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सोमवार, 10 जनवरी 2011

पाकिस्तान को थमाया जा रहा देश के खिलाफ प्रचार का हथियार

हिंदुस्तान के हिंदुओं का इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है कि विभाजन के 63 वर्षों बाद भी उन्हें अपना हिंदू राष्ट्र नहीं मिल सका। तकरीबन सौ साल की कुर्बानी भरे संघर्षों के बाद मिला भी तो तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र। विश्व के हर देश के पास अपनी भाषा, अपनी सभ्यता-संस्कृति के अनुरूप उनकी पहचान है लेकिन विश्वभर में फैले करीब एक करोड़ हिंदुओं का अपना कोई मुल्क नहीं है। अब हिंदु संगठनों के साथ आतंकवादी शब्द जोड़ कर हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को समाप्त करने की गहरी साजिश रची जा रही है। भारत के इतिहास, संस्कृति, संस्कार से अनभिज्ञ कांग्रेस का मौजूदा नेतृत्व और उसके नैसिखिए राजनीतिक मां-बेटे की पार्टी को सबसे बफादार साबित करने में देश के अस्तित्व को ही संकट में डालने का काम कर रहे हैं।

वाराणसी प्रवास के दौरान भाजपा के वरिष्ठ नेता व सांसद डॉ. मुरली मनोहर जोशी की यह चिंता काबिले गौर है कि कांग्रेस के बबुआ और बचवा वोट बैंक के खेल में पाकिस्तान को भारत के खिलाफ प्रचार का हथियार थमा रहें है। उनके इस राजनीतिक खेल पर अंकुश नहीं लगा अथवा लगाया गया तो देश को एक और विभाजन का दंश झेलना पड़ सकता है। उनका यह दुःख भी जायज ही है कि देश में बहस समस्याओं के समाधान पर होनी चाहिए न कि समस्या पैदा करने की लेकिन कांग्रेस उल्टी गंगा बहा रही है। भय, भूख, भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं के समाधान तो कर नहीं पा रही है उल्टे हिंदू संगठनों को लश्करे तैयबा से ज्यादा खतरनाक बता कर देश के अस्तित्व को ही खतरे में डालने का काम कर रही है। भाजपा के वयोवृद्ध नेता की यह चिंता मौजूदा राजनीतिक परिदृष्य में राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक एकता के सामने सवालिया निशान खड़ा करता है। अधिक नहीं बीते एक दशक के राजनीतिक बदलाव की समीक्षा की जाए तो समझ में आ जाता है कि वोट बैंक की अंधी दौड़ में राजनीतिक तुष्टीकरण के कई दंश देश और समाज को झेलने पड़े हैं। इतना ही नहीं हिंदू सभ्यता-संस्कृति को समाप्त कर पश्चिम की मजहबी संस्कृति को देश पर थोपने जैसे प्रयास किये जा रहे हैं। हालात तो यहां तक आ पहुंचे हैं कि हिंदुस्तान में किसी संगठन के आगे हिंदु लिखना अब बड़े अपराध की श्रेणी में ला खड़ा करता है। हिंदुस्तान में ही मुसलमान, ईसाई, पारसी सभी को अपने धर्म-संप्रदाय के अनुरूप जीने-खाने और उसके प्रचार-प्रसार का अधिकार है लेकिन हिंदू संगठनों को इसका अधिकार नहीं है। जाहिर है हिंदुत्व कमजोर होगा तो पूरा विश्व संकट में आ जाएगा। क्योंकि विश्व समाज में अनादिकाल से सत्य-असत्य और धर्म-अर्धम के बीच संघर्ष होता रहा है और अंत में जीत सत्य व धर्म की हुई है। सच तो यह है कि हिंदू विश्व के जिस कोने में गए वहां शांति, सद्भभाव और अहिंसा का ही संदेश दिया। हिंदुत्व का आचरण व्यापक, विश्व कल्याण व शांति का संदेश देने वाला ही रहा है। कुल मिलाकर हिदू चिंतन किसी के विरोध में नहीं बल्कि सर्वे भवंतु सुखिनः की ही कामना करता है। देखा जा रहा है कि इन दिनों देश में दो धाराएं चल रही है। वोटबैंक को राष्ट्रीय राजनीति से जुड़ा एक तबका हिंदुत्व को संकुचित व सांप्रदायिक मानता हैं वहीं दूसरी धारा हिंदू समाज व हिंदुत्व के चिंतन को सशक्त बनाने में क्रियाशील है। यहां हिंदू समाज के चिंतन से अनभिज्ञ राजनितिक तबके को याद दिलाना जरूरी है कि यह वही हिंदू समाज है जिसने इस देश में मुस्लिम, पारसी, ईसाई धर्म से जुड़े लोगों को उसी तरह स्वीकार किया जिस तरह सागर विभिन्न नदियों को बिना किसी भेद के स्वीकार कर लेता है।

यह सच है कि स्वतंत्रता के बाद संविधान में भारत को धर्मनिरपेक्ष देश घोषित किया गया लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि देश में हिंदुत्व चिंतन पर रोक लगा दिया गया हो। बल्कि देश में किसी जाति-धर्म का भेदभाव न करते हुए उन्हें अपनी जाति-धर्म के अनुरूप जीवनयापन की आजादी देना है। मुसलमान, ईसाई जब भारत आए तो यहां पहले से न मस्जिद थी और ना ही गिरजाघर। हिंदुस्तान के हिंदुओं की विश्व बंधुत्व का ही तकाजा है कि उन्हें इबादत करने के लिए खुले दिल से जगह मिली। वहीं आज हिंदुस्तान में अपनी ही सरजमी पर राममंदिर बनाने जब हिंदू निकलता है तो उसे आतंकवादी ठहराया जा रहा है। राष्ट्रहित की सोचने वाले इंद्रेश कुमार सरीखों पर कीचड़ उछाला जा रहा है। दुःख इस बात का है कि कीचड़ फेकने का काम ऐसे लोग कर रहे हैं जिन्हें सिमी व संघ में कोई फर्क नजर नहीं आता। अंग्रेजी हुकूमत की नीति फूट करो, राज करो को आजाद हिंदुस्तान में अमल में लाकर तुष्टीकरण की जो नीति अपनी जा रही है उसकी कीमत यह देश अशिक्षा, भुखमरी, बेरोजगारी, हिंसा, दंगा, नक्सलवाद, आतंकवादी, जातिवाद के रूप में भुगत रहा है। राजनीति को समाज सेवा से हटा कर खानदानी व्यापार की शक्ल दी जा रही है। दुर्भाग्य यह भी है कि धीरे-धीरे राष्ट्रीय राजनीति ही इसी ढर्रे पर चल पड़ी है। ऐसे में देश के बारे में सोचने की फुर्सत किसी के पास है। यह एक बड़े सवाल के रूम में देश के सामने आ खड़ा हुआ है। बहस इस पर चलाने की जरूरत है।

बुधवार, 24 नवंबर 2010

धर्मक्षेत्रे भारतक्षेत्रे …………

गीता का प्रथम श्लोक ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’ भारतीय मनीषा को उत्कृष्टतम अभिव्यक्ति देने वाले ग्रंथ की शुरुआत मात्र नहीं है, यह व्यवस्था की एक एक विशेष स्थिति की तरफ संकेत भी करता है। एक ऐसी जब सत्य और असत्य के बीच आमना -सामना अवश्यंभावी बन जाता है। इस स्थिति में पूरी व्यवस्था व्यापक बदलाव के मुहाने पर खड़ी होती है। असात्विक शक्तियों की चालबाजियों, फरेबों और तिकड़मों से आम आदमी कराह रहा होता है। अभिव्यक्ति में असत्य हावी हो जाता है। परंपरागत सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक संरचनाओं में सड़ांध इस कदर बढ़ चुकी होती है अपने हितों के लिए मूल्य एवं आदर्श को ताक पर रखना सहज व्यवहार बन जाता है। राज और समाज को संचालित करने वाली शक्तियां इतनी मदमस्त हो जाती है कि उनके खिलाफ ‘लो इन्टेंसिटी वार’ अप्रासंगिक हो जाता है। लेकिन इस स्थिति का एक सकारात्मक पक्ष भी होता है। वह यह कि सात्विक शक्तियां असात्विक शक्तियों की चुनौती को ताल ठोंककर स्वीकार करती है। इस कारण प्रत्यक्ष संघर्ष अपरिहार्य बन जाना है। दोनों पक्षों को एक दूसरे के खिलाफ शंखनाद करना पड़ता है। चूंकि यह संग्राम धर्म की स्थापना के उद्देश्य से लड़ा जाता है इसलिए जिस भूमि पर सेनाएं डटती हैं , वह धर्मभूमि बन जाती है। इस स्थिति की एक विशेषता यह भी है कि अपने तमाम अच्छे आग्रहों के बावजूद संचार और संचारक (मीडिया और पत्रकार) असात्विक शक्तियों के पाले में ही खड़े दिखायी देते हैं और उनकी भूमिका मात्र ‘आंखो देखा हाल’ सुनाने तक सीमित हो जाती है।

भारत जिस कालखंड से गुजर रहा है उसमें भी भारतीयता और अभारतीयता के बीच का संघर्ष तेजी से ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’ की स्थिति की स्थिति की ओर बढ़ रहा है। हालांकि इस युध्द का क्षेत्र कुरुक्षेत्र तक सीमित न रहकर संपूर्ण भारत है। एक लंबी योजना के तहत उन शक्तियों पर निशाना साधा जा रहा है जो वर्तमान प्रणाली में भारतीयता को स्थापित करने का प्रयास कर रही है , भारतीय प्रकृति और तासीर पर आधारित वैकल्पिक व्यवस्था को गढ़ने के लिए प्रयत्नशील हैं।

इस बिंदु पर भारतीयता और अभारतीयता के बीच के संघर्ष को व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझना आवश्यक है। यह संघर्ष दिन, माह, और 100-50 वर्ष की सीमाओं को बहुत पहले ही लांघ चुका है और पिछले 1ं4 सौ वर्षों से सतत जारी है। कई निर्णायक दौर आए। कई बार ऐसा लगा कि भारतीयता सदैव के लिए जमींदोज हो गयी है लेकिन अपनी अदम्य धार्मिक जीजीविषा और प्रबल सांस्कृतिक जठराग्नि की बदौलत ऐसे तमाम झंझावातों को पार करने में वह सफल रही। 17वीं सदी तक भारतीयता पर होने वाले आक्रमणों की प्रकृति बर्बर और स्थूल थी। इस दौर के आक्रांताओं में सांस्कृतिक समझ का अभाव था और वे जबरन भारतीयता को अपने ढांचे में ढालने की कोशिश कर रहे थे। 18 वीं सदी में आए आक्रांताओं ने धर्म और संस्कृति में छिपी भारतीयता की मूलशक्ति को पहचाना और उसे नष्ट करने के व्यवस्थागत प्रयास भी शुरु किए। इस दौर में भारतीयता पर दोहरे आक्रमण की परंपरा शुरु हुई। बलपूर्वक भारतीयता को मिटाने के प्रयास यथावत जारी रहे साथ ही भारतीयों में भारतीयता को लेकर पाए जाने वाले गौरवबोध को नष्ट करने के एक नया आयाम आक्रांताओं ने अपनी रणनीति में जोड़ा। 1990 के बाद मीडिया -मार्केट गठजोड़ के कारण लोगों में तेजी से रोपी जा रही उपभोक्तावादी जीवनशैली के कारण भारतीयता पर आक्रमण का एक नया तीसरा मोर्चा भी खुल गया। मीडिया मार्केट गठजोड़ का भारतीयता से आमना-सामना अवश्यंभावी था क्योंकि भारतीयता त्यागपूर्वक उपभोग के जरिए आध्यात्मिक उन्नति के चरम लक्ष्य को प्राप्त करने की बात कहती है जबकि दूसरा पक्ष उपभोग को ही जीवन का चरम लक्ष्य मानता है और अंधाधुध उपभोग पर आधारित जीवनशैली को बढ़ावा देता है। भारतीयता पर आक्रमण करने वाले इस त्रिकोण के अंतर्संबंध आपस मे बहुत अच्छे नहीं कहे जा सकते। कही कहीं तो वे एकदूसरे पर जानलेवा हमला करते हुए भी दिखते है। लेकिन भारतीयता से इन तीनों को चनौती मिल रही है। इसलिए इस त्रिकोण ने भारतीयता के समाप्ति को अपने साझा न्यूनतम कार्यक्रम का हिस्सा बना लिया है।

इस अभारतीय त्रिकोण के उभार के कारण संघर्ष की प्रकृति और त्वरा में व्यापक बदलाव दिखने लगे हैं। पहले दोनों पक्षों के बीच अनियोजित अथवा अल्पयोजनाबध्द ढंग से विभिन्न मोर्चों पर छोटी – मोटी लडाईयां होती रहती है। अब सुनियोजित और व्यवस्थित तरीके से भारतीयता पर आक्रमण हो रहे और उसके अस्तित्व को समाप्त करने प्रयास किए जा रहे हैं। भारतीयता की वाहक शक्तियां भी चुनौती को स्वीकार करने के मूड में दिख रही है , इसलिए अब महासंग्राम का छिड़ना तय सा दिख रहा है।

पिछले 2 वर्षो सें ‘ हिन्दू आतंकवाद ‘ की अवधारणा को रोपने का जो प्रयास किए जा रहा हैं और उसका जिस तरह से प्रतिवाद हो रहा है , वह भावी महासंग्राम का कारण बन सकता है। हिंदू आतंकवाद की अवधारणा अभारतीय शक्तियों का एक व्यवस्थित और दूरगामी प्रयास है। इस अवधारणा के जरिए वे पश्चिम में तेजी से फैल रही आध्यात्मिकता पर आधारित उदात्त और समग्र भारतीय जीवनशैली को दफनाना चाहती हैं।। योग और आयुर्वेद के प्रति संपूर्ण दुनिया की नई पीढ़ी जिस तरह से आकर्षित हुई है।इसी तरह कई संस्थाएं और संत पश्चिम में आध्यात्मिकता की अलख जगा रहे हैं, और वहां नई पीढ़ी इसकी तरफ तेजी से आकर्षित हो रही है। इस आकर्षण भाव के कारण भारतीयता विरोधी त्रिकोण के हाथ-पांव फूल गए है। भारतीयता की छवि को संकीर्ण और कट्टर पेश कर यह त्रिकोण उसके प्रति तेजी से पनप रहे आकर्षण भाव को भंग करना चाहता है। ‘हिन्दू आतंकवाद’ का नया शिगूफा छोड़कर इस त्रिकोण ने भारतीयता की ध्वजावाहक शक्तियों को भारत में ही घेरने की रणनीति बनायी है।

इस पूरे प्रकरण में मीडिया की अति उत्साही भूमिका भी देखने लायक है। 2 वर्षों पहले तक किसी पंथ को आतंकवाद से न जोड़ने का उपदेश देने वाला मीडिया बिना किसी सबूत और साक्ष्य के ‘हिन्दू आतंकवाद’ शब्द को बार -बार दोहरा रहा है। मजेदार तथ्य यह है कि ‘हिन्दू आतंकवाद’ शब्द को मीडिया के जरिए आमलोगों से परिचित पहले करवाया गया और उसकी पुष्टि के सबूत बाद में जुटाए जा रहे हैं। एक अवधारणा के रुप में हिन्दू आतंकवाद हाल के दिनों में ‘मीडिया ट्रायल’ का सबसे बडा उदाहरण है। सबसे पहले मालेगांव प्रकरण में ‘हिन्दू आतंकवाद’ शब्द का प्रयोग किया गया। इस प्रकरण में सांगठनिक स्तर पर अभिनव भारत तथा व्यक्तिगत स्तर साध्वी प्रज्ञा का नाम उछाला गया। मालेगांव विस्फोट प्रकरण में मीडिया को तमाम मनगढंत कहानियां उपलब्ध कराने के अतिरिक्त आजतक जांच एजेंसियां कोई ठोस सबूत नहीं इकट्ठा कर पायी हैं। अभिनव भारत जैसे अनजान जैसे संगठन को लपेटने पर भी भारतीयता पर कोई आंच आती न देख अब इस त्रिकोण ने भारत और विश्व के सबसे बडे सांस्कृतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को हिन्दू आतंकवाद से जोड़ने का कुत्सित प्रयास शुरु कर दिया है। संघ इस त्रिकोण के निशाने पहले भी सबसे उपर रहा है। क्योंकि आतंकवाद, धर्मांतरण और खुली अर्थव्यवस्था की विसंगतियों के प्रति संघ आमजन को जागरुक करता रहा है। इस कारण पूरे भारत में धीरे -धीरे इस त्रिकोण के खिलाफ एक प्रतिरोधात्मक शक्ति खड़ी होती जा रही थी।

अब इन शक्तियों ने संघ के एक वरिष्ठ और दूरदर्शी प्रचारक इंद्रेश का नाम ,जिन्हे मुसलमानों को भी संघ के कार्य से जोड़ने के लिए विशेष रुप से जाना जाता है, अजमेर बम विस्फोट में घसीटा है। यह त्रिकोण इंद्रेश के नाम को अजमेर बम विस्फोट से जोड़कर एक साथ कई निशाने साधने की कोशिश कर रहा है। इससे जहां एक तरफ त्रिक़ोण के सर्वाधिक सशक्त प्रतिरोधी की राष्ट्रवादी और लोक कल्याणकारी छवि को धूमिल किया जा सकेगा , वहीं इस्लामिक आतंकवाद के समकक्ष ‘हिन्दू आतंकवाद’ शब्द खड़ा कर मुसलमानों के कुछ वोट भी हथियाए जा सकेंगे। साथ ही , हिन्दू -मुस्लिम संवाद के एक संभावित धरातल को नष्ट भी किया जा सकेगा। लेकिन संघ ने भी इस चुनौती को स्वीकार करने का मन बन लिया है। संघ ने 10 नवंबर को पूरे देश में हिन्दुत्व और भारतीयता को बदनाम करने के इस कुत्सित प्रयास के खिलाफ धरना देने का फैसला किया है, आमजनता के बीच जाने का निर्णय लिया है। इस निर्णय का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है कि क्योंकि संघ ने घरने -प्रदर्शन के पूरे अभियान के सूत्र अपने हाथ में रखे है इससे पहले यह काम संघ के अनुषांगिक संगठन करते थे। 1975 के आपातकाल के बाद यह पहला मौका है जब संघ किसी मुद्दे की बागडोर खुद अपने हाथ मे लेकर आमजन के बीच जा रहा है। धरने प्रदर्शन का यह अभियान मात्र अभारतीय त्रिकोण को उत्तर देने की तैयारी मात्र नहीं है , संघ अपने उस आनुषंगिक संगठन को भी संदेश देना चाहता है जो व्यवस्था में भारतीयता को स्थापित करने के लक्ष्य से एकहद तक विचलित हो चुका है और यह मान चुका है कि उनके बिना संघ कोई सार्वजनिक अभियान चलाने में अक्षम है। जाहिर है एक बडे महासंग्राम की स्थितियां पूरी तरह बन गयी है। भारत तेजी से ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’ की स्थिति की तरफ बढ़ रहा है। लेकिन कोई ऐसा संजय नहीं दिखाई दे रहा है जो असत्य के पाले मेंं रहते हुए भी अंधी सत्ता को बीच-बीच में टोक कर उसे सत्य मार्ग अपनाने के लिए प्रेरित करता रहे और स्थिति की भीषणता की तरफ उसका ध्यान भी आकर्षित करे।

हिन्दुत्व के आलोचक

भारत सहित विश्व के ख्यातिनाम विद्वानों एवं दार्शनिकों के लिए हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व को उसके सही और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में व्याख्यायित करना आसान कार्य कभी नहीं रहा। इस संबंध में इलाहाबाद से प्रकाशित एक हिंदी दैनिक के 28 अक्टूबर,2010 के ताजा अंक में किन्हीं श्री सुभाष गाताड़े के लेख ”हिन्दू धर्म एवं हिन्दुत्व के फर्क को आप कब समझेंगे भागवत जी?” को पढ़ाकर अत्यन्त आश्चर्य हुआ। पूरे लेख में अन्तर्निहित दुर्भावना, अधकचरी जानकारी, पक्षपातपूर्ण सामग्री एवं झूठ के पुलिंदे को पढ़कर बहुत दुख हुआ। किसी लेखक को अपने लेख की प्रकाशनार्थ सामग्री इस आशय से कई बार पढ़नी चाहिए कि उसमें निहित निराधार दुर्भावना प्रकट न होने पायें। लेखक को विनम्र सलाह है कि वे सर्वप्रथम मा. इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ द्वारा विगत् 30 सितम्बर,2010 को अयोध्या विवाद पर घोषित निर्णय को आद्योपांत ध्यान से पढ़ डालें। विशेष रुप से संबंधित पीठ द्वारा वर्ष 2002-03 में दिये गये निर्देशों के अनुपालन में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा विवादित स्थल के आस-पास करीब 90 स्थानों पर की गयी खुदायी के बाद मा. न्यायालय में प्रस्तुत उस आख्या का अध्ययन कर लें जिसमें साफ-साफ कहा गया है कि विवादित भूमि के नीचे एक हिंदू मंदिर के अवशेष अब भी विद्यमान हैं। न्यायपीठ में शामिल तीन जजों में से दो न्यायाधीशों (न्यायमूर्ति शर्मा एवं न्यायमूर्ति सुधीर नारायण) ने पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की आख्या का बारीकी से अध्ययन करने के बाद अपने निर्णय में यह मत व्यक्त किया कि विवादित स्थल पर पहले से मौजूद एक हिंदू मंदिर को ध्वस्त करके उसके मलवे से कथित बाबरी मस्जिद बनवाई गयी थी, जबकि तीसरे न्यायमूर्ति खान इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि कथित बाबरी ढाँचा एक हिंदू मंदिर के खंडहर पर बनवाया गया था। तीनों न्यायाधीशों का असंदिग्ध मत यह था कि मस्जिद एक हिंदू मंदिर स्थल पर बनवाई गयी थी, न कि किसी खाली भूमि पर। साथ ही यह निष्कर्ष भी निकाला गया कि कथित मस्जिद मुस्लिम मान्यताओं के अनुसार पूर्ण रुपेण मस्जिद नहीं थी। अगर लेखक गाताड़े को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की आख्या और उसे एक साक्ष्य के रुप में स्वीकार करने की माननीय न्यायाधीशों के सुविचारित निर्णय में उल्लेख पर कोई आपत्ति है, तो उन्हें अपनी आपत्तियों को तर्क संगत ढंग से प्रचार माध्यमों में व्यस्त करना चाहिए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक मोहन राव भागवत ने निर्णय का स्वागत करते हुए कहा था कि इस निर्णय से ‘न कोई जीता-न कोई हारा’। उनका यह वक्तव्य एक अक्टूबर, 2010 के सभी दैनिकों में प्रकाशित हुआ था। दशकों से पाक प्रेरित आतंकियों द्वारा देश के विभिन्न भागों में किये गये विस्फोटों में हजारों निर्दोषों के असमय काल कवलित हो जाने पर लेखक श्री गाताड़े ने कितने लेख लिखे थे? बहुत सी आतंकी घटनाओं में सिमी एवं इंडियन मुजाहिदीन के कर्ता-धर्ता संलिप्त पाये गये थे। उनमें से कुछ को न्यायालयों द्वारा दंडित भी किया जा चुका है और कुछ मामले अब भी न्यायालय में विचाराधीन हैं। तब देश भर के पंथनिरपेक्षतावादी यह कहने से गुरेज नहीं करते थे कि आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता यानी” मुस्लिम आतंकवाद” कहने पर परहेज किया गया और अब इक्का-दुक्का घटनाओं में कुछ हिंदुओं के पकड़े जाने पर न केवल ‘भगवा आतंकवाद’ या ‘हिन्दु आतंकवाद’ का देशव्यापी नारा लगाया जाने लगा, वरन् इसमें पूरी संप्रग सरकार और उसके गृहमंत्री ने खुला योगदान देना शुरु कर दिया। श्री गाताड़े जैसे लेखक भी अपनी अधकचरी जानकारी एवं पक्षपाती दृष्टिकोण के कारण उसके शिकार हो गये। श्री गाताड़े की सीमित जानकारी होने की वजह से संघ में ‘एक चालकानुवर्तित्व’ का सवाल उठाया गया है। उनमें यह साहस नहीं है कि वे देशभर के अधिकांश क्षेत्रीय दलों के आजीवन अध्यक्षों और कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय राजनीतिक दल के एक परिवार में सिमट जाने पर कुछ सवाल उठा सकते। क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के वर्तमान अध्यक्षों ने तो अपने परिवार के उत्तराधिकारी को अपने दल की बागडोर सौंपने की तैयारी भी कर ली है। श्री गाताड़े का ध्यान इस ओर भी जाना चाहिए। लेखक गाताडे ने अपनी सम्यक जानकारी के अभाव में महात्मा गांधी की हत्या का प्रसंग उठाया है। उन्हें अगर जानकारी है, तो उसका खुलासा करें कि महात्मा गांधी की हत्या के बाद संघ द्वारा कहां-कहां मिठाई बांटी या बटवाई गयी? महात्मागांधी की हत्या से संबंधित मुकदमें की सुनवाई न्यायमूर्ति आत्माचरण की विशेष अदालत में 26 मई, 1948 को लालकिले में शुरु हुयी थी जिसका निर्णय 110 पृष्ठों में 10 जनवरी, 1949 को घोषित करते हुए माननीय न्यायाधीशों ने असंदिग्ध शब्दों में यह घोषणा कर दी थी कि महात्मा गांधी की हत्या के षडयंत्र से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कोई संबंध नहीं था। इस निर्णय की अपील पंजाब उच्च न्यायालय में की गयी जिसकी सुनवाई न्यायमूर्ति भंडारी, न्यायमूर्ति अच्छूराम और न्यायमूर्ति जी.डी. खोसला की तीन सदस्यीय पूर्ण पीठ द्वारा की गयी। शिमला में घोषित निर्णय में पूर्णपीठ द्वारा असंदिग्ध रुप से संघ को निर्दोष घोषित कर दिया गया। इसके काफी दिनों बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा सन् 1966 में सर्वोच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायमूर्ति टी.एल.कपूर की अध्यक्षता में एक न्यायिक आयोग गठित कर महात्मा गांधी की हत्या की, जाँंच का कार्य सौंपा गया। इस आयोग द्वारा 101 साक्षियों के बयान दर्ज करने के साथ ही 407 दस्तावेजी सबूतों का परीक्षण करके 1968 में अपनी रिपोर्ट सौंपी गयी। इसमें सबसे महत्वपूर्ण गवाही 1948 में गृह सचिव रहे आर.एन.बनर्जी की हुयी जिन्होंने असंदिग्ध रुप से कहा था कि गांधी जी के हत्यारों का संघ से कोई संबंध नहीं था। श्री बनर्जी की गवाही का उल्लेख करते हुए कपूर आयोज की रिर्पोर्ट के पृष्ठ-76, खंड-2 में स्पष्ट रुप से कहा गया कि इस जघन्य हत्या के लिए संघ को कतई जिम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता। सावरकर जी का भी संघ से कोई संबंध नहीं था। वे हिंदू महासभा के नेता थे। लेखक गाताड़े स्वयं अपने लेख में यह स्वीकार करते हैं कि आतंकवाद का संबंध किसी धर्म से नहीं जाना चाहिए। अतः ‘हिन्दू आतंकवाद ‘ कहना सर्वथा अनुचित है। यह बात गाताड़े जी को भारत के गृहमंत्री चिदंबरम् को समझाना चाहिए। मालेगांव विस्फोट के सिलेसिले में जॉच-पड़ताल के बाद जिन लोगों को अभियुक्त बनाकर गिरफ्तार किया गया, उनमें से किसी का संबंध संघ से नहीं है। वे सभी ‘अभिनव भारत’ नामक किसी अनाम से संगठन के कर्ताधर्ता हैं। जब मुस्लिम समुदाय बड़ी संख्या में पूरे विश्व की आतंकी घटनाओं से जुड़ा पाया गया, तो भी ‘मुस्लिम आतंकवाद’ कहना उचित नहीं माना जाता, तब फिर ‘हिन्दू आतंकवाद’ कहाँ से आ गया? श्री गाताड़े जी को ‘हिन्दू धर्म’ और ‘हिन्दुत्व’ को समझने के लिए माननीय सर्वोच्च न्यायालय की पूर्णपीठ(जिसमें न्यायमूर्ति जे.एस.वर्मा, न्यायमूर्ति एन.पी.सिंह एवं न्यायमूर्ति के. वेंकट स्वामी शामिल थे) द्वारा दिनांक 11.12.95 को घोषित निर्णय का गंभीरता से अध्ययन करना चाहिए। इस निर्णय का एक महत्वपूर्ण अंश निम्नवत् हैः- ”हिन्दू धर्म के बारे में विचार करते हुए हिन्दू धर्म की परिभाषा करना अथवा इसकी संतोषजनक व्याख्या करना यदि असंभव न माना जाय, तो कठिन अवश्य है। अन्य धर्मो (विश्व में प्रचलित) की भांति पूजा नहीं की जाती है। किसी एक ही सिध्दांत में विश्वास करना इसमें आवश्यक नहीं है। यह किसी एक दार्शनिक धारणा में विश्वास रखने का आग्रह नहीं करता है और न ही एक ही प्रकार के धार्मिक कर्मकांडों का पालन करने को कहता है। वस्तुतः यह किसी मत अथवा पांथिक विश्वास के लिए आवश्यक संकीर्ण परंपरागत विशेषताओं अथवा मान्यताओं को यह संतुष्ट करता नहीं दिखायी पड़ता। इसे एक जीवन दर्शन के अतिरिक्त कुछ नहीं कहा जा सकता है।” विश्व प्रसिध्द दार्शनिक एवं भारत के राष्ट्रपति रहे डॉ. राधाकृष्णन् ने अपनी पुस्तक ‘हिन्दू व्यू ऑफ लाइफ’ के पृष्ठ -12 पर कहा है कि ”सिन्धु नदी के भारतीय तटों की ओर निवास करने वाले जन को फारस और अन्य पश्चिमी आक्रांताओं द्वारा हिंदू ही कहा गया।” डॉ. राधाकृष्णन् के अनुसार हिन्दू शब्द का मूलतः महत्व पांथिक विचार के बजाय भौगोलिक अधिक है। उनकी पुस्तक ‘इंडियन फिलॉसफी’ भाग-1 के पृष्ठ 22-23 पर लिखा गया है- ”इतिहास के सभी ज्ञात काल खंड और सभी परिस्थितियों में से जिनसे भारत गुजरा है, एक स्पष्ट और विशिष्ट पहचान दृष्टिगत होती है। हिन्दू धर्म ने अपने सुनिश्चित मनोवैज्ञानिक रुझान को दृढ़तापूर्वक अपनाये रखा और यह उसकी विशिष्ट विरासत भी बन गयी और यही भारतीय जन की मौलिक चारित्रिक विशेषता भी बनी रहेगी, जब तक उन्हें स्वतंत्र एवं पृथक जीवन जीने का सुअवसर प्राप्त होता रहेगा।” प्रसिध्द स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और स्वराज्य के उद्धोषक बाल गंगाधर तिलक ने अपने महत्वपूर्ण ग्रंथ ‘गीतारहस्य’ में हिन्दू धर्म की बड़ी उदार व्याख्या इस रुप में की है-” वेदों के प्रति आदरभाव इस विचार की मान्यता कि मुक्ति के मार्ग अनेक है इस सत्य की अनुभूति कि देव अनेक हैं जिनकी पूजा की जा सकती है-यह ही हिन्दू धर्म की मुख्य विशेषतायें हैं।” ‘विश्व शब्दकोश ब्रिटानिया’ के 15 वें संस्करण में सार रुप में हिन्दुत्व को निम्नवत् परिभाषित किया गया हैः-”हिन्दुत्व एक सभ्यता भी है और अनेक धार्मिक विचारों का संग्रहीत रुप भी है जिसका न कोई अन्त है और न ही आदि जिसका न कोई संस्थापक है और न कोई केंद्रीय अधिकारी। जिसकी न कोई वंश परंपरा है और न कोई संगठन। हिन्दुत्व को परिभाषित करने के प्रत्येक प्रयत्न अभी तक किसी न किसी रुप में असंतोषजनक ही रहे हैं। हिंदुत्व के दिग्गज विद्वान जिनमें स्वयं हिन्दू भी थे, इसे पारिभाषित करने में असफल रहे हैं क्योंकि सभी ने इसके भिन्न-भिन्न पक्षों पर ही बल दिया है।” पता नहीं सुभाष गाताड़े ने यह निष्कर्ष किस आधार पर निकाल लिया कि सावरकर जी द्वारा लिखित पुस्तक ‘हिन्दुत्व’ ही सभी सरसंघचालकों के लिए ‘बाइबिल’ है। संघ का हिन्दुत्व स्वामी विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस, अरविंद घोष आदि द्वारा प्रतिपादित सिध्दांतों पर आधारित है जिसमें कट्टरता के लिए कोई स्थान नहीं है। श्री गाताड़े ने देश विभाजन के पूर्व करांची में संघ कार्यकर्ताओं द्वारा किये गये किसी विस्फोट का भी जिक्र किया है। वे देश विभाजन के पूर्व पश्चिमी पाकिस्तान एवं नौवारवाली आदि स्थानों पर दस लाख से अधिक हिंदुओं एवं सिखों के बर्बर नरसंहार का उल्लेख करना शायद भूल गये। यदि उस नरसंहार के जवाब में पाक क्षेत्रों में हिंदुओं ने आत्मरक्षा में कहीं विस्फोट आदि किया हो तो उसे अनुचित कैसे कहा जा सकता है? पाक प्रेरित आतंकियों द्वारा 26.11.2008 को देश की आर्थिक राजधानी मुंबई पर किया गया हमला बिल्कुल ताजा है। अमेरिका, रुस, ब्रिटेन और भारत जैसे गैर मुस्लिम देश वर्षों से आतंकवादियों के निशाने पर हैं। गाताड़े जी का इस विश्वव्यापी आतंकवाद पर क्या कहना है?


शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

लाख दुखों की एक दवा….

ऊँची मुंडेर पर बैठी महारानी साहिबा और उनके द्वारा नियुक्त जनता के प्रधानमंत्री से जनता गुहार लगा रही है. परेशान जनता का मनोरंजन राजकुमार ना ना प्रकार की नौटंकियों से करने की कोशिश कर रहा है. मगर जनता अपनी ही हाँके जा रही है.

हुजूर माई बाप, महँगाई बहुत बढ़ गई है.
खाने को दाना नहीं, अनाज सड़ रहा है.
आपके मंत्री रोज नए भ्रष्टाचार के रिकार्ड स्थापित कर रहे है.
आतंकियों को सजा नहीं हो रही.
देशद्रोही खुले आम देश की अखंडता को ललकार रहे है.
पड़ोसी देश परेशान कर रहे है.
लाल आतंक खून पी रहा है.
अंतहीन सूची….
आपके पास कोई जवाब है?

महारानी ने प्रधानमंत्री की ओर देखा. जनता नाराज है. पूछा, राजकुमार का राजतिलक कैसे होगा? है कोई हल, कोई जवाब?

प्रधानमंत्री ने आदतवश मूंडी हिलाई. है ना हल, है ना जवाब.

हिन्दू आतंकवाद!!!