप से जोड़ा गया यह अनुच्छेद-370 गत 61 वर्षों में अपनी जड़ें गहरी जमा चुकी है। इसे समाप्त करना ही देशहित में होगा, नहीं तो देश का एक और विभाजन तय है।

अलगाववाद को शह दे रही है कांग्रेस

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने हाल ही में अलगाववाद का समर्थन करते हुए जो बयान दिया था, वास्तव में उस बयान के बाद उनको मुख्यमंत्री पद पर बने रहने का कोई लोकतांत्रिक और नैतिक अधिकार नहीं रह गया है। उमर ने कहा था- “जम्मू-कश्मीर का पूर्ण विलय नहीं बल्कि सशर्त विलय हुआ है। इसलिए इस क्षेत्र को भारत का अविभाज्य अंग कहना उचित नहीं है। यह मसला बिना पाकिस्तान के हल नहीं किया जा सकता है।”

उमर के इस प्रकार के बयान से वहां की सरकार और अलगाववादियों में कोई अंतर नहीं रह गया है। जो मांगे अलगाववादी कर रहे हैं, उन्हीं मांगों को राज्य सरकार के मुखिया उमर भी दुहरा रहे हैं। आखिर, सैयद अली शाह गिलानी व मीरवाइज उमर फारूख सहित अन्य अलगाववादी नेताओं और राज्य के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला में क्या फर्क बचा है ?

यदि उमर अब्दुल्ला अलगाववादी भाषा बोलने के बाद भी राज्य के मुख्यमंत्री बने हुए हैं, तो इसकी प्रत्यक्ष जिम्मेदार कांग्रेस है। क्योंकि कांग्रेस के समर्थन से ही अब्दुल्ला सरकार टिकी हुई है। सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि जम्मू-कश्मीर मसले पर बातचीत के लिए केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त वार्ताकार भी उमर अब्दुल्ला की ही तरह अलगाववादी भाषा बोल रहे हैं। यानी उमर अब्दुल्ला, कांग्रेस, वार्ताकारों और राज्य के अलगाववादियों के विचार एक हैं। चारो अलगाववाद के समर्थन में हैं।

कांग्रेस भी अलगाववादियों के सुर में सुर मिला रही है। यह चिन्तनीय है। अब यह प्रश्न उठता है कि क्या कांग्रेस भी पंडित नेहरू के ही नक्शे-कदम पर चल पड़ी है ? सभी जानते हैं कि स्वतंत्रता के तत्काल बाद कबाइलियों के भेस में पाकिस्तानी आक्रमण के दौरान कश्मीर की जीती हुई लड़ाई को संयुक्त राष्ट्र में ले जाकर पंडित नेहरू ने ऐतिहासिक भूल की थी। ठीक उसी प्रकार की भूल कांग्रेस भी कर रही है। इतिहास गवाह है कि यदि पंडित नेहरू कश्मीर मसले को संयुक्त राष्ट्र में नहीं ले गए होते तो आज अपने पूरे जम्मू-कश्मीर पर भारत का ध्वज फहराता और ‘पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर’ का कहीं कोई नामोनिशान नहीं होता।

है किसी में दम….

-जो पाकिस्तान की जमीं पर खड़ा होकर हिन्दुस्तान जिंदाबाद-पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगा सके

-जो लाहौर में खड़ा होकर पाकिस्तानी अवाम को गाली दे सके

-जो इस्लामाबाद की सड़कों पर तिरंगा लहरा सके

-जो कराची में रहकर पाकिस्तानी फौज को पाकिस्तानी कुत्ता कह सके


शायद जवाब मिलेगा (ना), मेरा भी जवाब है (ना)। और अगर ऐसी हिम्मत करने की कोई सोच भी ले तो अंजाम क्या होगा ये सब जानते हैं, बताने की जरूरत नहीं। पाकिस्तान ही क्या कोई भी मुल्क अपनी जमीं पर ऐसा किसी भी सूरत में नहीं होने देगा सिवाय हिंदुस्तान को छोड़ के। जी हां, सारी दुनिया में हिंदुस्तान ही ऐसा इकलौता मुल्क है जहां सब कुछ मुमकिन है यानि ‘इट्स हैपिंड ऑनली इन इण्डिया’। यहां की जमीं पर पाकिस्तान जिंदाबाद -हिंदुस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाने की पूरी आजादी है, कहने को कश्मीर हमारा है पर यहां तिरंगा जलाने और पाकिस्तानी झंडे को लहराने की पूरी छूट है, यहां भारतीय फौज को जी भर के गाली दी जा सकती है। ऐसा क्यों है? तो तर्क समझ लीजिए – क्योंकि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है, दूसरा तर्क – यह धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, तीसरा तर्क – यहां हर किसी को अपने अधिकारों के लिए लड़ने का पूरा हक है (चाहे वो राष्ट्रविरोधी हक क्यों न हो)। ऐसे तमाम तर्क आपको मिल जाएंगे जो आपके गले उतरें या ना उतरें। अब ताजा उदाहरण 21अक्टूबर दिन गुरूवार दिल्ली स्थित एलटीजी सभागार में आयोजित उस सेमीनार का ही ले लीजिए जिसमें ऑल इण्डिया हुर्रियत कांफ्रेंस के चेयरमेन व अलगाववादी नेता जनाब सैयद अली शाह गिलानी, माओवादियों की तरफदारी करने वाली अरूंधती रॉय, संसद पर हमले के आरोपी रहे और बाद में सबूतों के अभाव में बरी कर दिये गये प्रो. एसएआर गिलानी, जाने माने नक्सल समर्थक वारा वारा राव जैसी राष्ट्रविरोधी शख्सियत मौजूद थी। सम्मेलन का विषय था ‘कश्मीर-आजादी द ऑनली वे’। अब आप अंदाजा लगाइये ‘विषय’ पर और चर्चा करने के लिए जुटी इस जमात पर। इस जमात में शामिल थे अलगाववादी, नक्सलवादी, खालिस्तानी सरगना और समथर्क।

यह सब कश्मीर में नहीं बल्कि देश की राजधानी में हो रहा था। अब इसे विखंडित देश का सपना देखने वाले इन ‘देशभक्तों’ का साहस कहें या इनके साहस की हौसला अफजाई के लिए दिल्ली में बैठी ताकतों का दुस्साहस। ये वही सैयद अली शाह गिलानी है जिसके एक इशारे पर भारतीय फौज पर पत्थर बाजी शुरू हो जाती है, जिसके इशारे पर श्रीनगर में तिरंगे को जूते-चप्पलों से घसीटकर जला दिया जाता है, जनाब की रैली में लहराते हैं पाकिस्तानी झंडे और हिंदुस्तान- मुर्दाबाद, पाकिस्तान -जिदांबाद के नारों से गूंजने लगती है घाटी। ये जब चाहें घाटी को बंद करने का फरमान जारी कर देते हैं। हाल ही में गिलानी का एक वीडियो मैंने भी देखा है जिसमें कश्मीरी अवाम और ये एक सुर में चीख चीख कर कह रहे हैं – हम पाकिस्तानी हैं- पाकिस्तान हमारा है। इन नारों से घाटी गूंज रही है। 29 अक्टूबर 1929 को उत्तरी कश्मीर के बांदीपुरा में जन्मे गिलानी को पाकिस्तान का घोषित रूप से एजेंट माना जाता है। क्योंकि शुरूआती तालीम को छोड़ दें तो स्नातक तक की पढ़ाई इन्होंने ऑरिएंटल कॉलेज लाहौर से की है। जाहिर सी बात है रग रग में पाकिस्तान की भारत विरोधी तालीम भरी पड़ी है। पांच बेटी और दो बेटे (नसीम और नईम) के पिता जनाब गिलानी साहब ऑल पार्टीज हुर्रियत कॉफ्रेंस के चेयरमेन हैं और तहरीक-ए-हुर्रियत नाम की अपनी पार्टी चला रहे हैं। इनका और इनकी पार्टी का वजूद सिर्फ भारत विरोध पर टिका हुआ है। कश्मीर को भारत से अलग करना और पाकिस्तान की छत्र छाया में आगे बढ़ना इनका सपना है। घाटी में पाकिस्तानी मंसूबा इन्हीं की बदौलत पूरा होता है। गिलानी की अकड़ का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है, हाल ही में घाटी के बिगड़ते हालात पर प्र्रधानमंत्री ने एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल को घाटी में भेजा था, जनाब ने किसी भी तरह की बातचीत से मना कर दिया था। प्रधनमंत्री की मनुहार पर भी नहीं माने। आखिरकार दल के कुछ नुमाइंदे घुटने के बल इनकी चौखट पर नाक रगड़ने पंहुचे। क्योंकि ये सरकार की कमजोरी-मजबूरी से वाकिफ हैं। सरकार इनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती, ये सरकार का मुस्लिम समीकरण जरूर बिगाड़ सकते हैं। बावजूद इसके सरकार ने इनकी हिफाजत के लिए स्पेशल सिक्योरिटी दे रखी है। अब जनाब कश्मीर की वादियों से निकलकर दिल्ली में अपनी दहशतगर्दी की दुकान खोलने की तैयारी में हैं। तभी तो ‘आजादी द ऑनली वे’ के बहाने अपनी राष्ट्र विरोधी सोच का मंच दिल्ली में तैयार करने का साहस किया है। और जब चोर-चोर मौसरे भाई (अलगाववादी, नक्सलवादी, खालिस्तानी) एक साथ मिल जाएं तब तो खूब जमेगी, कामयाबी भी मिलनी तय है। इस सम्मेलन में जो लोग इकठ्ठा हुए वो सब के सब देश के गद्दार हैं। लेकिन उनकी मुखालफत करने की हिम्मत किस में है? अगर कोई करेगा भी तो इस देश के तथाकथित और स्वयंभू ‘सेकुलरवादी’ उसे साम्प्रदायिक बता डालेंगे। भगवावादी की श्रेणी में रख देंगे। क्योंकि जब सम्मेलन में गिलानी का विरोध करने कश्मीरी पंडित पंहुचे तो सरकार की तरफ से तुरंत बयान आया कि ये भाजयुमो के कार्यकर्ता थे। यानि सरकार ने कश्मीरी पंडितों के मुंह पर ही थूक दिया। देश के इन गद्दारों पर आंखें बंद कर सब चुप्पी साधे रहें, हैरानी होती है। अब अगर मेरे इस लेख को भी पढ़कर तथाकथित देश के बुद्धिजीवी सांप्रदायिक लेख करार दें तो मेरे लिए हैरानी की बात नहीं होगी। क्योंकि ‘इट्स हैपिंड ऑनली इन इण्डिया’।

-विशाल आनंद

शनिवार, 23 अक्टूबर 2010

एक विडियो : क्‍या ये जनाब बात करने लायक है ?

क्या आपने सैयद अली शाह गिलानी का नाम सुना है ?
हाँ ! वो ही कश्मीर अवाम के महान नेता ….
गत माह केन्द्रीय प्रतिनिधिमंडल ने जिनके घर जाकर कश्मीर के साथ हो रहे अन्याय के लिये अफ़सोस जाहिर किया था…


कृपया ३ मिनट निकालकर इनका यह एक विडियो देखिये,

http://www.youtube.com/watch?v=KNF1xNml9ZE&feature=player_embedded#!

http://www.youtube.com/watch?v=PLkE92TpRTE&feature=related

शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

कश्मीर तो होगा लेकिन पाकिस्तान नहीं होगा

हम डरते नहीं एटम बम्ब, विस्फोटक जलपोतो से
हम डरते है ताशकंद और शिमला जैसे समझोतों से
सियार भेडिए से डर सकती सिंहो की औलाद नहीं
भरत वंश के इस पानी की है तुमको पहचान नहीं
भीख में लेकर एटम बम्ब को तुम किस बात पे फूल गए
६५, ७१ और ९९ के युधो को शायद तुम भूल गए
तुम याद करो खेतरपाल ने पेटन टैंक जला डाला
गुरु गोबिंद के बाज शेखो ने अमरीकी जेट उड़ा डाला
तुम याद करो गाजी का बेडा एक झटके में ही डूबा दिया
ढाका के जनरल नियाजी को दुद्ध छटी को पिला दिया
तुम याद करो उन ९०००० बंदी पाक जवानो को
तुम याद करो शिमला समझोता और भारत के एहसानों को
पाकिस्तान ये कान खोलकर सुन ले
की अबके जंग छिड़ी तो सुन ले
नमो निशान नहीं होगा
कश्मीर तो होगा लेकिन पाकिस्तान नहीं होगा

लाल कर दिया तुमने लहू से श्रीनगर की घाटी को
किस गफलत में छेड़ रहे तुम सोई हल्दी घाटी को
जहर पिला कर मजहब का इन कश्मीरी परवानो को
भय और लालच दिखला कर भेज रहे तुम नादानों को
खुले पर्शिक्षण है खुले शस्त्र है, खुली हुई नादानी है
सारी दुनिया जान चुकी ये हरकत पाकिस्तानी है
बहुत हो चुकी मक्कारी, बस बहुत हो चूका हस्ताक्षेप
समझा दो उनका वरना भभक उठे गा पूरा देश
हिन्दू अगर हो गया खड़ा तो त्राहि त्राहि मच जाएगी
पाकिस्तान के हर कोने में महाप्रलय आजायेगी
क्या होगा अंजाम तुम्हे इसका अनुमान नहीं होगा
कश्मीर तो होगा लेकिन पाकिस्तान नहीं होगा

ये मिसाइल ये एटम बम्ब पर हिम्मत कोन दिखायगा
इन्हें चलाने जन्नत से क्या बाप तुम्हारा आएगा
अबकी चिंता मत कर चहरे का खोल बदल देंगे
इतिहास की क्या हस्ती है सारा भूगोल बदल देंगे
धारा हर मोड़ बदल कर लाहौर से निकलेगी गंगा
इस्लामाबाद की छाती पर लहराएगा तिरंगा
रावलपिंडी और करांची तक सब गारत हो जाएगा
सिन्धु नदी के आर पार सब भारत हो जाएगा
फिर सदियों सदियों तक जिन्नाह जैसा शेतान नहीं होगा
कश्मीर तो होगा लेकिन पाकिस्तान नहीं होगा

हिन्दू-स्थान ने ली अब एक नई अंगड़ाई है
भारत माँ के चरणों में ये सोगंध हमने खायी है
आज नहीं तो कल हम अखंड भारत बनायेंगे
सिन्धु को फिर दुबारा गंगा से मिलाएँगे
बंग भंग हुआ था, पाप एक इस धरती पर
दुर्गा की भूमि को पुनः आजाद कराएँगे
खैबर पास और हिन्दुकुश भारत की सीमा होगी
चंहु ओर सनातन और केसरिये की जय जय कर होगी
ये स्वपन एक दिन जरुर साकार होगा
पर उस दिन कश्मीर तो होगा लेकिन पाकिस्तान नहीं होगा

। । भारत माता की जय। ।
। । अखंड भारत की जय। ।


संपादन
विकास सिंघल