सोमवार, 8 नवंबर 2010

अक्टूबर क्रांति की लेनिन के संदर्भों में एक आधुनिक समीक्षा

वामपंथ में शब्दों का विशेष महत्व है । अपने आंदोलन की शुरुआत से ही कम्युनिस्टों को नारों की ताकत का अंदाजा था । मानवीय विचारों का अणुरूप शब्द यदि सही चुना जाये तो विचारधारा का प्रसार तेजी से होता है ।

कम्युनिस्ट विचारधारा एक रंगीन चश्मे से देख कर लिखी गयी एक शानदार इबारत है , शब्द हैं जो अनजानों को खींचते है, आकर्षित करते हैं और धीरे से एक सोची समझी शब्द रचना के द्वारा हमारी लोकतान्त्रिक और देसी सामाजिक संरचनाओं को बेकार, बदनुमा और बुरा घोषित करते हैं .

पर वक्त बदल चुका है, परियों और जिन्नों की कहानियों की तहकीकात की जा सकती है, मसीहा और गरीब के रिश्तों पर बनी फिल्मों की परतों के नीचे छिपे लाल रंग की खूनी वीभत्सता को पहचाना जा सकता है .

यह एक विचारणीय बात है कि कम्युनिस्ट दलों के पास लेखकों का एक बड़ा दस्ता होता है । जिसे वह हरावल दस्ता भी कहते हैं । यह लोग मजदूर नहीं होते हैं। यह लोग शब्द गढ़ने में माहिर होते हैं । एक तरफ यह लोग विरोधयों को तीखे शब्द प्रहार से हराते हैं तो दूसरी ओर यही लोग भोले-भाले श्रमिक वर्ग को हृदय को छू लेने वाले नारों से मर मिटने के लिए आंदोलित करते हैं ।

इस दलों के नेता तीव्र भावनात्मक व्यक्तित्व के मालिक होने के साथ साथ प्रतिक्रियावादी एवं उग्र होते हैं । आइये इन्हीं संदर्भों में इस विचारधारा के एक मूल स्तंभ – लेनिन – की समीक्षा की जाय ।

रूस की अक्टूबर क्रांति के महानायक लेनिन एक अभिजात्य वर्ग मे जन्मे थे । उनका आरंभिक जीवन आराम और सुविधाओं में बीता था । लेनिन ने अपने पिता को सत्ता से नजदीक होने पर मिलने वाले सुखों को घर लाते हुए देखा था ।

सोलह वर्ष की उम्र में लेनिन के पिता की आकस्मिक मृत्यु हो गई । इसी दौरान लेनिन के बड़े भाई को रूस के शासक ‘ज़ार’ – अलेक्सेंडर तृतीय – की हत्या के षड्यंत्र में शामिल होने के आरोप में फाँसी हो गई । उनकी बहन को देश निकाला दिया गया । यह 1887 की बात है । रूस की क्रांति से 30 साल पहले की । इन घटनाओं ने उनके जीवन को अस्तव्यस्त कर दिया । संघर्ष और शासन से बचते हुए उन्होंने कानून की डिग्री प्राप्त की । इसी बीच उनका मार्क्स के विचारों से परिचय हुआ ।

लेनिन ने अपनी वकालत के दौरान देखा कि श्रमिक वर्ग भावनात्मक रूप से आंदोलित वर्ग था । उनके दुख सुख की बात करने मात्र से वह अपना सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार हो जाता था ।

लेनिन का हृदय शासन के प्रति विद्रोह से भरा था । उनके परिवार की और स्वयं की कठिनाइयों का कारण रूसी शासक यदि नष्ट किया जा सके तो ही उन्हें जीवन में शांति मिल सकती थी । इस विद्रोही विचारधारा को कम्युनिस्ट विचारधारा के साँचे में ढाल कर एक बारूद का निर्माण हो चुका था । श्रमिक वर्ग इसमें एक विशेष भूमिका निभाने वाले थे । श्रमिकों के भविष्य के शासक की पूर्ण एवं महान सत्ता के रूप में एक नया इतिहास रचा जा रहा था ।

ध्यान रहे कि भावी सत्ता श्रमिकों की नहीं थी – केवल उनके नाम पर थी । सत्ता लेनिन की थी । एक ऐसी केंद्रीकृत सत्ता जो किसी को भी मानवीय मूल्यों से भ्रष्ट कर सकती थी ।

1905 की रूसी क्रांति ने परिवर्तनों की शुरुआत की । पर यह मूल रूप से एक असफल क्रांति थी । इस काल में रूस में हत्याओं का एक नया दौर शुरू हुआ जो शासन एवं विरोधी – दोनों ही पक्षों के द्वारा – अपने मंसूबों को पूरा करने के लिए प्रयोग में लाया गया ।

इस पूरे दौर में भारतीय आंदोलनों की नैतिक एवं मूलतः अहिंसापरक पृष्ठभूमि एवं समाज सुधार की विचारधारा रूसी आंदोलनों में एक सिरे से गायब थी । रूस में लेनिन समर्थकों का ज़ोर सत्ता को ताकत के बल पर पाने में था । लोकतान्त्रिक मूल्यों का दूर-दूर तक कोई निशान न था ।

1914 में प्रथम विश्व युद्ध के शुरू होने के बाद रूसी अर्थ व्यवस्था चौपट हो गई, विशाल स्तर पर बदहाली और अराजकता फैली ।

1917 में विश्व युद्ध के अंतिम दौर में रूस के जर्जर हालातों, तीव्र जन विरोध और अपने ही विफल शासन से हार कर ज़ार – निकोलस द्वितीय – ने सत्ता छोड़ दी । निकोलस द्वितीय के शासन ने यहूदीयों के खिलाफ अभियान भी देखा था । रूसी इतिहास में यह एक भयानक समय था ।

एक कामचलाऊ / अल्पकालिक राजनैतिक शासन की स्थापना हुई । लेनिन अभी भी निर्वासन में थे । लेनिन ने तुरंत ही एक नया नारा दिया – सत्ता की ओर बढ़ते हुए उनके कदम इस नई बदली हुई परिस्थिति में सफलता भाँप सकते थे । लेनिन एक विशेष रेलगाड़ी में अप्रैल 1917 में एक विशिष्ट व्यक्ति की भाँति रूस लौटे । मज़दूरों के हितों के नारे देने वाला कथित महानायक एक विशिष्ट रेलगाड़ी में एक अधिनायक की भाँति रूस लौट रहा था ।

लेनिन ने लौटते ही पूर्ण क्रांति का नारा दिया और सत्ता की तरफ नए सिरे से बढ़ना प्रारंभ किया ।

तेजी से बढ़ते घटनाक्रमों में सेना के द्वारा अल्पकालिक सरकार को ख़तरे की परिस्थितियों ने लेनिन की राजनैतिक सत्ता पर पकड़ बढ़ा दी। अगस्त और सितंबर 1917 में पेट्रोग्राड एवं मॉस्को कर्मचारी सभाओं (सोवियेत) में बहुमत हासिल करने के साथ ही अक्टूबर क्रांति का रास्ता प्रशस्त हुआ । लेनिन इस बीच पुनः छुपे हुए थे और उनकी अक्टूबर में वापसी के साथ ही उन्होंने सत्ता को कब्जे में लेने का नारा दिया ।

लेनिन का शासन प्रारंभ हुआ । बहुत आशाएँ थी इससे ।

लेकिन ‘लाल आतंक’ जैसे विरोधियों की हत्याओं वाले कार्यक्रमों ने आने वाले दशकों में सभ्य एवं लोकतान्त्रिक समाजों में लेनिन को क्रांति के महानायक की बजाय एक क्रूर सत्ताधीश के रूप में स्थापित किया ।

जुलाई 1918 में ज़ार निकोलस द्वितीय की परिवार सहित हत्या के साथ कई विचारकों का मानना है कि लेनिन की राजघराने से संबद्ध प्रतिशोध भरी जीवन यात्रा का एक विशेष पड़ाव पूरा हुआ । कुछ लोगों का ऐसा भी कहना है कि लेनिन को इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता ।

कम्युनिस्ट शासन के पतन के बाद राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन का स्वयं ज़ार – निकोलस द्वितीय – के आधिकारिक रूप से आयोजित अंतिम संस्कार में आयोजित कार्यक्रम में उपस्थित होने को कम्युनिस्ट शासन के क्रियाकलापों पर रूस के लोगों की अंतिम राय के रूप में समझा जा सकता है ।

लेनिन एक वकील थे । मजदूर नहीं । मजदूर और केवल मजदूर के नारे ने उन्हें ताकत और सत्ता के केंद्र में एकमात्र निर्णायक के रूप में स्थापित किया । यह एक बड़ा ही सफल लेकिन झूठा प्रचार था । एक वकील मजदूरों का शासक बन गया और मजदूर सोचते रहे कि सत्ता उनके हाथ में थी । नारेबाजी और सत्ता की यह बेइंतिहा चाह स्टालिन और बाद में भी जारी रही ।

रूस में जो हुआ उसके जटिल सामाजिक एवं राजनैतिक कारण थे, लेकिन उसका तथाकथित क्रांति के द्वारा समाधान करने की कोशिश एक भूखे इंसान को ‘चोकलेट’ की दुकान बाँट कर वाह-वाही लूटने के समान था . इस शासन में खाई जाने वाली ‘चोकलेट’ की मात्रा, ‘चोकलेट’ की दुकान, एवं ‘चोकलेट’ की दुकान को लूटने के अधिकार – तीनों पर लेनिन का पूर्ण एवं एकमात्र अधिकार था ।

इसकी तुलना में हमारे भारतीय आन्दोलन एवं विचारधाराएँ महानता की श्रेणी में आते हैं . अक्टूबर क्रांति बौनी हो क्षितिज पर धूमिल हो जाती है ।

हम भ्रष्टन के, भ्रष्ट हमारे !!!

देश की सबसे बड़ी और पुरानी पार्टी जो महात्मा गांधी से भी अपनी रिश्ता जोड़ते हुए नहीं थकती है, की अखिलभारतीय बैठक की सबसे बड़ी चिंता वह भ्रष्टाचार नहीं है जिससे केंद्र सरकार की छवि मलिन हो रही है। दुनिया के भ्रष्टतम देशों में हम अपनी जगह बना रहे हैं। उनकी चिंता ए. राजा, सुरेश कलमाड़ी, शीला दीक्षित और शहीदों के फ्लैट हड़प जाने वाले मुख्यमंत्री नहीं हैं। चिंता है उस हिंदू आतंकवाद की जो कहीं दिखाई नहीं देता किंतु उसे पैदा करने की कोशिशें हो रही हैं।

नैतिकता और समझदारी पर उठते सवालः

मुंबई के आर्दश ग्रुप हाउसिंग सोसाइटी के मामले ने हमारी राजनीति की नैतिकता और समझदारी पर फिर सवाल कर दिए हैं। जब मुख्यमंत्री जैसे पद पर बैठा व्यक्ति भी कारगिल के शहीदों के खून के साथ दगाबाजी करे और सैनिकों की विधवाओं के लिए स्वीकृत फ्लैट पर नजरें गड़ाए हो, तो आप क्या कह सकते हैं। किंतु यही भ्रष्टाचार अब हमारा राष्ट्रीय स्वभाव बन गया है। हमारी लालचें हमें संवेदना से रिक्त कर चुकी हैं और हमें अब किसी भी बात से शर्म नहीं आती। ऐसे कठिन समय में हम उम्मीद से खाली हैं क्योंकि इस लालच से मुक्ति की कोई विधि हमारे पास नहीं है। कामनवेल्थ खेलों में हमने अपनी आंखों से इसी बेशर्मी के तमाम उदाहरण देखे, किंतु हम ऐसे सवालों पर लीपापोती से आगे बढ़ नहीं पाते। जाहिर तौर पर हमें अब इन सवालों पर सोचने और इनसे दो-दो हाथ करने की जरूरत है। क्या यह मुद्दा वास्तव में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के इस्तीफे से खत्म हो जाएगा? उनकी जरा सी असावधानी कुर्सी के लिए खतरा बन गयी। किंतु जैसा वातावरण बन चुका है क्या उसमें कोई राजनेता या राजनीतिक दल आगे से भ्रष्टाचार न करने की बात सोच सकता है ? क्योंकि राजनीतिक क्षेत्र में पद इसी तरह मिल और बंट रहे हैं।

राजनीति में धन का बढ़ता असरः

राजनीति में धन एक ऐसी आवश्यक्ता है जिसके बिना न तो पार्टियां चल सकती हैं न चुनाव जीते जा सकते हैं। इसी से भ्रष्टाचार फलता-फूलता है। राष्ट्रीय संपत्ति की लूट और सरकारी संपत्ति को निजी संपत्ति में बदलने की कवायदें ही इस देश में फल-फूल रही हैं। हम भारत के लोग इस पूरे तमाशे को होता हुआ देखते रहने के लिए विवश हैं। हर घटना के बाद हमारे पास बलि चढ़ाने के लिए एक मोहरा होता है और उसकी बलि देकर हम अपने पापों का प्रायश्चित कर लेते हैं। कामनवेल्थ के लिए कलमाड़ी और अब आर्दश सोसायटी के लिए शायद चव्हाण की बलि हो जाए। किंतु क्या इससे हमारा राजनीतिक तंत्र कोई सबक लेगा, शायद नहीं क्योंकि राजनीति में आगे बढ़ने की एक बड़ी योग्यता भ्रष्टाचार भी है। इसी गुण ने तमाम राजनेताओं की अपने आलाकमानों के सामने उपयोगिता बना रखी है। वफादारी और भ्रष्टाचार की मिली-जुली योग्यताएं ही राजनीतिक क्षेत्र में एक आदर्श बन चुकी है। शहीदों की विधवाओं के फ्लैट निगल जाने का दुस्साहस हमें यही घटिया राजनीति देती है।

भारतीय जनता का स्मृतिदोषः

आज हमारे राजनीतिक तंत्र को यह लगने लगा है कि भारत की जनता की स्मृति बहुत कमजोर है और वह कुछ भी गलत करेंगें तो भी उसे जनता थोड़े समय बाद भूल जाएगी। चुनावों के कई फैसले, कई बार यही बताते हैं। आप मुंबई हमलों की याद करें कि जिसके चलते महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख और केंद्रीय मंत्री शिवराज पाटिल को अपनी कुर्सियां गंवानीं पड़ीं किंतु बाद में हुए लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को भारी सफलता मिली। ऐसे स्मृतिदोष को चलते ही हमारा हिंदुस्तान बहुत से संकटों से मुकाबिल है। हमें अपनी स्मृति के साथ अपने राजनीतिक तंत्र पर नियंत्रण रखने की विधि भी विकसित करनी पड़ेगी वरना यह लालच हमारे जनतंत्र को बेमानी बना देगा, इसमें दो राय नहीं है। हमें भ्रष्टाचार को शिष्टाचार बनने से रोकना होगा वरना हमारे पास उस खोखले जनतंत्र के अलावा कुछ नहीं बचेगा, जिसे राजनीति की दीमक चाट चुकी होगी।सही मायने में भ्रष्टाचार भारत की एक ऐसी समस्या बन चुका है जिससे पूरा समाज त्राहि-त्राहि कर रहा है किंतु उससे बचने का कोई कारगर रास्ता नजर नहीं आता। अब जबकि ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल की रेंकिंग में भारत तीन पायदान फिसलकर 87 वें नंबर पर जा पहुंचा है तो हमें यह सोचना होगा कि दुनिया में हमारा चेहरा कैसा बन रहा है। संस्था का यह अध्ययन बताता है कामनवेल्थ खेलों ने हमारी भ्रष्ट छवि में और इजाफा किया है। इससे पता चलता है कि भ्रष्टाचार को रोकने में हम नाकाम साबित हुए हैं और दुनिया के अतिभ्रष्ट देशों की सूची में हमारी जगह बनी हुयी है। ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल के चेयरमैन पीएस बावा का कहना है कि भारत में कुशल प्रशासक होने के बावजूद गर्वनेंस का स्तर नहीं सुधरना, चिंताजनक और शर्म का विषय है।

विकास को खा रहा है भ्रष्टाचारः

निश्चय ही भारत जैसे महान लोकतंत्र के लिए भ्रष्टाचार की समस्या एक बड़ी चुनौती है। इसके चलते भारत का जिस तेजी से विकास होना चाहिए वह नहीं दिखता। साथ ही तमाम विकास की योजनाओं का धन भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है। इसका सबसे बड़ा शिकार वह तबका होता है जो सरकारी योजनाओं का लाभार्थी होता है। उसका दर्द बढ़ जाता है, जबकि सरकारी योजनाएं कागजों में सांस लेती रहती हैं। सरकार के जनहितकारी प्रयास इसीलिए जमीन पर उतरते नहीं दिखते। इसी तरह सार्वजनिक योजनाओं की लागत भ्रष्टाचार के नाते बढ़ जाती है। देश की बहुत सी पूंजी का प्रवाह इसी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है। तमाम कानूनों और प्रतिरोधक उपायों के बावजूद हमारे देश में यह समस्या बढ़ती जा रही है। सूचना के अधिकार कानून के बावजूद , पारदर्शिता के सवाल पर भी हम काफी पिछड़े हुए हैं। एक लोकतंत्र के लिए ये स्थितियां चिंताजनक है। क्या हम इसके समाधानों की ओर बढ़ नहीं सकते, यह सवाल सबके मन में है। आखिर क्या कारण है भ्रष्टाचार हमारे समाज जीवन की एक अपरिहार्य जरूरत बन गया है।

जनता का मानस भी ऐसा बन गया है कि बिना रिश्वत दिए कोई काम नहीं हो सकता। क्या हम ऐसे परिवेश को बेहतर मान सकते हैं। जहां जनता के मन में इतनी निराशा और अवसाद घर कर गया हो। क्या यह देश के जीवन के लिए एक चिंताजनक स्थिति नहीं है। सरकारी स्तर पर भ्रष्टाचार को रोकने के सारे प्रयास बेमानी साबित हुए हैं। भ्रष्टाचार नियंत्रण और जांच को लेकर बनी हमारी सभी एजेंसियों ने भी कोई उम्मीद नहीं जगायी है। ऐसे में भ्रष्टाचार के राक्षस से लड़ने का रास्ता सिर्फ यही है कि जनमन में जागृति आए और लोग संकल्पित हों। किंतु यह काम बहुत कठिन है। जनता के सामने विकल्प बहुत सीमित हैं। वह अपने स्तर पर सारा कुछ नहीं कर सकती। किंतु एक जागृत समाज काफी कुछ कर सकता है इसमें कोई संदेह नहीं है। देश का सबसे बड़ा राजनीतिक दल यानि मुख्यधारा की राजनीति ही अगर भ्रष्टाचार के सवाल पर किनारा कर चुकी है, तो क्या हम भारत के लोग अपने देश की छवि को बचाने के लिए कुछ जतन करेंगें या इसे यूं ही कलमाड़ी और ए.राजा जैसों के भरोसे छोड़ देगें।

शनिवार, 6 नवंबर 2010

क्या "लव जेहादी" अधिक सक्रिय होते जा रहे हैं…?

नागपुर के भानखेड़ा इलाके में योगेश्वर साखरे का परिवार रहता है, कुछ दिनों पहले तक यह एक सामान्य खुशहाल परिवार था। एक पुत्र प्रतीक (28), बड़ी पुत्री पल्लवी (20) और उससे छोटी रिंकू। लगभग सवा माह पहले एक गम्भीर बीमारी की वजह से प्रतीक की मृत्यु हो गई, और जब प्रतीक के गुज़रने के सवा महीने बाद उसके क्रियाकर्म संस्कार की रस्म निभाई जा रही थी, ठीक उसी दिन पल्लवी की मौत की खबर आई।

पल्लवी की लाश नागपुर के एक सार्वजनिक शौचालय में पाई गई और पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला कि वह चार माह की गर्भवती भी थी। पल्लवी का गला उसी के कुर्ते से घोंटा गया था और उसकी अर्धनग्न लाश पर कुछ घाव भी पाये गये। गहन तफ़्तीश और मोबाइल रिकॉर्ड की छानबीन के बाद पुलिस ने मोहम्मद शमीम (25) नामक एक शख्स को गिरफ़्तार किया है।मोहम्मद शमीम पहले से शादीशुदा है और नौ माह की बच्ची का बाप भी। हालांकि इस मामले में पुलिस ने अब तक सिर्फ़ हत्या का मामला दर्ज किया है, बलात्कार का नहीं, लेकिन कानूनी विशेषज्ञों से सलाह-मशविरा किया जा रहा है। पल्लवी साखरे, नागपुर के PWS कॉलेज में बीए प्रथम वर्ष की छात्रा थी, जबकि शमीम एक कारपेंटर (बढ़ई) है।


पुलिस जाँच में पता चला है कि पल्लवी और शमीम के रिश्ते 2 साल से थे, और इसके पहले भी पल्लवी एक बार गर्भपात करवा चुकी थी। सूत्रों के मुताबिक पल्लवी शमीम से दूसरे गर्भपात के लिये पैसा माँग रही थी साथ ही उस पर शादी के लिये दबाव भी बना रही थी, तथा 7 मार्च (रविवार) को उसने उसके घर आकर हंगामा करने की धमकी भी दी थी। पुलिस के अनुसार शमीम ने उसे मिलने के लिये बुलाया और उनके बीच हुई गर्मागर्मी के बाद शमीम ने उसका गला घोंट दिया और लाश को सार्वजनिक शौचालय में छिपा दिया, जहाँ से वह तड़के 8 मार्च को बरामद हुई। पुलिस की मार खाने के बाद शमीम ने बताया है कि उसकी पत्नी रिज़वाना सुल्तान को यह बात पता थी और उसे उसकी दूसरी शादी से कोई आपत्ति नहीं थी। पल्लवी की छोटी बहन रिंकू ने बताया कि पल्लवी के सेलफ़ोन पर शनिवार रात 10 बजे शमीम का फ़ोन आया था और उसके बाद से वह गायब हो गई, चूंकि परिवार पहले से ही युवा पुत्र के गम में डूबा था और कर्मकाण्ड के कार्यक्रम की तैयारियों में व्यस्त था इसलिये उन्होंने तुरन्त पुलिस को खबर करने में कोताही बरती, और शायद यही पल्लवी की मौत का कारण बना। नागपुर नगरनिगम में कार्यरत योगेश्वर और शारदाबाई साखरे के परिवार पर डेढ़ माह के भीतर यह दूसरा वज्रपात हुआ।

यह तो हुआ घटना का विवरण, लेकिन इससे उठने वाले सवाल बहुत गम्भीर हैं और एक सामाजिक समस्या के साथ-साथ “लव जेहादियों” की घृणित मानसिकता को भी दर्शाती है।

1) एक अच्छे परिवार की पढ़ी-लिखी लड़की, किसी कम पढ़े-लिखे और शादीशुदा मुस्लिम के जाल में कैसे फ़ँस गई?

2) दो साल से शोषण करवा रही, और एक बार गर्भपात करवा चुकी उस मूर्ख लड़की को क्या तब भी पता नहीं चला कि मोहम्मद शमीम की नीयत ठीक नहीं है?

3) आखिर पढ़ी-लिखी हिन्दू लड़कियाँ, किस प्रकार से कारपेंटर, ऑटो रिक्शा चालक, सब्जी बेचने वाले ( यहाँ तक कि बेरोज़गार) मुसलमान युवकों के जाल में फ़ँस जाती हैं? क्या तथाकथित प्रेम(?) करने के दौरान उनकी अक्ल घास चरने चली जाती है?

4) शमीम की बीवी उसकी दूसरी शादी के लिये सहमत थी (और बेचारी करती भी क्या?) फ़िर भी शमीम की नीयत यही थी कि पल्लवी का देह-शोषण करता रहे, और जिम्मेदारी से बचा भी रहे। यह मानसिकता क्या प्रदर्शित करती है?

5) क्या यह माना जाये कि हिन्दू लड़कियों को अधिक स्वतन्त्रता प्राप्त है इसलिये ऐसे मामले आजकल अधिक हो रहे हैं?

6) जब भी इस प्रकार का मामला (हिन्दू लड़की – मुसलमान लड़का) होता है, और हिन्दू संगठन अथवा राजनैतिक दल विरोध करते हैं तो हिन्दुओं के भीतर से ही उनका विरोध शुरु हो जाता है, इस मानसिकता को क्या कहा जाये? (सन्दर्भ - कोलकाता का रिज़वान-तोड़ी मामला)

7) जबकि ठीक इसके उलट (हिन्दू लड़का-मुस्लिम लड़की) का मामला सामने आता है तब मुसलमानों की तरफ़ से जमकर, एकजुट और परिणामकारक (सेकुलर) विरोध और जोड़तोड़ होता है (सन्दर्भ - कश्मीर का रजनीश-अमीना यूसुफ़ मामला)।

8) कर्नाटक और केरल हाईकोर्ट भी प्रथम दृष्टया मान चुके हैं कि भले ही “लव जेहाद” नाम की कोई आधिकारिक परिभाषा न हो, लेकिन पिछले 5 वर्षों में इन दोनों राज्यों की 2000 से अधिक लड़कियों में से… कुछ गायब हुई हैं, कुछ की मौत संदिग्ध स्थितियों में हुई, जबकि कुछ ने धर्म परिवर्तन किया, तो निश्चित ही कुछ न कुछ गड़बड़ है… (इसी प्रकार कुछ शहरों में “MMS ब्लैकमेल काण्ड” में भी जो लड़के पकड़ाये हैं उनमें से अधिकतर मुस्लिम ही हैं, जिन्होंने हिन्दू लड़कियों को फ़ँसाकर उनके अश्लील चित्र नेट पर अपलोड किये थे)।

http://hinduexistence.wordpress.com/2009/12/10/love-jihad-is-real-says-kerala-high-court-islamic-love-racket-in-india-for-conversion/

और तो और लन्दन से भी ऐसे मामले सामने आने लगे हैं…


9) महिला आरक्षण का विरोध करने वालों में मुस्लिम सांसद सबसे आगे और मुखर थे, तो क्या उन सांसदों को किसी ने “पिंक चड्डी” भेजने का मन बनाया है? (कल्बे जव्वाद ने तो अपरोक्ष रूप से औरतों को बच्चे पैदा करने की मशीन तक बता डाला)

बहरहाल बाकी के सवाल तो बाद में खड़े होते हैं, मुख्य सवाल पहला वाला है कि “माना, कि प्यार अंधा होता है, लेकिन क्या प्यार बहरा और मूर्ख भी होता है?” जिसके चलते हिन्दू लड़कियाँ ऐसे-ऐसे मुस्लिम नौजवानों के जाल में फ़ँस जाती हैं जिनकी औकात भी नहीं उनके परिवार के साथ उठने-बैठने की?

(सैफ़ अली खान, आमिर खान जैसों की बात अलग है, वह दो-दो हिन्दू लड़कियों को फ़ँसाना “अफ़ोर्ड” कर सकते हैं… तथा करीना या किरण राव जिस “समाज” में रहती हैं, वह समाज भी बाकी के भारत से अलग-थलग और कटा हुआ है)।

कहने का मतलब कि, यह सिर्फ़ धार्मिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक समस्या भी है, और हमें मिलकर चिन्तन करने की आवश्यकता है कि - 1) ऐसे मामले पिछले कुछ वर्षो में अचानक क्यों बढ़ गये हैं? 2) क्या “लव जेहादी” अत्यधिक सक्रिय हो गये हैं?इसी प्रकार ऐसे मामलों में दोनों धर्मों के लोगों की “प्रतिक्रिया की मानसिकता” का अध्ययन भी किया जाना चाहिये… कि 3) हिन्दू “ऐसा” रिएक्ट क्यों करते हैं तथा मुस्लिम “वैसा” रिएक्ट क्यों करते हैं? 4) यह डाटा भी एकत्रित किया जाना चाहिये कि परदे और घुटन से बाहर आ चुकी कितनी मुस्लिम लड़कियों ने हिन्दू लड़कों से प्रेम (या शादी) की है? ताकि सही-सही स्थिति पता चल सके…

बहरहाल, समाजशास्त्रियों, शोधकर्ताओं और मनोवैज्ञानिकों के लिये कई मुद्दों पर बहुत सारा काम इकठ्ठा कर दिया है मैने…। अब प्रगतिशील महिलाएं, मुझे कोसने के लिये स्वतन्त्र हैं और धर्मनिरपेक्षतावादी, मुझे गरियाने के लिये…। यदि कोई “लव जेहाद” को समस्या मानने से ही इंकार कर दे तो मैं कुछ नहीं कर सकता… जो मेरा काम था (सूचना देना) वह मैंने कर दिया… बाकी की समीक्षा, विश्लेषण, अध्ययन वगैरह बुद्धिजीवियों का शगल है, वे करेंगे ही, मैं बुद्धिजीवी तो कतई नहीं हूँ…।

आप भी एक "सलाह" (I repeat, सलाह) के रूप में (वरना "हिन्दुओं" के लिये रिज़र्व की गई पिंक चड्डी आपके माथे आयेगी…) इस पोस्ट के मुद्दों को अपनी सहेलियों, बहनों और भाईयों को भेजें… उसके बाद भी वे नहीं मानतीं तो यह उनकी चॉइस होगी…। आखिर हम लोग "कोड़े" - "बुरके" वाले तालिबानी तो हैं नहीं…कि जबरदस्ती करें…

[अचानक इस पोस्ट को लिखने का विचार इसलिये आया कि इधर उज्जैन में भी ऐसी ही एक "खिचड़ी" पक रही है, लड़की बीएससी फ़र्स्ट क्लास है और एक निजी कम्पनी में कार्यरत है, जबकि लड़का (लव जेहादी) बमुश्किल 11वीं पास है…। लड़की का बाप एक प्रतिष्ठित कपड़ा व्यवसायी है, जबकि लव जेहादी कहने को तो प्रापर्टी ब्रोकर है (लेकिन असल में मकान खाली करवाने वाला गुण्डा है)… ऐसे में भला कौन सा समझदार बाप अपनी लड़की को आत्महत्या करने देगा, लेकिन लड़की उसी से शादी करने पर आमादा है। यह बात खुलते-खुलते लगभग सभी लोग जान गये हैं, लेकिन "बाहरी लोग" इस मामले में तब तक दखल नहीं दे सकते, जब तक लड़की का बाप न चाहे…। लड़की का बाप प्रतिष्ठा और इज्जत बचाने के चक्कर में दोनों को समझाने-बुझाने में लगा हुआ है… लड़की समझ नहीं रही और लव जेहादी समझना नहीं चाहता…। इस केस में लव जेहादी शादीशुदा तो नहीं है, लेकिन दोनों के बीच की सामाजिक-आर्थिक-शैक्षणिक खाई इतनी चौड़ी है कि लड़की की "प्रेम-अक्ल" पर तरस आता है…। मामला संवेदनशील है, तथा बखेड़ा खड़ा न हो जाये इसलिये बाहरी लोग अभी चुपचाप तमाशा देख रहे हैं… देखते हैं आगे क्या होता है]

प्यार-मोहब्बत की किताबी बातें हाँकने वालों से सिर्फ़ एक सवाल… यह मोहब्बत(?) वन-वे-ट्रैफ़िक क्यों है?…… Love Jihad

मेरी पिछली पोस्ट “क्या लव जेहादी अधिक सक्रिय हो गये हैं…” के जवाब में मुझे कई टिप्पणियाँ प्राप्त हुईं और उससे भी अधिक ई-मेल प्राप्त हुए। जहाँ एक ओर बेनामियों (फ़र्जी नामधारियों) ने मुझे मानसिक चिकित्सक से मिलने की सलाह दे डाली, वहीं दूसरी ओर मेरी कुछ महिला पाठकों ने ई-मेल पर कहा कि मुस्लिम लड़के और हिन्दू लड़की के बारे में मेरी इस तरह की सोच “Radical” (कट्टर) और Communal (साम्प्रदायिक) है। ज़ाहिर है कि इस प्रकार की टिप्पणियाँ और ई-मेल प्राप्त होना एक सामान्य बात है। फ़िर भी मैंने “लव-जेहाद की अवधारणा” तथा “प्रेमी जोड़ों” द्वारा धर्म से ऊपर उठने, अमन-शान्ति की बातें करने आदि की तथाकथित हवाई और किताबी बातों का विश्लेषण करने और इतिहास में झाँकने की कोशिश की, तो ऐसे कई उदाहरण मिले जिसमें मेरी इस सोच को और बल मिला कि भले ही “लव जेहाद” नामक कोई अवधारणा स्पष्ट रूप से परिभाषित न हो, लेकिन हिन्दू-मुस्लिम के बीच प्यार-मुहब्बत के इस “खेल” में अक्सर मामला या तो इस्लाम की तरफ़ “वन-वे-ट्रैफ़िक” जैसा होता है, अथवा कोई “लम्पट” हिन्दू व्यक्ति अपनी यौन-पिपासा शान्त करने अथवा किसी लड़की को कैसे भी हो, पाने के लिये इस्लाम का सहारा लेते हैं। वन-वे ट्रैफ़िक का मतलब, यदि लड़का मुस्लिम है और लड़की हिन्दू है तो लड़की इस्लाम स्वीकार करेगी (चाहे नवाब पटौदी और शर्मिला टैगोर उर्फ़ आयेशा सुल्ताना हों अथवा फ़िरोज़ घांदी और इन्दिरा उर्फ़ मैमूना बेगम हों), लेकिन यदि लड़की मुस्लिम है और लड़का हिन्दू है, तो लड़के को ही इस्लाम स्वीकार करना पड़ेगा (चाहे वह कम्युनिस्ट इन्द्रजीत गुप्त हों या गायक सुमन चट्टोपाध्याय)…

ऊपर मैंने कुछ प्रसिद्ध लोगों के नाम लिये हैं जिनका समाज में उच्च स्थान “माना जाता है”, औरऐसे सेलेब्रिटी लोगों से ही युवा प्रेरणा लेते हैं, आईये देखें “लव जेहाद” के कुछ अन्य पुराने प्रकरण (आपके दुर्भाग्य से यह मेरी कल्पना पर आधारित नहीं हैं…सच्ची घटनाएं हैं)-

(1) जेमिमा मार्सेल गोल्डस्मिथ और इमरान खान – ब्रिटेन के अरबपति सर जेम्स गोल्डस्मिथ की पुत्री (21), पाकिस्तानी क्रिकेटर इमरान खान (42) के प्रेमजाल में फ़ँसी, उससे 1995 में शादी की, इस्लाम अपनाया (नाम हाइका खान), उर्दू सीखी, पाकिस्तान गई, वहाँ की तहज़ीब के अनुसार ढलने की कोशिश की, दो बच्चे (सुलेमान और कासिम) पैदा किये… नतीजा क्या रहा… तलाक-तलाक-तलाक। अब अपने दो बच्चों के साथ वापस ब्रिटेन। फ़िर वही सवाल – क्या इमरान खान कम पढ़े-लिखे थे? या आधुनिक(?) नहीं थे? जब जेमिमा ने इतना “एडजस्ट” करने की कोशिश की तो क्या इमरान खान थोड़ा “एडजस्ट” नहीं कर सकते थे? (लेकिन “एडजस्ट” करने के लिये संस्कारों की भी आवश्यकता होती है)…

(2) 24 परगना (पश्चिम बंगाल) के निवासी नागेश्वर दास की पुत्री सरस्वती (21) ने 1997 में अपने से उम्र में काफ़ी बड़े मोहम्मद मेराजुद्दीन से निकाह किया, इस्लाम अपनाया (नाम साबरा बेगम)। सिर्फ़ 6 साल का वैवाहिक जीवन और चार बच्चों के बाद मेराजुद्दीन ने उसे मौखिक तलाक दे दिया और अगले ही दिन कोलकाता हाइकोर्ट के तलाकनामे (No. 786/475/2003 दिनांक 2.12.03) को तलाक भी हो गया। अब पाठक खुद ही अन्दाज़ा लगा सकते हैं कि चार बच्चों के साथ घर से निकाली गई सरस्वती उर्फ़ साबरा बेगम का क्या हुआ होगा, न तो वह अपने पिता के घर जा सकती थी, न ही आत्महत्या कर सकती थी…

अक्सर हिन्दुओं और बाकी विश्व को मूर्ख बनाने के लिये मुस्लिम और सेकुलर विद्वान(?) यह प्रचार करते हैं कि कम पढ़े-लिखे तबके में ही इस प्रकार की तलाक की घटनाएं होती हैं, जबकि हकीकत कुछ और ही है। क्या इमरान खान या नवाब पटौदी कम पढ़े-लिखे हैं? तो फ़िर नवाब पटौदी, रविन्द्रनाथ टैगोर के परिवार से रिश्ता रखने वाली शर्मिला से शादी करने के लिये इस्लाम छोड़कर, बंगाली क्यों नहीं बन गये? यदि उनके “सुपुत्र”(?) सैफ़ अली खान को अमृता सिंह से इतना ही प्यार था तो सैफ़, पंजाबी क्यों नहीं बन गया? अब इस उम्र में अमृता सिंह को बच्चों सहित बेसहारा छोड़कर करीना कपूर से इश्क की पींगें बढ़ा रहा है, और उसे भी इस्लाम अपनाने पर मजबूर करेगा, लेकिन खुद पंजाबी नहीं बनेगा (यही है असली मानसिकता…)।

शेख अब्दुल्ला और उनके बेटे फ़ारुख अब्दुल्ला दोनों ने अंग्रेज लड़कियों से शादी की, ज़ाहिर है कि उन्हें इस्लाम में परिवर्तित करने के बाद, यदि वाकई ये लोग सेकुलर होते तो खुद ईसाई धर्म अपना लेते और अंग्रेज बन जाते…? और तो और आधुनिक जमाने में पैदा हुए इनके पोते यानी कि जम्मू-कश्मीर के वर्तमान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी एक हिन्दू लड़की “पायल” से शादी की, लेकिन खुद हिन्दू नहीं बने, उसे मुसलमान बनाया, तात्पर्य यह कि “सेकुलरिज़्म” और “इस्लाम” का दूर-दूर तक आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है और जो हमें दिखाया जाता है वह सिर्फ़ ढोंग-ढकोसला है। जैसे कि गाँधीजी की पुत्री का विवाह एक मुस्लिम से हुआ, सुब्रह्मण्यम स्वामी की पुत्री का निकाह विदेश सचिव सलमान हैदर के पुत्र से हुआ है, प्रख्यात बंगाली कवि नज़रुल इस्लाम, हुमायूं कबीर (पूर्व केन्द्रीय मंत्री) ने भी हिन्दू लड़कियों से शादी की, क्या इनमें से कोई भी हिन्दू बना? अज़हरुद्दीन भी अपनी मुस्लिम बीबी नौरीन को चार बच्चे पैदा करके छोड़ चुके और अब संगीता बिजलानी से निकाह कर लिया, उन्हें कोई अफ़सोस नहीं, कोई शिकन नहीं। ऊपर दिये गये उदाहरणों में अपनी बीवियों और बच्चों को छोड़कर दूसरी शादियाँ करने वालों में से कितने लोग अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे हैं? तब इसमें शिक्षा-दीक्षा का कोई रोल कहाँ रहा? यह तो विशुद्ध लव-जेहाद है।

इसीलिये कई बार मुझे लगता है कि सानिया मिर्ज़ा के शोएब के साथ पाकिस्तान जाने पर हायतौबा करने की जरूरत नहीं है, मुझे विश्वास है कि 2-4 बच्चे पैदा करने के बाद “रंगीला रसिया” शोएब मलिक उसे “छोड़” देगा और दुरदुराई हुई सानिया मिर्ज़ा अन्ततः वापस भारत में ही पनाह लेगी, और उस वक्त भी उससे सहानुभूति जताने में नारीवादी और सेकुलर संगठन ही सबसे आगे होंगे।

वहीदा रहमान ने कमलजीत से शादी की, वह मुस्लिम बने, अरुण गोविल के भाई ने तबस्सुम से शादी की, मुस्लिम बने, डॉ ज़ाकिर हुसैन (पूर्व राष्ट्रपति) की लड़की ने एक हिन्दू से शादी की, वह भी मुस्लिम बना, एक अल्पख्यात अभिनेत्री किरण वैराले ने दिलीपकुमार के एक रिश्तेदार से शादी की और गायब हो गई।

प्रख्यात (या कुख्यात) गाँधी-नेहरु परिवार के मुस्लिम इतिहास के बारे में तो सभी जानते हैं। ओपी मथाई की पुस्तक के अनुसार राजीव के जन्म के तुरन्त बाद इन्दिरा और फ़िरोज़ की अनबन हो गई थी और वह दोनों अलग-अलग रहने लगे थे। पुस्तक में इस बात का ज़िक्र है कि संजय (असली नाम संजीव) गाँधी, फ़िरोज़ की सन्तान नहीं थे। मथाई ने इशारों-इशारों में लिखा है कि मेनका-संजय की शादी तत्कालीन सांसद और वरिष्ठ कांग्रेस नेता मोहम्मद यूनुस के घर सम्पन्न हुई, तथा संजय गाँधी की मौत के बाद सबसे अधिक फ़ूट-फ़ूटकर रोने वाले मोहम्मद यूनुस ही थे। यहाँ तक कि मोहम्मद यूनुस ने खुद अपनी पुस्तक “Persons, Passions & Politics” में इस बात का जिक्र किया है कि संजय गाँधी का इस्लामिक रिवाजों के मुताबिक खतना किया गया था।

इस कड़ी में सबसे आश्चर्यजनक नाम है भाकपा के वरिष्ठ नेता इन्द्रजीत गुप्त का। मेदिनीपुर से 37 वर्षों तक सांसद रहने वाले कम्युनिस्ट (जो धर्म को अफ़ीम मानते हैं), जिनकी शिक्षा-दीक्षा सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज दिल्ली तथा किंग्स कॉलेज केम्ब्रिज में हुई, 62 वर्ष की आयु में एक मुस्लिम महिला सुरैया से शादी करने के लिये मुसलमान (इफ़्तियार गनी) बन गये। सुरैया से इन्द्रजीत गुप्त काफ़ी लम्बे समय से प्रेम करते थे, और उन्होंने उसके पति अहमद अली (सामाजिक कार्यकर्ता नफ़ीसा अली के पिता) से उसके तलाक होने तक उसका इन्तज़ार किया। लेकिन इस समर्पणयुक्त प्यार का नतीजा वही रहा जो हमेशा होता है, जी हाँ, “वन-वे-ट्रेफ़िक”। सुरैया तो हिन्दू नहीं बनीं, उलटे धर्म को सतत कोसने वाले एक कम्युनिस्ट इन्द्रजीत गुप्त “इफ़्तियार गनी” जरूर बन गये।

इसी प्रकार अच्छे खासे पढ़े-लिखे अहमद खान (एडवोकेट) ने अपने निकाह के 50 साल बाद अपनी पत्नी “शाहबानो” को 62 वर्ष की उम्र में तलाक दिया, जो 5 बच्चों की माँ थी… यहाँ भी वजह थी उनसे आयु में काफ़ी छोटी 20 वर्षीय लड़की (शायद कम आयु की लड़कियाँ भी एक कमजोरी हैं?)। इस केस ने समूचे भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ पर अच्छी-खासी बहस छेड़ी थी। शाहबानो को गुज़ारा भत्ता देने के लिये सुप्रीम कोर्ट की शरण लेनी पड़ी, सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को राजीव गाँधी ने अपने असाधारण बहुमत के जरिये “वोटबैंक राजनीति” के चलते पलट दिया, मुल्लाओं को वरीयता तथा आरिफ़ मोहम्मद खान जैसे उदारवादी मुस्लिम को दरकिनार किया गया… तात्पर्य यही कि शिक्षा-दीक्षा या अधिक पढ़े-लिखे होने से भी कोई फ़र्क नहीं पड़ता, शरीयत और कुर-आन इनके लिये सर्वोपरि है, देश-समाज आदि सब बाद में…।

(यदि इतना ही प्यार है तो “हिन्दू” क्यों नहीं बन गये? मैं यह बात इसलिये दोहरा रहा हूं, कि आखिर मुस्लिम बनाने की जिद क्यों? इसके जवाब में तर्क दिया जा सकता है कि हिन्दू कई समाजों-जातियों-उपजातियों में बँटा हुआ है, यदि कोई मुस्लिम हिन्दू बनता है तो उसे किस वर्ण में रखेंगे? हालांकि यह एक बहाना है क्योंकि इस्लाम के कथित विद्वान ज़ाकिर नाइक खुद फ़रमा चुके हैं कि इस्लाम “वन-वे ट्रेफ़िक” है, कोई इसमें आ तो सकता है, लेकिन इसमें से जा नहीं सकता…(यहाँ देखें http://blog.sureshchiplunkar.com/2010/02/zakir-naik-islamic-propagandist-indian.html)। लेकिन चलो बहस के लिये मान भी लें, कि जाति-वर्ण के आधार पर आप हिन्दू नहीं बन सकते, लेकिन फ़िर सामने वाली लड़की या लड़के को मुस्लिम बनाने की जिद क्योंकर? क्या दोनो एक ही घर में अपने-अपने धर्म का पालन नहीं कर सकते? मुस्लिम बनना क्यों जरूरी है? और यही बात उनकी नीयत पर शक पैदा करती है)

एक बात और है कि धर्म परिवर्तन के लिये आसान निशाना हमेशा होते हैं “हिन्दू”, जबकि ईसाईयों के मामले में ऐसा नहीं होता, एक उदाहरण और देखिये –

पश्चिम बंगाल के एक गवर्नर थे ए एल डायस (अगस्त 1971 से नवम्बर 1979), उनकी लड़की लैला डायस, एक लव जेहादी ज़ाहिद अली के प्रेमपाश में फ़ँस गई, लैला डायस ने जाहिद से शादी करने की इच्छा जताई। गवर्नर साहब डायस ने लव जेहादी को राजभवन बुलाकर 16 मई 1974 को उसे इस्लाम छोड़कर ईसाई बनने को राजी कर लिया। यह सारी कार्रवाई तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय की देखरेख में हुई। ईसाई बनने के तीन सप्ताह बाद लैला डायस की शादी कोलकाता के मिडलटन स्थित सेंट थॉमस चर्च में ईसाई बन चुके जाहिद अली के साथ सम्पन्न हुई। इस उदाहरण का तात्पर्य यह है कि पश्चिमी माहौल में पढ़े-लिखे और उच्च वर्ग से सम्बन्ध रखने वाले डायस साहब भी, एक मुस्लिम लव जेहादी की “नीयत” समझकर उसे ईसाई बनाने पर तुल गये। लेकिन हिन्दू माँ-बाप अब भी “सहिष्णुता” और “सेकुलरिज़्म” का राग अलापते रहते हैं, और यदि कोई इस “नीयत” की पोल खोलना चाहता है तो उसे “साम्प्रदायिक” कहते हैं। यहाँ तक कि कई लड़कियाँ भी अपनी धोखा खाई हुई सहेलियों से सीखने को तैयार नहीं, हिन्दू लड़के की सौ कमियाँ निकाल लेंगी, लेकिन दो कौड़ी की औकात रखने वाले मुस्लिम जेहादी के बारे में पूछताछ करना उन्हें “साम्प्रदायिकता” लगती है…

इस मामले में एक “एंगल” और है, वह है “लम्पट” और बहुविवाह की लालसा रखने वाले हिन्दुओं का… धर्मेन्द्र-हेमामालिनी का उदाहरण तो हमारे सामने है ही कि किस तरह से हेमा से शादी करने के लिये धर्मेन्द्र झूठा शपथ-पत्र दायर करके मुसलमान बने…। दूसरा केस चन्द्रमोहन (चाँद) और अनुराधा (फ़िज़ा) का है, दोनों प्रेम में इतने अंधे और बहरे हो गये थे कि एक-दूसरे को पाने के लिये इस्लाम स्वीकार कर लिया। ऐसा ही एक और मामला है बंगाल के गायक सुमन चट्टोपाध्याय का… सुमन एक गीतकार-संगीतकार और गायक भी हैं। ये साहब जादवपुर सीट से लोकसभा के लिये भी चुने गये हैं। एक इंटरव्यू में वह खुद स्वीकार कर चुके हैं कि वह कभी एक औरत से संतुष्ट नहीं हो सकते, और उन्हें ढेर सारी औरतें चाहिये। अब एक बांग्लादेशी गायिका सबीना यास्मीन से शादी(?) करने के लिये इन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया है, यह इनकी पाँचवीं शादी है, और अब इनका नाम है सुमन कबीर। आश्चर्य तो इस बात का है कि इस प्रकार के लम्पट किस्म के और इस्लामी शरीयत कानूनों का अपने फ़ायदे के लिये इस्तेमाल करने वाले लोगों को, मुस्लिम भाई बर्दाश्त कैसे कर लेते हैं?

मुझे यकीन है कि, मेरे इस लेख के जवाब में मुझे सुनील दत्त-नरगिस से लेकर रितिक रोशन-सुजैन खान तक के (गिनेचुने) उदाहरण सुनने को मिलेंगे, लेकिन फ़िर भी मेरा सवाल वही रहेगा कि क्या सुनील दत्त या रितिक रोशन ने अपनी पत्नियों को हिन्दू धर्म ग्रहण करवाया? या शाहरुख खान ने गौरी के प्रेम में हिन्दू धर्म अपनाया? नहीं ना? जी हाँ, वही वन-वे-ट्रैफ़िक!!!!

सवाल उठना स्वाभाविक है कि ये कैसा प्रेम है? यदि वाकई “प्रेम” ही है तो यह वन-वे ट्रैफ़िक क्यों है? इसीलिये सभी सेकुलरों, प्यार-मुहब्बत-भाईचारे, धर्म की दीवारों से ऊपर उठने आदि की हवाई-किताबी बातें करने वालों से मेरा सिर्फ़ एक ही सवाल है, “कितनी मुस्लिम लड़कियों (अथवा लड़कों) ने “प्रेम”(?) की खातिर हिन्दू धर्म स्वीकार किया है?” मैं इसका जवाब जानने को बेचैन हूं।

मुझे “कट्टर” और Radical साबित करने और मुझे अपनी गलती स्वीकार करने के लिये कृपया आँकड़े और प्रसिद्ध व्यक्तियों के आचरण द्वारा सिद्ध करें, कि “भाईचारे”(?) की खातिर कितने मुस्लिम लड़के अपनी हिन्दू प्रेमिका की खातिर हिन्दू धर्म में आये? यदि आँकड़े और तथ्य आपके पक्ष में हुए तो मैं खुशी-खुशी आपसे माफ़ी माँग लूंगा… मैं इन्तज़ार कर रहा हूं… यदि नहीं, तो हकीकत को पहचानिये और मान लीजिये कि कुछ न कुछ गड़बड़ अवश्य है। अपनी लड़कियों को अच्छे संस्कार दीजिये और अच्छे-बुरे की पहचान करना सिखाईये। सबसे महत्वपूर्ण बात कि यदि लड़की के सच्चे प्रेम में कोई मुसलमान युवक, हिन्दू धर्म अपनाने को तैयार होता है तो उसका स्वागत खुले दिल से कीजिये…

वामपंथी हिंसा, हिंसा न भवति।।

ये एक सर्वमान्य सिद्धांत है कि जो विचार मानव समाज के अनुकूल नहीं होंगे वो स्वतः ही ख़त्म हो जायेंगे। वामपंथ ऐसी ही एक फांसीवादी विचारधारा है, जो जहाँ भी उभरी भारी जन-धन की तबाही लेकर आयी लेकिन जल्द ही लोगों को इस असफल विचारधारा का भान हो गया और अब ये खात्मे की और है। फ़िलहाल ये दुनिया के मात्र ६ देशों(चीन, बेलारूस,उत्तर कोरिया, क्यूबा, लाओस, वियतनाम) में ही सिमट कर रह गयी है। लगभग २० के आस पास देशों(अल्बानिया, मंगोलिया, पोलैंड, बुल्गारिया, कम्बोडिया, कांगो, हंगरी, रोमानिया, सोमालिया, युगोस्लाविया, पूर्वी जर्मनी, बेनिन अफगानिस्तान, दक्षिण यमन,सेज़ोस्लोवाकिया, मोजाम्बिक, एथिओपिआ, अंगोला और सोवियत संघ) ने इस फांसीवादी विचारधारा को अलविदा कह दिया है। चीन में भी अब वामपंथ खात्मे की ओर है और उसमे भी पूंजीवाद(साम्यवादी पूंजीवाद) ने अपनी जगह बना ली है। चीन के वामपंथियों ने वामपंथ के उन्हीं सिद्धांतों को अपना रक्खा है, जिससे उनकी सत्ता बरक़रार रहें और ये इस बात का भी उदाहरण है कि धुर साम्यवादी विचार किसी का भी भला नहीं कर सकते। हिटलर को तानाशाह और फांसीवादी कहने वाले खुद के गिरेबान में झांकना भूल जाते है स्टालिन, सोवियत संघ (८ मिलियन से लेकर ६१ मिलियन), माओत्से तुंग, चीन(४० मिलियन से ७० मिलियन), कम्पूचिया की साम्यवादी पार्टी, कम्बोडिया(१.२ मिलियन से लेकर २.२ मिलियन) लोगो की हत्या अपने शासन काल में इन महानुभावों और इनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने किये। अगर वामपंथियों को ये आकड़े कम लगते हो तो ठीक लेकिन अगर कोई शंका हो तो यहाँ चटका लगाये।

http://en.wikipedia.org/wiki/Mass_killings_under_Communist_regimes

http://en.wikipedia.org/wiki/Stalin

http://en.wikipedia.org/wiki/Mao

http://en.wikipedia.org/wiki/Khmer_Rouge

लेकिन इनका एक महान सिद्धांत “वामपंथी हिंसा, हिंसा न भवति।।” इनके सारे पापों को ढक लेता है। ये तो कुछ उदाहरण है जेएनयू में प्रवेश लेने वाले जिन बच्चों के भोलेपन का ये फायदा उठाते हुए उन्हें वामपंथी चश्मा पहना देते है, वो अगर इनकी सच्चाई जान ले तो ये वामपंथी उन्हें क्या नास्तिक बनायेंगे उनका स्वतः ईश्वर पर से विश्वास उठ जायेगा।

वामपंथ के जिस स्वघोषित स्वर्णिम इतिहास को वामपंथी अपने दिल में बसाये रखना चाहते है, उसे दुनिया के सभी लोग काला इतिहास मानते है। पूरी बींसवी सदी इनके खून-खराबे से रक्त रंजित रहीं और ये नारे लगाते रहे की वामपंथ एक महान विचार है और इससे पूरी दुनिया के सभी लोगो में आर्थिक समानता आ जाएगी। इनके इस झूठे प्रचार में दुनिया के कई देश और उसके बुद्धिजीवी आ गए और जब तक उन्हें ये पता चला की ये विचारधारा न केवल अनुत्पादक है बल्कि उनके देश की समृद्धि के लिए घातक भी है, तब तक देर हो चुकी थी लाखों लोग इसकी हिंसा के शिकार हो चुके थे जैसे कई बार ऐसा होता है कि व्यापारी अपने लाभ के लिए किसानों को फसलों के बीज ये कह कर बेच देता है कि फलां बीज बहुत ही उत्पादक है। ये सीधे विदेश से आयात किया गया है और इसका इस्तेमाल करते ही उसकी दरिद्रता दूर हो जाएगी और इसके लिए वो प्रचार साधनों का इस्तेमाल करता है और कुछ देशी-विदेशी क्षद्म विद्वानों का सहारा उन्हें कुछ पैसा देकर और कुछ विदेशी पुरस्कारों की व्यवस्था कर ले लेता है। और किसानों को जब तक सच्चाई पता चलती है तब तक देर हो चुकी होती है। वामपंथी विचार किसी खेंत में उग रहें खर-पतवार की तरह होते है, जो न केवल अनुत्पादक होते है बल्कि खेत में उगने वाली अन्य फसल को भी चौपट कर देते है। एक अनपढ़ किसान भी इस बात को समझता है और अपनी फसल को बचाने के लिए इन खर-पतवारों को जड़ से उखाड़ने में लग जाता है। इसलिए दुनिया के हर देश से इनको उखाड़ा जा रहा है। भारत में भी कुछ खर-पतवार बची रह गयी है, जरूरत इस बात की है की देश के किसान(राष्ट्रवादी) अपने कार्य में बिना थके बिना रुके लगे रहें नहीं तो इस खर-पतवार को फिर भयानक रूप लेने में समय नहीं लगेगा।

सभी राष्ट्रवादियों को सचेत हो जाना चाहिए कि इस खर-पतवार की कोई दवा नहीं इसलिए समय और धन दोनों का इस्तेमाल इसको जड़ से उखाड़ने में करें न कि इसका इलाज़ करने में क्योंकि देश कि कुछ राष्ट्रविरोधी शक्तियों ने इन्हें दवा देकर अपने अनुसार नियंत्रित करने कि कोशिश कि लेकिन ये खर-पतवार एक नए घातक रूप(माओवाद) रूप में हमारे सामने आ गयी है। इनको नियंत्रित करना है तो इनको समूल नाश करना ही एक विकल्प है।

ये विचार न केवल मानव के बल्कि प्रकृति के सामान्य सिद्धांतों के भी विपरीत है, जब एक खेत में बहुत सारें फलों, सब्जिओं और अनाजों कि खेती होती है तो क्या सभी फसलों को एक बराबर जल, वायु, मृदा और सूर्य के प्रकाश की आवश्यकता होती है और क्या वो एक बराबर उत्पादन भी करते है और क्या उनके उत्पाद के सभी गुणों में भी समानता होती है, अगर नहीं तो मानवीय विचारों की फसल के ऊपर इन सिद्धांतों को कैसे लागू किया जा सकता है। १ किलो चावल पैदा करने के लिए लगभग २५०० लीटर पानी की आवश्यकता होती है, जबकि १ किलो आलो के लिए मात्र १३३ लीटर की, जबकि दोनों उत्पादों में बहुत सी समानताएं है तो क्या चावल जितना पानी आलू में भी डाल दे या चावल से भी आलू के समानुपातिक उत्पाद की उम्मीद करें। सभी फसलों को जल, वायु, मृदा और सूर्य का प्रकाश मिलता है, लेकिन नारियल, सरसों, मूंगफली और सूरजमुखी के पेड़-पौधे उसी में से अलग अलग तरह के तेलों का उत्पादन करती है तो आवंला तेल के साथ बहुमूल्य लवणों का। हमें पीपल और बरगद के विशाल वृक्षों की भी आवश्यकता है और प्याज, लहसुन, धनियाँ और पुदीने की भी। कुछ वामपंथी ये दावा करते है कि वामपंथ विचारों की विविधताओं से भरा हुआ है, लेकिन उन्हें ये समझना होगा की चावल की कितनी भी किस्में क्यों न पैदा हो जाएँ उससे मनुष्य की कुछ आवश्यकता तो पूरी हो सकती है, लेकिन सारी शारीरिक आवश्यकताए नहीं पूरी की जा सकती। वैसे ही वामपंथ के विचार मानव की कुछ बौद्धिक आवश्यकताओं को ही पूरा कर सकते है(हालाँकि इसमें भी मुझे संदेह है)। एक मानव और एक भारतीय होने के नाते भी मेरा ये मानना है कि भारत में भी वो दिन दूर नहीं जब सभी को अपने आर्थिक और सांस्कृतिक विकास के लिए सामान अवसर मिलेंगे सौभाग्य से इतने भौतिक पतन के पश्चात आज भी भारत कि बगियाँ में सभी विचारों को सामान अवसर मिलते हैं। जगत में कोई भी मानवीय सिद्धांत प्रकृति के सिद्धांतों के उपर नहीं है चाहे वो दुनिया के किसी भी सर्वमान्य महापुरुष द्वारा ही क्यों न उत्पादित किया गया हो तो मार्क्स-लेनिन क्या चीज़ है। प्रकृति का सिद्धांत कहता है कि सभी को समान अवसर मिलने चाहिए न की मार-काट के सभी को एक समान बनाया जाये।

क्या वामपंथियों का मानवता को लेकर पैरामीटर अलग अलग है?

वामपंथी पार्टियों से संबंधित एक खबर अखबारों में छपा है। खबर का शीर्षक है ओबामा के भारत दौरे पर विरोध करेंगे चार वामदल। जिन मुख्य बातों को लेकर उनका विरोध है उसमें भोपाल गैस त्रासदी मामले के आरोपी को भारत सौंपने, अमेरिकीपरस्त आर्थिक नीतियों को भारत में लागू कराने के लिए भारत पर दबाव डालने से बाज आने जैसी बातें शामिल हैं। यह मुद्दे बिल्कुल ठीक हैं और सभी राजनीतिक दलों व आम लोगों को इन मुद्दों पर एकजुट होना चाहिए। ये ऐसे मुद्दे हैं जो देश के हित से जुडा हुआ है। लेकिन उसके बाद जो बातें लिखी गई हैं थोडा हैरत में डालने वाला है। फिलीस्तीन, इराक, क्यूबा, अफगानिस्तान पर भी वाम दलों की मांगें हैं। वाम दलों का मानना है कि इन इलाकों में अमेरिका द्वारा मानवाधिकारों का हनन हो रहा है। इसके खिलाफ वे आंदोलन करेंगे।

भारत का पडोसी देश है तिब्बत, जिसको माओ के समय चीन ने हथिया लिया हैं। वहां की मानवाधिकारों की स्थिति अत्यंत खराब है। लेकिन भारत के वामदलों से लेकर अपने आप को मानवतावादी बता कर सबको प्यार करने का दावा करने वाले विचारक इस पर चुप्प रहते हैं। तिब्बत में क्या स्थिति है उस पर कुछ नजर डालेंगे तो स्थिति स्पष्ट होगी।

१२ लाख से भी अधिक तिब्बती मारे जा चुके है!

६००० से भी अधिक धार्मिक एंव सांस्कृतिक संस्थान नष्ट किए जा चुके हैं!

हजारों तिब्बती मौलिक अधिकारों का प्रयोग करने के आरोप में जेलों में बन्द हैं!

तिब्बत के प्राकृतिक संसाधनों तथा कोमल पर्यावरण को बुरी तरह नष्ट कर दिया गया है!

यह एक प्रमाणिक तथ्य है कि तिब्बत को आणविक कचरा फेंकने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा हैं!

तिब्बत में तिब्बती लोगों की आबादी (६० लाख) से अधिक चीनी लोगों की आबादी (७५ लाख) हो गई हैं!

तिब्बत केवल मात्र जमीन का टुकडा नहीं है। तिब्बत का जिंदा रहने का अर्थ तिब्बतियता का जिंदा रहना, यानी तिब्बत की संस्कृति, उसकी भाषा, परंपरा का जिंदा रहना है। लेकिन वामपंथी चीन द्वारा जो अमानुषिक अत्य़ाचार किये जा रहे हैं उससे तिब्बतीयता ही संकट में है। उनकी संस्कृति को खत्म करने के लिए कम्युनिस्ट शासन ने दिन रात एक किया हुआ है। किसी के यहां से परम पावन दलाई लामा की तस्वीर मिलने मात्र से ही उसे जेल में डाल दिया जाता है। बोद्ध मंदिरों को खत्म किया जा रहा है।

तिब्बती नस्ल करने का प्रयास किया जा रहा है। वहां चीनी हान लोगों को बसाया जा रहा है। जबरदस्ती तिब्बती ल़डकियों की शादी हान लडकों से की जा रही है। चीनी कम्युनिस्ट सरकार पूरी तैयारी में है कुछ सालों मे तिब्बतीयता को खत्म कर देगी। फिर तिब्बत की भूमि तो रहेगा लेकिन तिब्बती राष्ट्रीयता खत्म हो जाएगी। इसी षडयंत्र को पूरा करने में चीनी कम्युनिस्ट सरकार लगी हुई है।

क्या फिलिस्तीन, इराक व अफगानिस्तान के मामलों में लंबे लंबे लेख तथा लगातार लिखने वाले वामपंथी विचारक, विद्वान तिब्बत में हो रहे अमानवीय, विभत्स अत्याचारों के बारे में जानकारी नहीं रखते हैं। अगर जानकारी है तो फिर वे इस मामले में चुप्प क्यों हैं। क्या वामपंथियों का मानवता को लेकर परैमिटर अलग अलग होता है ?

इस पूरे विषय पर विचार करने पर तो ऐसा ही लगता है। फिलीस्तीन, इराक, क्यूबा, अफगानिस्तान में जो मारे जा रहे हैं वे मानव हैं। तिब्बत में जो मारा जा रहा है वह में मानव नहीं है। उनका कोई मानवाधिकार नहीं होता।

चीन द्वारा किसी भी देश की संस्कृति खत्म करना, लोगों को मौत के घाट उतारना सब जायज है। इसका जो विरोध करेगा वह फासीवादी है। मेरे विरोधी कुछ भी करें गलत और मै या फिर मेरे आका चीन जो भी करे ठीक, भारत पर हमला कर जमीन हडप ले तो ठीक, तिब्बत में अत्य़ाचार करे तो ठीक, अरुणाचल प्रदेश पर दावा जताये तो ठीक।

अंत में, मैं मार्क्सवादी, लेनिनवादी स्टालिनवादी व माओवादी विचारकों व विद्नानों से आग्रह है कि वे कि अपने आंख पर लगाये चीनी चश्में को उतार कर भारतीय चश्मे से दुनिया को देखें। तब उन्हें तिब्बत की त्रासदी दिखेगी, वहां हो रहा अत्याचार दिखेगा, एक सांस्कृतिक नरसंहार की भयावह चित्र दिखेगा।

इन मार्कसवादी, लेनिनवादी स्टालिनवादी व माओवादी विचारकों व विद्नानों से आग्रह है कि वे वाम मार्ग पर चलने के बजाए धर्म मार्ग पर चलें (मजहब नहीं धर्म )। क्योंकि धर्म ही धारण करता है, कम्युनिज्म आपस में द्वेष बढाता है, संपूर्ण मानवता को एक दूसरे के खिलाफ खडा कर हिंसा करवाता है। इतिहास इस बात का साक्षी बहै। वामपंथी सर्वसमावेशी बनें, समाज को न तोडें, मानवता की भलाई के लिए सोंचे। अपने आप को मानवतावादी बता कर पाखंड न करें। अन्यथा अपने लंबे लंबे लेखों व भाषणोंका कोई लाभ नहीं होगा। यह उनके दोहरेपन को दर्शाता है।

सोमवार, 1 नवंबर 2010

आओ वामपंथ से प्‍यार करें!

“मैं बाबा रामदेव को प्यार करता हूँ। मोहन भागवत को भी प्यार करता हूँ। मदर टेरेसा, सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह, प्रकाश कारात को भी प्यार करता हूँ। ” लेकिन लाखों सालों से निरंतर चली आ रही की भारत की महान परंपरा व संस्कृति से घृणा करता हूं। इसके खिलाफ लिखने के लिए मैं दिन रात एक कर देता हूं।

जब तक योग-प्राणायाम हिमालय के गुफाओं में रहें तब तक मैं उसे बेहद प्यार करता हूं। लेकिन जब वह बाहर आ जाए, आम लोगों की भलाई में उसका उपयोग हो, बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों को उससे चुनौती मिले, तो मैं उससे घृणा करने लगता हूं। मैं चाहता हूं कि वह गुफाओं के अंदर ही बंद रहें। अगर कोई योगी आयुर्वेद को लोगों के बीच पहुंचाने का प्रयास करे और सफल हो तो मैं उसे घृणा करता हूं। केवल इतना ही नहीं उसके खिलाफ अनाप शनाप बोलता हूं। कभी उन दवाइयों में मांस मिले होने का आरोप लगाता हूं। नहीं तो ट्रेड यूनियन के माध्यम से उस फैक्ट्री में हडताल कराने का प्रयास करता हूं।

मैं बहुराष्ट्रीय कंपनियां की व स्टेट की नव उदारवादी नीतियों से घृणा करता हूं। लेकिन पश्चिम बंगाल की बुद्धदेव भट्टाचार्य़ सरकार द्वारा नंदीग्राम व सिंगुर में आम किसानों पर अमानवीय अत्याचार के खिलाफ मुझे कतई घृणा नहीं है बल्कि मैं उससे सही बताता हूं। क्योंकि यहां सरकार टाटा कंपनी के लिए जमीन देकर राज्य को विकास के पथ पर अग्रसर करना चाहती है। कुछ लोग बिना मतलब के इस अमानवीय अत्याचार का विरोध करते रहते हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियां व नव उदारवादी नीतियां तब तक मेरे लिये घृणा के योग्य हैं जब तक वे मेरे विरोधी विचारों के लोगों द्वारा किये जा रहे हों। लेकिन “सर्वहारा” वर्ग की वामपंथी सरकार द्वारा, वामपंथी कार्यकर्ताओं द्वारा दलित, शोषित, पीडितों का उत्पीडन मेरी दृष्टि से बिल्कुल उचित है।

आप ने अतीत में रुस में देखा होगा लेनिन व स्टैलिन द्वारा जहां करोडों लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया। चीन में सांस्कृतिक क्रांति के नाम पर कितने करोडों लोगों की बेरहमी से हत्या कर दी गई।

मैं साम्यवाद विरोधी करोडों लोगों की हत्या का समर्थन करता हूं लेकिन मैं “फासीवादी” नहीं हूं। मैं विचारभिन्नता का भारत में समर्थन करता हूं लेकिन चीन में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता न होने का समर्थन करता हूं।

किसी भी हिन्दुत्ववादी के किसी भी अच्छे बयान की भी निंदा करता हूं लेकिन इमाम बुखारी द्वारा पत्रकार के खिलाफ सरेआम बदसलुकी के खिलाफ मैं कुछ नहीं लिखता। क्योंकि अगर मैं उसके खिलाफ लिखूं तो फिर मैं कैसे धर्मनिरपेक्ष रह जाउंगा। मेरा धर्मनिरपेक्ष बने रहने का पारामिटर भी देशद्रोहियों के पक्ष में लिखना है। देशद्रोहियों का समर्थन करना, देशद्रोहियों के पक्ष में लिखना मैं पसंद करता हूं। साथ मै यह भी चाहता हूं कि देश का कोई भी व्यक्ति मेरे खिलाफ कोई टिप्पणी न करे।

मैं राष्ट्रवाद से घृणा करता हूं। लेकिन चीन से मुझे बेहद प्यार है। जब चीन भारत पर हमला करता है तो मैं कहता हूं कि “बकवास बंद करो, चीन ने नहीं भारत ने चीन पर हमला किया है।” मैं चीन के समर्थन में नुक्कड सभाएं आयोजित करता हूं। कोलकाता के सडकों पर “चीनेर चैयरमेन- आमादेर चैयरमेन ” का नारा लगाता हूं।

माओ की सेना भारत में आ कर हमें लिबरेट करे, यह सपना मैं देखता हूं। इसके लिए मैं उनके स्वागत की तैयारियों में लगा रहता हूं।

चीन अगर परमाणु बम बनाये तो मैं उसका स्वागत करता हूं लेकिन भारत अगर परमाणु विस्फोट करे तो मैं उसके खिलाफ आंदोलन शुरु कर देता हूं। इसके लिए सेमिनर आयोजित करता हूं, गोष्ठियां आयोजित करता हूं, इसका पुरजोर विरोध करता हूं।

मुझे फिलिस्तीन में इजरायली हमलों में अमानवीयता, बर्बरता का स्पष्ट दर्शन होता है। मेरे जैसे मानवीयता के पक्षधऱ व्यक्ति को अगर इसका स्पष्ट दर्शन नहीं होगा तो फिर कैसे चलेगा। इसके लिए मैं हमेशा तनाव में रहता हूं। बार- बार सडकों पर उतरता हूं, भले ही चार लोग हों आंदोलन करता हूं। लेकिन कश्मीरी पंडितों को भगाया जाना मुझे नहीं दिखता है। उस पर मैं न तो कभी टिप्पणी करता हूं और न ही उस पर आंदोलन के लिए सोचता हूं। केवल इतना ही नहीं मेरे आका देश चीन द्वारा तिब्बत को हडप लेना का भी मैं स्वागत करता हूं। वहां हान चीनियों द्वारा तिब्बती नस्ल को समाप्त करने के साजिश मुझे नहीं दिखाई नहीं देता। वहां परमाणु कचरे को डंप किया जाना भी मुझे दिखाई नहीं देता।

भारत की जमीनों पर चीनी कब्जा मुझे दिखाई नहीं देता। 1962 का युद्ध तथा 14 नंबवर को संसद में पारित किया गया संकल्प प्रस्ताव भी मुझे याद नहीं है।

इस्लामी आतंकवादियों द्वारा आम लोगों की हत्या पर मैं चुप्प रहता हूं। लेकिन बाटला हाउस मामले में आतंकवादियों के पक्ष में आंदोलन करता हूं। यही वामपंथ है।

भारत के महापुरुषों के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करना मुझे पसंद है। मैं महान स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को को “तोजो का कुत्ता” मानता हूं। पंडित नेहरु का “अंग्रेजी साम्राज्यवाद का दौडता हुआ कुत्ता मानता हूं”। हालांकि बदले हुए हालात में और लोगों के विरोध को देखते हुए इसके लिए क्षमा याचना के लिए भी तैयार रहता हूं। यह स्टैटजी की बात होती है।

मेरे लिये राम आदर्श नहीं है। मेरे लिए कृष्ण आदर्श नहीं है। मेरे लिए स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी भी आदर्श नहीं है। मैं मार्क्‍स की पूजा करता हूं, स्टालिन, लेनिन की पूजा करता हूं। मैं माओ के मूर्ति के आगे सिजदा करता हूं। चेग्वेरा के मूर्ति के आगे नतमस्तक होता हूं।

इसलिए चीन जिंदाबाद। आओ भारत, भारतीयता से घृणा करे, आओ वामपंथ से प्यार करें।