बुधवार, 6 अक्टूबर 2010

....तो फिर किसने तोड़े थे ये हजारों मंदिर?

नई दिल्ली से प्रकाशित एक प्रतिष्ठित सप्ताहिक ‘इंडिया टुडे’ ने हाल के अंक में कुछ दिनों पहले दिवंगत हुए पुराने कांग्रेसी नेता और मुस्लिम विचारक डा. रफीक जकारिया को उद्धृत करते हुए मोटे अक्षरों में लिखा कि इतिहास में कोई ऐसा साक्ष्य नहीं है कि जो सिद्ध कर सके कि किसी मुस्लिम ने कोई हिन्दू मंदिर तोड़ा हो।

यही बात इतिहासकार डा. इरफान हबीब और रोमिला थापर भी दूसरे संदर्भ में कह चुके हैं। यह भी कहा गया है कि मुस्लिम आक्रमणकारी सिर्फ धन-संपत्ति की लूट के उद्देश्य से आक्रांता के रूप में भारत आते रहे और बस यहीं उनका मन्तव्य था। भारत के पिछले एक हजार साल के इतिहास को झुठलाते हुए हर छोटे-बड़े शहरों के सैकड़ों पुराने भग्नावशेषों को नकारते हुए जिसमें मुस्लिम आक्रमणों के बर्बर ध्वंस की निशानियाँ आज भी मौजूद हैं।

इस तरह की दुष्प्रचारित की जा रही राजनीतिक टिप्पणियाँ हमें अनायास आहत कर आक्रोश से भर सकती है। कभी-कभी लगता है कि हम स्वयं इस बात के गुनाहगार हैं कि अपनी तटस्थता की आड़ में हम ऐसी टिप्पणियों का प्रतिरोध नहीं करते हैं। मेरे विचार में राजनीति प्रेरित दिग्भ्रमित करने वाले ऐसे लेखक इतिहास व पुरातत्व के अनुशासन से गिरकर सिर्फ असत्य के अलावा कुछ नहीं बोल सकते हैं।

कहते हैं कि झुठ की अनेक किस्में होती है– बुरा झूठ, सफेद झूठ, काला झूठ, आकड़ों का झूठ, राजनीतिक झूठ, आदि-आदि। पर यदि अपनें चारों ओर गौर से देखें तो पाएंगे कि एक चौथे प्रकार का झूठ भी होता है जिसकी प्रकृति उपर्युत्त प्रकार के झूठ से कई गुना भयानक होती है। इसे हम गजब का झूठ कह सकते हैं। जहाँ तक देश के इतिहास का संदर्भ है, झूठ बोलना उनकी फितरत में दाखिल है, लगता है, नस-नस में बस गया है।

मुस्लिम शासकों के स्वयं अपने इतिहासकार व वृत्तांत लेखक, मध्य युग में भारत-भ्रमण के लिए आए विदेशी यात्री व स्वयं ब्रिटिश इतिहासकार सभी ने सदियों तक हिंदू मंदिरों के ध्वंस के बारे में जो लिखा है उसके बाद भी विकृत सोच द्वारा जो दुष्प्रचार हमारी पत्र-पत्रिकाओं में फैलाया जा रहा है वह अक्षम्य है। पुराने इतिवृत्त जैसे आज का पूर्वी अफगानिस्तान शैवपंथी था। उत्तरी पूर्वी सीमांत से लगे अनेक देश अपवा जहाँ हमारे मूल देश की सभ्यता की उपशाखाएं विद्यमान थीं उनको कैसे नेस्तनाबूद किया गया, यह भुला भी दिया जाए, पर आज भी देश के दूरदराज के हर कोने में स्वयं आप जाकर भग्न मंदिर या खण्डित मूर्तियां देख सकते हैं। मात्र एक छोटा सा उदाहरण है, चाहे आप जबलपुर के चौसठ योगिनी मंदिर जाएं या भेजपुर का शिव मंदिर अथवा हांपी, आपका हृदय विदीर्ण हुए बिना नहीं रह सकता। सोमनाथ, मथुरा, काशी या अयोध्या की बात ही क्या करना जिसका विनाश इस्लाम के विस्तार के लिए मनोवैज्ञानिक रूप कितना अपरिहार्य था। आज के पलायनवादी, तटस्थ शिक्षित हिन्दू की संवेदनशीलता मरती जा रही है और इसलिए वह इसे समझ नहीं सकता है।

क्या आप इसे घृणित मार्क्सवादी व्याख्या नहीं कहेंगे जिसे बार-बार हमारे अंग्रेजी अखबार प्रचारित करने से नहीं चूकते हैं कि हिन्दू मंदिरों में अपार स्वर्णराशि व सम्पत्ति इकट्ठा कर हिंदुओं ने जो एक अपराध किया था उससे इस्लामी आक्रमणकारियों का आकर्षित होना स्वाभाविक था। पर उसका यह फायदा भी हुआ कि उन्होंने भारतीय समाज में एक क्रांति भी लाई, जो एकात्मवाद को बढ़ावा देने के साथ जाति-व्यवस्था के विरुद्ध भी जनमत तैयार कर सकी।


अत्यंत संक्षेप में, सन् 632 में भारत में इस्लाम के आगमन के बाद से किस तरह हजारों मंदिरों का ध्वंस हुआ इसको आज के मीडिया को साक्ष्यों से परिचित कराना जरूरी है, जिससे वे हमारे ही देश में बहुसंख्यकों को बरगलान सकें। फ्रेंच इतिहासकार एलेन डेनिलू ने लिखा है कि प्रारम्भ से ही इस्लाम का इतिहास भारत के लिए विनाश, रक्तपात, लूट और मंदिरों के विध्वंस के लिए एक भूकंप की तरह सिद्ध हुआ था।

सन 1018 से लेकर सन 1024 तक मथुरा, कन्नौज, कालिंजर और बनारस के साथ-साथ सोमनाथ के मंदिर क्रूरता से नष्ट किए गए। प्रसिद्ध पत्रकार एम. वी. कामथ ने कुछ दिनों पहले 18वीं शताब्दी के एक ब्रिटिश यात्री को उद्धृत करते हुए लिखा कि सूरत से दिल्ली तक के बीच उसने एक भी हिंदू मंदिर नहीं देखा क्योंकि वे सब नष्ट किए जा चुके थे। इस्लामी इतिहासकारों ने सैकड़ों साल पहले गर्व से लिखा है कि सल्लतनत और मुगल शासकों के समय उनकी सरकार का ‘मंदिर तोड़ने का विभाग” कितना कुशलता और दक्षता से यह काम करता था।

सोमनाथ का मंदिर पहली बार महमूद गजनवी द्वारा 1024 में लूटा गया था और शिवलिंग तोड़ डाला गया था। मुस्लिम इतिहासकारों के अनुसार इस विशाल देवालय को नष्ट करने के बाद सोमनाथ के शिवलिंग के टुकड़े गजनी की जुम्मा मस्जिद की सॣढ़ियों में जड़े गए थे जिससे इस्लाम के अनुयाई उन्हें पैरों से रौंदें। वह सन् 1191 का समय था जब मुस्लिम आक्रांता मोहम्मद गोरी मध्य एशिया से अपने तुर्की घुड़सवारों की सेना के साथ भारत आया था। पहले पृथ्वीराज चौहान ने उसे तराईन के पहले युद्ध में मात दी और उसे क्षमादान भी दिया। पर 1192 में उसने पृथ्वीराज को पराजित करने के बाद विशाल लालकोट को कब्जा करने के बाद जलाकर धरती में मिला दिया। आज भी कुव्वतुल इस्लाम भारत की पहली मस्जिद के रूप में खड़ी है जिसे उस समय के 67 हिंदू मंदिरों के पत्थरों और मलवे को प्रयुक्त कर बनाया गया था। इस तरह पहली बार यह आस्था ध्वंस के प्रतीक के रूप में दिल्ली पहुची थी। स्वयं अनेक मुस्लिम इतिहासकारों ने इसका विस्तृत रूप से वर्णन किया है।

“तारीखे-फीरोजशाही” के इतिहासकार के अनुसार सुल्तान अल्तुतमिस (1210-1236) ने अपने मारवाड़ के आक्रमण के दौरान अनेक बड़े मंदिरों की मूर्तियों को लाकर दिल्ली की जामा मस्जिद की सीढ़ियों में चुनवाया था। इसी तरह जलालुद्दीन खिलजी (1290-1296) ने रणथंभौर के आक्रमण के बाद किया था। दो अन्य मुस्लिम इतिहासकारों ने स्वतंत्र रूप से पुष्टि की है कि अलाउद्दीन खिलजी (1296-1316) हर अभियान के बाद मूर्तियों को दिल्ली लाकर सीढ़ियों पर चुनवाने का एक धार्मिक कृत्य मानता था। बाद तक दर्जनों शासकों ने यह चाहे दिल्ली में हो या बहमनी, मालवा, बरार या दक्षिण के राज्य हों, यही दोहराया। इन अभिलेखित साक्ष्यों के बाद भी यदि आज के कुछ सेकुलर कहलाने वाले दुराग्रही और हठधर्मी इतिहासकार अथवा पत्रकार रट लगाते रहें कि मंदिर कभी ध्वस्त नहीं किए गए, कभी बलात धर्मांतरण नहीं हुआ तो यह मात्र कुटिल मानसिकता ही मानी जा सकती है।

हमारे देश में अपने अतीत के प्रति अधिकांश शिक्षित वर्ग इतना उदासीन है कि विद्रूषीकरण के साथ-साथ घोर सतही और असत्य वक्तव्य भी बिना किसी प्रतिरोध के छापे जा सकते हैं। कदाचित इसीलिए नोबेल पुरस्कार विजेता वी.एस. नागपाल ने कुछ दिनों पहले एक साक्षात्कार में रोमिला थापर को ‘फ्रॉड’ तक कह डाला था।

आज हिंदू हीनताग्रंथिवश अपनी सभ्यता की प्रमुखता को भी अभिव्यक्त करने की स्थिति में नहीं हैं और कदाचित इतिहास की बाध्यताओं व उसके सही अनुशासन को नहीं समझ पाते हैं। उसके मन में कूट-कूटकर भर दिया गया है कि उनका अपना अतीत, आज की नजरों में, सांप्रदायिक इतिहास है।

मेवाड़ की रानी पद्मिनी : एक शौर्य गाथा वीर वीरांगनाओं की धरती राजपूताना

वीर वीरांगनाओं की धरती राजपूताना.....जहाँ के इतिहास में आन बान शान या कहें कि सत्य पर बलिदान होने वालों की अनेक गाथाएं अंकित है.....एक कवि ने राजस्थान के वीरों के लिए कहा है :
"पूत जण्या जामण इस्या मरण जठे असकेल
सूँघा सिर, मूंघा करया पण सतियाँ नारेल......"
{ वहां ऐसे पुत्रों को माताओं ने जन्म दिया था जिनका उदेश्य के लिए म़र जाना खेल जैसा था .....जहाँ की सतियों अर्थात वीर बालाओं ने सिरों को सस्ता और नारियलों को महंगा कर दिया था......(यह रानी पद्मिनी के जौहर को इंगित करता है)......}

१३०२ इश्वी में मेवाड़ के राजसिंहासन पर रावल रतन सिंह आरूढ़ हुए. उनकी रानियों में एक थी पद्मिनी जो श्री लंका के राजवंश की राजकुँवरी थी. रानी पद्मिनी का अनिन्द्य सौन्दर्य यायावर गायकों (चारण/भाट/कवियों) के गीतों का विषय बन गया था. दिल्ली के तात्कालिक सुल्तान अल्ला-उ-द्दीन खिलज़ी ने पद्मिनी के अप्रतिम सौन्दर्य का वर्णन सुना और वह पिपासु हो गया उस सुंदरी को अपने हरम में शामिल करने के लिए. अल्ला-उ-द्दीन ने चित्तौड़ (मेवाड़ की राजधानी) की ओर कूच किया अपनी अत्याधुनिक हथियारों से लेश सेना के साथ. मकसद था चित्तौड़ पर चढ़ाई कर उसे जीतना और रानी पद्मिनी को हासिल करना. ज़ालिम सुलतान बढा जा रहा था, चित्तौड़गढ़ के नज़दीक आये जा रहा था. उसने चित्तौड़गढ़ में अपने दूत को इस पैगाम के साथ भेजा कि अगर उसको रानी पद्मिनी को सुपुर्द कर दिया जाये तो वह मेवाड़ पर आक्रमण नहीं करेगा. रणबाँकुरे राजपूतों के लिए यह सन्देश बहुत शर्मनाक था. उनकी बहादुरी कितनी ही उच्चस्तरीय क्यों ना हो, उनके हौसले कितने ही बुलंद क्यों ना हो, सुलतान की फौजी ताक़त उनसे कहीं ज्यादा थी. रणथम्भोर के किले को सुलतान हाल ही में. ने फतह कर लिया था ऐसे में बहुत ही गहरे सोच का विषय हो गया था सुल्तान का यह घृणित प्रस्ताव, जो सुल्तान की कामुकता और दुष्टता का प्रतीक था. कैसे मानी ज सकती थी यह शर्मनाक शर्त.

नारी के प्रति एक कामुक नराधम का यह रवैय्या क्षत्रियों के खून खौला देने के लिए काफी था. रतन सिंह जी ने सभी सरदारों से मंत्रणा की, कैसे सामना किया जाय इस नीच लुटेरे का जो बादशाह के जामे में लिपटा हुआ था. कोई आसान रास्ता नहीं सूझ रहा था. मरने मारने का विकल्प तो अंतिम था. क्यों ना कोई चतुराईपूर्ण राजनीतिक कूटनीतिक समाधान समस्या का निकाला जाय ?
रानी पद्मिनी न केवल अनुपम सौन्दर्य की स्वामिनी थी, वह एक बुद्धिमता नारी भी थी. उसने अपने विवेक से स्थिति पर गौर किया और एक संभावित हल समस्या का सुझाया. अल्ला-उ-द्दीन को जवाब भेजा गया कि वह अकेला निरस्त्र गढ़ (किले) में प्रवेश कर सकता है, बिना किसी को साथ लिए, राजपूतों का वचन है कि उसे किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचाया जायेगा....हाँ वह केवल रानी पद्मिनी को देख सकता है..बस. उसके पश्चात् उसे चले जाना होगा चित्तौड़ को छोड़ कर.... जहाँ कहीं भी. उम्मीद कम थी कि इस प्रस्ताव को सुल्तान मानेगा. किन्तु आश्चर्य हुआ जब दिल्ली के आका ने इस बात को मान लिया. निश्चित दिन को अल्ला-उ-द्दीन पूर्व के चढ़ाईदार मार्ग से किले के मुख्य दरवाज़े तक चढ़ा, और उसके बाद पूर्व दिशा में स्थित सूरजपोल तक पहुंचा. अपने वादे के मुताबिक वह नितान्त अकेला और निरस्त्र था. पद्मिनी के पति रावल रतन सिंह ने महल तक उसकी अगवानी की.
महल के उपरी मंजिल पर स्थित एक कक्ष कि पिछली दीवार पर एक दर्पण लगाया गया, जिसके ठीक सामने एक दूसरे कक्ष की खिड़की खुल रही थी...उस खिड़की के पीछे झील में स्थित एक मंडपनुमा महल था जिसे रानी अपने ग्रीष्म विश्राम के लिए उपयोग करती थी. रानी मंडपनुमा महल में थी जिसका बिम्ब खिडकियों से होकर उस दर्पण में पड़ रहा था अल्लाउद्दीन को कहा गया कि दर्पण में झांके. हक्केबक्के सुलतान ने आईने की जानिब अपनी नज़र की और उसमें रानी का अक्स उसे दिख गया ...तकनीकी तौर पर.उसे रानी साहिबा को दिखा दिया गया था....सुल्तान को एहसास हो गया कि उसके साथ चालबाजी की गयी है, ...किन्तु बोल भी नहीं पा रहा था, मेवाड़ नरेश ने रानी के दर्शन कराने का अपना वादा जो पूरा किया था......और उस पर वह नितान्त अकेला और निरस्त्र भी था. परिस्थितियां असमान्य थी, किन्तु एक राजपूत मेजबान की गरिमा को अपनाते हुए,दुश्मन अल्लाउद्दीन को ससम्मान वापस पहुँचाने मुख्य द्वार तक स्वयं रावल रतन सिंह जी गये थे .....अल्लाउद्दीन ने तो पहले से ही धोखे की योजना बना रखी थी .उसके सिपाही दरवाज़े के बाहर छिपे हुए थे....दरवाज़ा खुला.......रावल साहब को जकड लिया गया और उन्हें पकड़ कर शत्रु सेना के खेमे में कैद कर दिया गया.
रावल रतन सिंह दुश्मन की कैद में थे. अल्लाउद्दीन ने फिर से पैगाम भेजा गढ़ में कि राणाजी को वापस गढ़ में सुपुर्द कर दिया जायेगा, अगर रानी पद्मिनी को उसे सौंप दिया जाय. चतुर रानी ने काकोसा गोरा और उनके १२ वर्षीय भतीजे बादल से मशविरा किया और एक चातुर्यपूर्ण योजना राणाजी को मुक्त करने के लिए तैयार की.
अल्लाउद्दीन को सन्देश भेजा गया कि अगले दिन सुबह रानी पद्मिनी उसकी खिदमत में हाज़िर हो जाएगी, दिल्ली में चूँकि उसकी देखभाल के लिए उसकी खास दसियों की ज़रुरत भी होगी, उन्हें भी वह अपने साथ लिवा लाएगी. प्रमुदित अल्लाउद्दीन सारी रात्रि सो न सका...कब रानी पद्मिनी आये उसके हुज़ूर में, कब वह विजेता की तरह उसे भी जीते.....कल्पना करता रहा रात भर पद्मिनी के सुन्दर तन की....प्रभात बेला में उसने देखा कि एक जुलुस सा सात सौ बंद पालकियों का चला आ रहा है. खिलज़ी अपनी जीत पर इतरा रहा था. खिलज़ी ने सोचा था कि ज्योंही पद्मिनी उसकी गिरफ्त में आ जाएगी, रावल रतन सिंह का वध कर दिया जायेगा...और चित्तौड़ पर हमला कर उस पर कब्ज़ा कर लिया जायेगा. कुटिल हमलावर इस से ज्यादा सोच भी क्या सकता था.

खिलज़ी के खेमे में इस अनूठे जुलूस ने प्रवेश किया......और तुरंत अस्तव्यस्तता का माहौल बन गया...पालकियों से नहीं उतरी थी अनिन्द्य सुंदरी रानी पद्मिनी और उसकी दासियों का झुण्ड......बल्कि पालकियों से कूद पड़े थे हथियारों से लेश रणबांकुरे राजपूत योद्धा ....जो अपनी जान पर खेल कर अपने राजा को छुड़ा लेने का ज़ज्बा लिए हुए थे. गोरा और बादल भी इन में सम्मिलित थे. मुसलमानों ने तुरत अपने सुल्तान को सुरक्षा घेरे में लिया. रतन सिंह जी को उनके आदमियों ने खोज निकाला और सुरक्षा के साथ किले में वापस ले गये. घमासान युद्ध हुआ, जहाँ दया करुणा को कोई स्थान नहीं था. मेवाड़ी और मुसलमान दोनों ही रण-खेत रहे. मैदान इंसानी लाल खून से सुर्ख हो गया था. शहीदों में गोरा और बादल भी थे, जिन्होंने मेवाड़ के भगवा ध्वज की रक्षा के लिए अपनी आहुति दे दी थी.

अल्लाउद्दीन की खूब मिटटी पलीद हुई. खिसियाता, क्रोध में आग बबूला होता हुआ, लौमड़ी सा चालाक और कुटिल सुल्तान दिल्ली को लौट गया.

उसे चैन कहाँ था, जुगुप्सा का दावानल उसे लगातार जलाए जा रहा था. एक औरत ने उस अधिपति को अपने चातुर्य और शौर्य से मुंह के बल पटक गिराया था. उसका पुरुष चित्त उसे कैसे स्वीकार का सकता था....उसके अहंकार को करारी चोट लगी थी....मेवाड़ का राज्य उसकी आँख की किरकिरी बन गया था. कुछ महीनों के बाद वह फिर चढ़ बैठा था चित्तौडगढ़ पर, ज्यादा फौज और तैय्यारी के साथ. उसने चित्तौड़गढ़ के पास मैदान में अपना खेमा डाला. किले को घेर लिया गया......किसी का भी बाहर निकलना सम्भव नहीं था...दुश्मन कि फौज के सामने मेवाड़ के सिपाहियों की तादाद और ताक़त बहुत कम थी. थोड़े बहुत आक्रमण शत्रु सेना पर बहादुर राजपूत कर पाते थे लेकिन उनको कहा जा सकता था ऊंट के मुंह में जीरा. सुल्तान की फौजें वहां अपना पड़ाव डाले बैठी थी, इंतज़ार में. छः महीने बीत गये, किले में संगृहीत रसद ख़त्म होने को आई. अब एक ही चारा बचा था, "करो या मरो." या "घुटने टेको." आत्मसमर्पण या शत्रु के सामने घुटने टेक देना बहादुर राजपूतों के गौरव लिए अभिशाप तुल्य था,.........ऐसे में बस एक ही विकल्प बचा था झूझना.....युद्ध करना.....शत्रु का यथासंभव संहार करते हुए वीरगति को पाना.

बहुत बड़ी विडंबना थी कि शत्रु के कोई नैतिक मूल्य नहीं थे. वे न केवल पुरुषों को मारते काटते, नारियों से बलात्कार करते और उन्हें भी मार डालते. यही चिंता समायी थी धर्म परायण शिशोदिया वंश के राजपूतों में. .......और मेवाड़ियों ने एक ऐतिहासिक निर्णय लिया.....किले के बीच स्थित मैदान में लकड़ियों, नारियलों एवम् अन्य इंधनों का ढेर लगाया गया.....सारी स्त्रियों ने, रानी से दासी तक, अपने बच्चों के साथ गोमुख कुन्ड में विधिवत पवित्र स्नान किया....सजी हुई चित्ता को घी, तेल और धूप से सींचा गया....और पलीता लगाया गया. चित्ता से उठती लपटें आकाश को छू रही थी......नारियां अपने श्रेष्ठतम वस्त्र-आभूषणों से सुसज्जित थी.....अपने पुरुषों को अश्रुपूरित विदाई दे रही थी....अंत्येष्टि के शोकगीत गाये जा रही थी. अफीम अथवा ऐसे ही किसी अन्य शामक औषधियों के प्रभाव से प्रशांत हुई, महिलाओं ने रानी पद्मावती के नेतृत्व में चित्ता कि ओर प्रस्थान किया.....और कूद पड़ी धधकती चित्ता में....अपने आत्मदाह के लिए....जौहर के लिए....देशभक्ति और गौरव के उस महान यज्ञ में अपनी पवित्र आहुति देने के लिए. जय एकलिंग, हर हर महादेव के उदघोषों से गगन गुंजरित हो उठा था. आत्माओं का परमात्मा से विलय हो रहा था.
अगस्त २५, १३०३ कि भोर थी, आत्मसंयमी दुखसुख को समान रूप से स्वीकार करनेवाला भाव लिए, पुरुष खड़े थे उस हवन कुन्ड के निकट, कोमलता से भगवद गीता के श्लोकों का कोमल स्वर में पाठ करते हुए.....अपनी अंतिम श्रद्धा अर्पित करते हुए.... प्रतीक्षा में कि वह विशाल अग्नि उपशांत हो. पौ फट गयी.....सूरज कि लालिमा ताम्रवर्ण लिए आकाश में आच्छादित हुई.....पुरुषों ने केसरिया बागे पहन लिए....अपने अपने भाल पर जौहर की पवित्र भभूत से टीका किया....मुंह में प्रत्येक ने तुलसी का पता रखा....दुर्ग के द्वार खोल दिए गये. जय एकलिंग....हर हर महादेव कि हुंकार लगते रणबांकुरे मेवाड़ी टूट पड़े शत्रु सेना पर......मरने मारने का ज़ज्बा था....आखरी दम तक अपनी तलवारों को शत्रु का रक्त पिलाया...और स्वयं लड़ते लड़ते वीरगति को प्राप्त हो गये. अल्लाउद्दीन खिलज़ी की जीत उसकी हार थी, क्योंकि उसे रानी पद्मिनी का शरीर हासिल नहीं हुआ, मेवाड़ कि पगड़ी उसके कदमों में नहीं गिरी. चातुर्य और सौन्दर्य की स्वामिनी रानी पद्मिनी ने उसे एक बार और छल लिया था.

मंगलवार, 5 अक्टूबर 2010

श्रीराम जन्मभूमि अयोध्या के संघर्ष की गौरवगाथा

''अयोध्या'' यह नाम पावनपुरी के रूप में विख्यात नगर का नाम है। अयोध्या का इतिहास भारतीय संस्कृति का इतिहास है। इसकी गौरवगाथा अत्यन्त प्राचीन है। माना जाता है कि वैवस्वत मनु ने इस नगरी की स्थापना की और उसका नाम अयोध्या रखा। सूर्यवंश के प्रतापी राजाओं की यह राजधानी थी। इसी सूर्यवंश में महाराजा सगर, राजा भगीरथ, राजा हरिश्चन्द्र हुए। जैन धर्म के पांच तीर्थंकर अयोध्या में जन्में। अयोध्या का दन्तधावन कुण्ड गौतम बुद्ध की तपस्या स्थली के रूप में जाना जाता है। सिख मत के प्रवर्तक गुरूनानक देव जी महाराज, नवम् गुरू तेगबहादुर जी महाराज तथा दशम् गुरू गोविन्द सिंह जी महाराज अयोध्या में पधारे। सुना जाता है कि महर्षि दयानन्द भी अयोध्या आए और उन्होंने अयोध्या में महाभारत युद्ध का नेतृत्व करने वाले योगीराज श्रीकृष्ण की मूर्ति की स्थापना की। अनादिकाल से यह नगरी मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु राम के जन्मस्थान के कारण पावन सप्तपुरियों में एक पुरी के रूप में जानी जाती है। यह नगर रामानन्द सम्प्रदाय का प्रमुख केन्द्र है।


इस्लामिक जेहाद का शिकार बने हिन्दू मन्दिर
यह भी एक ऐतिहासिक सत्य है कि इस्लाम के जन्म के पश्चात इसका विस्तार बौद्धिक आधार पर न होकर युद्ध में विजय के माध्यम से हुआ। इस्लाम के अनुयायी योद्धा अपने स्थान से चले, एक के बाद दूसरे क्षेत्रों को विजित करते रहे और उन्हें इस्लाम के अन्तर्गत लाते रहे। भारत में भी इस्लाम का प्रवेश आक्रमणकारी के रूप में हुआ। इस्लाम के अनुयायी सभी आक्रमणकारियों ने हिन्दुस्थान में हिन्दू सेनाओं को हराया, सम्पत्ति की लूटपाट की, समाज का कत्लेआम किया, साथ ही साथ समाज को मानसिक आघात पहुंचाने के लिए उन्होंने देव-स्थानों को अपना निशाना बनाया, उन्हें तोड़ा। देवी-देवताओं की मूर्तियों को खण्डित किया। कुछ स्थान पूरी तरह समाप्त कर दिए गए। हजारों स्थानों पर मस्जिदें बना दी गई, जिनका इतिहास खोजना भी कठिन हो गया है।

लेकिन अयोध्या, मथुरा, काशी और सोमनाथ मन्दिरों को तोड़ दिए जाने के बावजूद इनके इतिहास, इन मन्दिरों की गौरवगाथा को अपने दिल और दिमाग से हिन्दू समाज कभी हटा नहीं सका। अयोध्या में राम जन्मभूमि मन्दिर, त्रेता का ठाकुर मन्दिर व स्वर्गद्वार मन्दिर भी मुस्लिम शासकों ने तोड़े थे। बाद के दोनों मन्दिरों को तो अयोध्या का हिन्दू समाज और रामानन्द सम्प्रदाय शायद भूल गया परन्तु श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर तोड़े जाने को हिन्दू समाज कभी पचा नहीं पाया।


श्रीराम जन्मभूमि को प्राप्त करने के लिए सतत संघर्ष
अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर बना हुआ मन्दिर 1528 ई0 में आक्रमणकारी बाबर के आदेश पर उसके सेनापति मीरबांकी द्वारा तोड़ा गया। इस मन्दिर को प्राप्त करने के लिए हिन्दू समाज सदैव संघर्ष करता रहा और जीवन देता रहा। मीरबांकी द्वारा मंदिर तोड़े जाते समय भाटी नरेश महताब सिंह, हंसवर नरेश रणविजय सिंह, हंसवर के राजगुरू पं0 देवीदीन पाण्डेय ने 15 दिनों तक संघर्ष किया। घमासान युद्ध हुआ। बाबर के काल में ही इस स्थान को वापस प्राप्त करने के लिए 4 बार युद्ध हुए। हुमायुँ के शासनकाल में रानी जयराज कुँवारी एवं स्वामी महेश्वरानन्द जी के नेतृत्व में युद्ध हुए। 10 युद्धों का वर्णन मिलता है। अकबर के काल में 20 बार युद्ध हुये। अकबर ने श्रीराम जन्मभूमि परिसर के अन्दर तीन गुम्बदों वाले तथाकथित मस्जिद के ढांचे के सामने एक चबूतरा बनाकर तथा उस पर प्रभु राम का मन्दिर बनवाकर बेरोकटोक पूजा करने की अनुमति दे दी।

यही स्थान राम चबूतरे के नाम से विख्यात था। इस स्थान पर भगवान की पूजा सदैव चलती रही। 06 दिसम्बर, 1992 के बाद ही इस स्थान का अस्तित्व समाप्त हुआ। औरंगजेब के काल में भी 30 युद्ध हुये। बाबा वैष्णवदास, गोपाल सिंह, ठाकुर जगदम्बा सिंह आदि ने डटकर लोहा लिया।

अवध के नवाब सआदत अली के काल में हिन्दुओं ने 5 बार आक्रमण किये। नवाब ने परेशान होकर हिन्दुओं को पूजा की अनुमति दे दी। नवाब वाजिद अली शाह के काल में हिन्दुओं ने 4 बार लड़ाई लड़ी। बाबा उद्धवदास और भाटी नरेश ने ये युद्ध लड़े। 76 लड़ाइयों का वर्णन अयोध्या की गलियों में सुनने को मिलता है। निश्चित ही इन लड़ाइयों में लाखों हिन्दू वीरों ने अपनी जान दी होगी और लाखों विधर्मियों की जान ली भी होगी। हिन्दू समाज इस स्थान को प्राप्त तो नहीं कर सका परन्तु मुस्लिमों को भी चैन से नहीं बैठने दिया। अवध पर अंग्रेजों का अधिकार हो जाने के पश्चात अंग्रेजों ने तीन गुम्बदों वाले ढांचे और राम चबूतरा के बीच एक दीवार खड़ी करा दी। इस कारण हिन्दुओं का पूजा अर्चना के लिए केवल बाहर तक रहना लाचारी हो गई। परन्तु पूजा अर्चना बन्द नही हुई। हिन्दू मुस्लिम के बीच कटुता बढ़ गई। दंगे होने लगे।

बहादुर शाह जफर को अंग्रेजों के विरुद्ध जब प्रजा ने नेतृत्व सौंप दिया उस समय मुस्लिम नेता अमीर अली ने यह स्थल हिन्दुओं को वापस सौंप देने का निर्णय कर लिया। संयोगवश 1857 ई0 में अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष असफल हो गया। समय का लाभ उठाकर अंग्रेजों ने अमीर अली और बाबा रामचरण दास को एक इमली के पेड़ से लटका कर सार्वजनिक फांसी दे दी और यह स्थान हिन्दुओं को प्राप्त न हो सका।

सन् 1885 ई0 में महंत रघुवरदास ने फैजाबाद की अदालत में एक दीवानी मुकदमा दायर किया जिसमें राम चबूतरे के ऊपर बने कच्चे झोपड़े को पक्का बनाने की अनुमति मांगी, मुकदमा खारिज हो गया। ब्रिटिश न्यायाधीश कर्नल चैमियर की अदालत में अपील की गई। कर्नल चैमियर ने स्थान का स्वयं निरीक्षण किया और 1886 ई0 में अपने निर्णय में लिखा कि ''यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मस्जिद का निर्माण हिन्दुओं के एक पवित्र स्थल पर बने भवन को तोड़कर किया गया है। चूंकि यह घटना 356 वर्ष पुरानी है इसलिए इसमें कुछ करना उचित नही होगा।''

वर्ष 1934 में अयोध्या में मुस्लिमों द्वारा एक गऊ काट दिए जाने के कारण हिन्दू समाज आक्रोशित हो गया, अनेक गऊ हत्यारे मार दिए गए। इतना ही नहीं अपितु उत्तेजित हिन्दू समाज तथाकथित बाबरी मस्जिद पर भी चढ़ बैठा, उसके तीनों गुम्बदों को अपार क्षति पहुंचाई। इस स्थान पर हिन्दू पूरी तरह कब्जा तो नहीं कर पाए परन्तु इतना अवश्य हुआ कि इस घटना के बाद श्रीराम जन्मभूमि परिसर में प्रवेश करने की हिम्मत मुस्लिम समाज कभी जुटा नहीं सका। तोड़े गए तीनों गुम्बदों की मरम्मत अंग्रेज सरकार ने कराई और इसमें हुआ खर्च अयोध्या के हिन्दू समाज से टैक्स के रूप में वसूला गया। 1934 से यह स्थान पूरी तरह से हिन्दू समाज के कब्जे में है। बाहर राम चबूतरे पर हिन्दू समाज मूर्तियों की पूजा करता था और गुम्बदों के भीतर उस पवित्र भूमि पर पुष्प चढ़ाता था और मस्तक नवाता था।

स्वातंत्र्य प्राप्ति के पश्चात्
अयोध्या स्थित हनुमान गढ़ी के नागा बाबा अभिरामदास तथा परमहंस रामचन्द्रदास जी महाराज के नेतृत्व में अयोध्या के समाज में अपने संघर्ष को पुन: प्रारम्भ कर दिया। 23 दिसम्बर, 1949 को ब्रह्ममुहूर्त में ढांचे के मध्य गुम्बद के नीचे तेज प्रकाश के साथ भगवान रामलला प्रकट हो गये। आनन-फानन में हजारों लोग जन्मभूमि पर एकत्र हो गए। भगवान का भजन-पूजन प्रारम्भ हो गया। साधु सन्तों ने अखण्ड कीर्तन प्रारम्भ कर दिया जो 06 दिसम्बर, 1992 को ढांचा गिरने तक अनवरत जारी रहा। वर्ष 1949 में पं0 गोविन्द वल्लभ पन्त उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री, श्री के. के. नैय्यर फैजाबाद के जिलाधीश तथा ठाकुर गुरूदत्त सिंह अवैतनिक सिटी मजिस्ट्रेट थे।


दिनांक 29 दिसम्बर, 1949 को सिटी मजिस्ट्रेट ने दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 145 के अन्तर्गत ढांचे के भीतरी परिसर को कुर्क करके अयोध्या नगर पालिका के अध्यक्ष बाबू प्रियदत्तराम को उसके अन्दर चल रही पूजा अर्चना के संचालन के लिए रिसीवर नियुक्त कर दिया और रिसीवर का कर्तव्य निर्धारित किया गया कि वे ढांचे के मध्य गुम्बद के नीचे विराजित भगवान श्रीरामलला के विग्रहों की पूजा व भोग की व्यवस्था करेंगे। मुख्य बड़े द्वार को सींखचों से बन्द करके ताला डाल दिया गया। कुछ दिनों बाद कुर्की का आदेश भी वापस ले लिया गया परन्तु मुख्य द्वार पर ताला फिर भी लगा रहा। बगल में लगे छोटे द्वार से भगवान की पूजा अर्चना भोग के लिए पुजारी जाते-आते थे। जनता सींखचों के बाहर से रामलला के दर्शन करती थी। 01 फरवरी, 1986 को जिला न्यायाधीश फैजाबाद के आदेश से ताला खुल जाने तक सींखचों के बाहर से भगवान के दर्शन, पूजन का यह क्रम निर्बाध चलता रहा।

आन्दोलन का प्रारम्भ
उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद शहर से अनेक बार विधायक चुने गए तथा श्री चन्द्रभानु गुप्त के मुख्यमंत्रित्व काल में स्वास्थ्य मंत्री रहे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता स्वर्गीय श्री दाऊदयाल जी खन्ना के मस्तिष्क में श्रीराम जन्मभूमि-अयोध्या, श्रीकृष्ण जन्मभूमि-मथुरा तथा काशी विश्वनाथ मन्दिर को मुक्त कराने का विचार कौंधा। उन्होंने इन मन्दिरों की मुक्ति को सर्वप्रथम काशीपुर (नैनीताल-उत्तरांचल) में सम्पन्न हिन्दू सम्मेलन में अपने भाषण का विषय बनाया। तत्पश्चात अप्रैल, 1983 में मुजफ्फरनगर (उ0प्र0) में सम्पन्न हुए हिन्दू सम्मेलन में उपर्युक्त तीनों मन्दिरों की मुक्ति का प्रस्ताव स्वयं प्रस्तुत किया। इन सम्मेलनों का अयोजन हिन्दू जागरण मंच की ओर से किया गया था। श्री दाऊदयाल जी खन्ना ने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी जी को पत्र लिखकर तीनों धर्मस्थलों के सम्बन्ध में शीघ्र समाधान खोजने का निवेदन भी किया।

सन्तों ने आन्दोलन अंगीकार किया
अप्रैल, 1984 में दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में विश्व हिन्दू परिषद की ओर से धर्मसंसद का प्रथम आयोजन किया गया था। धर्मसंसद में 575 धर्माचार्य उपस्थित थे। श्री दाऊदयाल जी खन्ना ने तीनों धर्मस्थानों की मुक्ति का अपना प्रस्ताव पुन: रखा। प्रस्ताव एक मत से स्वीकार हुआ। श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति की स्थापना हुई, गोरक्षपीठाधीश्वर पूज्य महंत श्री अवेद्यनाथ जी महाराज इस समिति के अध्यक्ष और स्वर्गीय श्री दाऊदयाल जी खन्ना महामंत्री तथा श्री ओंकार जी भावे, श्री महेश नारायण सिंह तथा श्री दिनेश त्यागी (वर्तमान में हिन्दू महासभा के पदाधिकारी) मंत्री घोषित किए गए। श्रीराम जन्मभूमि पर लगे ताले को खुलवाने के लिए जन-जागरण करने का निर्णय हुआ।

सीतामढ़ी (बिहार) से 25 सितम्बर, 1984 को प्रारम्भ हुई श्रीरामजानकी रथयात्रा सड़क मार्ग से ग्रामों, कस्बों में जन-जागरण करती हुई 06 अक्टूबर को अयोध्या पहुंची। 07 अक्टूबर को अयोध्या में सरयू तट पर हजारों सन्तों व भक्तों ने सरयू जल हाथ में लेकर जन्मभूमि की मुक्ति का संकल्प लिया तथा ''जन्मभूमि का ताला खोलो'' का उद्घोष करते हुए श्रीरामजानकी रथ ने लखनऊ की ओर कूच किया। लखनऊ में धर्मसभा के पश्चात रथ दिल्ली की ओर चला। दुर्भाग्य से प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी की निर्मम हत्या कर दिए जाने के कारण रथयात्रा के सभी कार्यक्रम स्थगित कर दिए गए।


रथयात्राएं पुन: प्रारम्भ
विजयादशमी 1985 से 06 श्रीरामजानकी रथयात्राएं केवल उत्तर प्रदेश में पुन: प्रारम्भ हुई। अक्टूबर, 1985 में उडुप्पी (कर्नाटक) में धर्मसंसद का द्वितीय अधिवेशन हुआ, 850 सन्तों ने भाग लिया। महाशिवरात्रि 1986 तक ताला न खोले जाने पर सत्याग्रह करने का प्रस्ताव पारित हुआ। पूज्य महंत परमहंस श्री रामचन्द्र दास जी महाराज ने ताला न खोलने पर आत्मदाह की घोषणा की। रथों ने उत्तर प्रदेश का मंथन कर डाला, अद्भुत अद्भुत जन-जागरण हुआ।

ताला खुला
एक अधिवक्ता श्री उमेशचन्द्र पाण्डेय के प्रार्थना पत्र पर फैजाबाद के तत्कालीन जिला न्यायाधीश श्री के. एम. पाण्डेय ने सभी तथ्यों का संज्ञान लेते हुए 01 फरवरी, 1986 को श्रीराम जन्मभूमि पर लगा ताला खोलने का आदेश दे दिया। उसी दिन सायंकाल ताला तोड़ दिया गया। भक्तगण ढांचे के मध्य गुम्बद के नीचे स्थित रामलला के दर्शन करने के लिए प्रवेश करने लगे। मुस्लिम पक्ष ने निर्णय के विरुद्ध अपील की, ताला खोले जाने के आदेश के विरुद्ध मुस्लिमों द्वारा की गईं सभी अपीलें उच्च न्यायालय ने अक्टूबर, 1989 में निरस्त कर दी।


भव्य मन्दिर निर्माण की प्रक्रिया प्रारम्भ
तत्पश्चात् श्रीराम जन्मभूमि पर खड़े तीन गुम्बदों वाले पुराने जर्जर ढांचे के स्थान पर भव्य मन्दिर बनाने का चिन्तन प्रारम्भ हुआ। कर्णावती (अहमदाबाद) निवासी, मन्दिर वास्तुविद् (Temple Architect) श्री चन्द्रकान्त भाई सोमपुरा की खोज हुई, मन्दिर के अनेक प्रारूप बने, एक प्रारूप स्वीकार हुआ। मन्दिर का यह प्रारूप 270 फीट लम्बा, 135 फीट चौड़ा तथा 125 फीट ऊँचे शिखर वाला है, मन्दिर दो मंजिला है, पहली मंजिल पर रामलला तथा दूसरी मंजिल पर राम दरबार गर्भगृह में रहेंगे। राजस्थान के भरतपुर जनपद के बंसीपहाड़पुर क्षेत्र का हल्के गुलाबी रंग का बलुआ पत्थर मन्दिर निर्माण के लिए चयन किया गया।

अयोध्या में प्रस्तावित भव्य मंदिर निर्माण में लोहे का प्रयोग नहीं होगा। प्रत्येक मंजिल में 106 खम्भे हैं। प्रथम तल के खम्भों की ऊँचाई 16.5 फीट है तथा दूसरी मंजिल के खम्भों की ऊँचाई 14.5 फीट है। प्रत्येक मंजिल में 185 बीम लगेंगे, यह भी पत्थर के ही होंगे। बीम की अधिकतम लम्बाई 16 फीट है। मन्दिर में सफेद संगमरमर की चौखट में लकड़ी के दरवाजे लगेंगे।

मन्दिर निर्माण के लिए धन संग्रह
मन्दिर निर्माण के लिए आवश्यक धन संग्रह करने के उद्देश्य से जन-जन तक पहुँचने की अभूतपूर्व योजना बनी। योजना के अनुसार छोटे से छोटे ग्राम अथवा नगर के एक मोहल्ले से एक शिला का सामूहिक पूजन और पूजन करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के द्वारा मन्दिर निर्माण के लिए सवा रूपए की भेंट तथा बदले में श्रीराम जन्मभूमि का एक छोटा सा चित्र प्रत्येक दानदाता को कूपन रूप में दिया गया। 6 करोड़ व्यक्तियों से सम्पर्क हुआ। एकत्रित धन ''श्रीराम जन्मभूमि न्यास'' के नाम से बैंक में जमा किया गया। देश के 2.75 लाख ग्रामों तथा नगरों के मोहल्लों से पूजित रामशिलाएं अयोध्या पहुंची। विदेशों से एक लाख रूपए का चेक पूजित शिलाओं के साथ मन्दिर निर्माण के लिए प्राप्त हुआ था, परन्तु उस दान को प्राप्त करने के लिए तत्कालीन भारत सरकार की अनुमति नहीं मिली। परिणामत: धनराशि दान-दाताओं को वापस लौटा दी गई।

शिलान्यास
मन्दिर के प्रारूप एवं रामलला विराजमान के वर्तमान स्थल का तालमेल करते हुए भावी मन्दिर के सिंहद्वार के बाएं स्तम्भ का स्थान शिलान्यास के लिए चयनित हुआ। केन्द्र तथा उत्तर प्रदेश सरकार दोनों की सहमति से चयनित स्थल पर 10 नवम्बर, 1989 को शिलान्यास का पूजन कार्यक्रम विश्व हिन्दू परिषद-बिहार के तत्कालीन प्रान्त संगठन मंत्री श्री कामेश्वर चौपाल के हाथों सम्पन्न हुआ।


प्रथम कारसेवा की घोषणा
23, 24 जून, 1990 को हरिद्वार में मार्गदर्शक मण्डल बैठक में 30 अक्टूबर, 1990 को अयोध्या में मन्दिर निर्माण के लिए कारसेवा प्रारम्भ करने का निर्णय हुआ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री मुलायम सिंह यादव ने गर्वोक्ति कर दी कि अयोध्या में ''परिन्दा भी पर नहीं मार सकेगा''। कारसेवकों के जत्थे देशभर से अयोध्या के लिए चल पड़े। उत्तर प्रदेश में प्रवेश करते ही उन्हें पकड़ा जाने लगा। हजारों की संख्या में कारसेवक पकड़े गए। अयोध्या आने के सभी रास्ते बन्द कर दिए गए, सरयू पुल पर कंटीले तार फैला दिए गए, सरयू नदी में नावें उलट दी गईं। अयोध्या की पुलिस व्यवस्था को देखकर पत्रकार भी बोलने लगे कि यदि 30 अक्टूबर को हैलीकाप्टर से भी कोई फावड़ा ढांचे पर गिरा तो हम उसे कारसेवा मान लेंगे। इतनी घेराबन्दी के बावजूद हजारों कारसेवक अयोध्या में प्रवेश कर गए।
भूखे, प्यासे, खेतों-झाड़ियों में 5-6 दिन तक छिपे रहे। अयोध्या में सैंकड़ों मन्दिरों और परिवारों ने कारसेवकों को अपने घर में आश्रय दिया। वीतराग सन्त पूज्य वामदेव जी महाराज व अन्य अनेक सन्त, स्वयं श्री अशोक जी सिंहल, श्री श्रीशचन्द्र जी दीक्षित सारी बाधाओं के रहते हुए भी अयोध्या में प्रवेश पा गए। 30 अक्टूबर देवोत्थान एकादशी को निर्धारित समय पर कारसेवक जन्मभूमि की ओर चल पड़े। कहीं से कोई पुलिस के कब्जे से बस को लेकर सारे बैरियर तोड़ता हुआ जन्मभूमि तक पहुंच गया। कारसेवक ढांचे पर चढ़ गए, गुम्बदों पर झण्डा गाड़ दिया।
01 नवम्बर, 1990 को श्री मणिरामदास छावनी के चारधाम मन्दिर प्रांगण में आयोजित सभा में 02 नवम्बर को पुन: कारसेवा के लिए प्रस्थान करने की घोषणा हुई। 30 अक्टूबर की घटना से शासन अपमानित अनुभव कर रहा था। अपमान से पीड़ित शासन ने 02 नवम्बर, 1990 को दिगम्बर अखाड़ा से हनुमानगढ़ी की ओर जाने वाली संकरी गली में कारसेवकों पर गोली चलाकर नरसंहार रचा। केन्द्र में श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार का पतन हो गया। कारसेवक भगवान के दर्शन करके ही अयोध्या से लौटे। 40 दिन तक अयोध्या में सत्याग्रह चला।

कारसेवकों की अस्थियों के कलश सारे देश में घूमे। समाज ने श्रद्धांजलि अर्पित की। जनवरी, 1991 में प्रयाग में माघ मेला के अवसर पर हुतात्मा कारसेवकों की अस्थियों का विसर्जन संगम में सन्तों के हाथों हुआ। 04 अप्रैल, 1991 को दिल्ली के बोट क्लब पर रैली का आयोजन हुआ, 25 लाख लोग भारत के कोने-कोने से दिल्ली पहुंचे। स्वतंत्रता के पश्चात यह विशालतम रैली होने के कारण ऐतिहासिक बन गई। इसके बाद तो बोट क्लब पर सभाओं के आयोजन पर ही प्रतिबन्ध लग गया। रैली में सन्तों के भाषणों के मध्य ही समाचार आया कि उत्तर प्रदेश में श्री मुलायम सिंह यादव ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। समाज को स्वाभाविक प्रसन्नता हुई।

वार्ता के दौर
स्वर्गीय श्री राजीव गांधी जी के प्रधानमंत्रित्व काल में गृहमंत्री श्री बूटा सिंह जी हिन्दू व मुस्लिम प्रतिनिधियों के बीच बातचीत कराया करते थे। एक अवसर पर मुस्लिम प्रतिनिधियों ने पूज्य सन्तों से पूछा कि क्या गारंटी है कि यदि अयोध्या मथुरा, काशी के धर्मस्थान आपको दे दिए जाएं तो आप किसी चौथे की मांग नहीं करेंगे? सन्तों की ओर से इस प्रश्न का उत्तर दिया जाता, इसके पूर्व ही जनाब सैयद शाहबुद्दीन अपने प्रतिनिधियों पर बिगड़ कर बोलने लगे कि आप कौन होते हैं? इतने उदार बनकर इन स्थानों को सौंपने वाले।

श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल में आन्ध्र भवन में एक बार स्वर्गीय अलीमियां नदवी (लखनऊ) के नेतृत्व में मुस्लिम समाज के धार्मिक, सामाजिक नेता तथा पूज्य सन्त महापुरुष आमने-सामने बैठे थे, शुक्रवार का दिन था। जब दोपहर की नमाज का समय आया तो मुस्लिम पक्ष के लोग नमाज पढ़ने चले गए। नमाज के बाद लौटने पर पूज्य स्वामी श्री सत्यमित्रानन्द जी महाराज ने खड़े होकर अपना आंचल फैलाकर कहा कि नमाज के बाद ज़कात करने का विधान है। मैं आपसे श्रीराम जन्मभूमि की भीख मांगता हूँ। मुस्लिम प्रतिनिधियों का उत्तर था कि यह ''मिठाई का डिब्बा'' नहीं है जो उठाकर दे दें।

एक बार जनाब सैयद शाहबुद्दीन ने स्वयं कहा कि यदि यह सिद्ध हो जाए कि किसी मन्दिर को तोड़कर यह मस्जिद बनाई गई है, तो मुस्लिम समाज इस स्थान को छोड़ देगा। इसके उत्तर में जब उन्हें कहा गया कि काशी विश्वनाथ मन्दिर में प्रमाण स्पष्ट दिख रहा है, आप वह स्थान हिन्दू समाज को वापस दे दीजिए तो शाहबुद्दीन साहब बात पलट गए।

जब श्री चन्द्रशेखर प्रधानमंत्री बने, उन्होंने भी वार्तालाप कराने का प्रयास किया। उनकी पहल पर 01 दिसम्बर, 1990 को विश्व हिन्दू परिषद एवं बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के प्रतिनिधियों ने सरकारी प्रतिनिधियों की उपस्थिति में बातचीत प्रारम्भ की। बातचीत का मुख्य विचार बिन्दु था कि यदि यह सिद्ध हो जाए कि ''श्रीराम जन्मभूमि पर मन्दिर तोड़ कर विवादित ढांचा बनाया गया था'' तो मुसलमान उस पर अपना दावा छोड़ देंगे। 04 दिसम्बर, 1990 की बैठक में निर्णय हुआ कि दोनों पक्ष अपने साक्ष्य लिखित रूप में 22 दिसम्बर, 1990 तक गृह राज्य मंत्री के पास भेज देंगे।

गृह राज्य मंत्री 25 दिसम्बर, 1990 तक उन साक्ष्यों का सम्बंधित पक्षों में आदान-प्रदान कर देंगे। दोनों पक्ष साक्ष्यों की समीक्षा करके अपनी टिप्पणी 06 जनवरी, 1991 तक गृह राज्य मंत्री को देंगे। गृह राज्य मंत्री कार्यालय इन टिप्पणियों के आधार पर सहमति और असहमति के बिन्दु तैयार करके 09 जनवरी, 1991 तक दोनों पक्षों को भेज देगा। 10 जनवरी, 1991 को पुन: मिलेंगे। गुजरात भवन में दोनों पक्षों ने चर्चा की। अनुभव किया गया कि चार प्रकार के विशेषज्ञ (ऐतिहासिक, पुरातात्विक, राजस्व एवं कानून सम्बन्धी) उपलब्ध साक्ष्यों का विश्लेषण करें। यह भी तय हुआ कि विशेषज्ञों की सूची 17 जनवरी, 1991 तक सरकार को दी जाएगी।

विशेषज्ञों की बैठक 24 जनवरी, 1991 से प्रारम्भ होगी। विशेषज्ञों के निष्कर्ष 05 फरवरी, 1991 को दोनों पक्षों के समक्ष विचार के लिए रखे जाएंगे। यह भी निश्चित हुआ था कि मुस्लिम पक्ष भगवान राम की ऐतिहासिकता और अयोध्या की पहचान पर कोई प्रश्न खड़ा नहीं करेगा। अत: इन विषयों पर कोई वार्ता नहीं होगी। 24 जनवरी, 1991 को विशेषज्ञ दो टोलियों में साक्ष्यों का अध्ययन करने के लिए बैठे। मुस्लिम पक्ष की ओर से इतिहास और पुरातत्व के विशेषज्ञ आए थे। उन्होंने प्रारम्भ में ही सरकार को पत्र लिखकर दे दिया कि तथ्यों का अध्ययन करने के लिए उन्हें 6 सप्ताह का समय चाहिए जबकि हिन्दू पक्ष के विशेषज्ञ कहते रहे कि 05 फरवरी, 1991 के पूर्व कार्य सम्पन्न किया जा सकता है।

मुस्लिम पक्ष के राजस्व एवं कानूनी विशेषज्ञ उपस्थित ही नहीं हुए। 25 जनवरी, 1991 को फिर बैठक हुई। हिन्दू पक्ष के विशेषज्ञ पूर्व निर्धारित समय प्रात: 11.00 बजे गुजरात भवन पहुंच गए। मुस्लिम पक्ष का कोई भी विशेषज्ञ दोपहर 12.45 बजे तक बैठक स्थल, गुजरात भवन नहीं पहुंचा और न ही अपने न पहुंचने की सूचना दी, इससे यह निष्कर्ष निकाला गया कि मुस्लिम पक्ष बातचीत से भाग रहा है। मुस्लिम पक्ष की अनुपस्थिति को अपमानजनक समझा गया और बातचीत यहीं समाप्त हो गई।

मुस्लिम पक्ष के साथ बातचीत करने में एक अनुभव यह आया कि वे हर वार्तालाप में अपना पैंतरा बदलते थे। वार्तालाप से समाधान निकालने की चर्चा आज जब सुनी जाती है तो मन में प्रश्न उठता है कि अब वार्तालाप कहाँ से शुरू होगा ?

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा अधिग्रहण
10 अक्टूबर, 1991 को उत्तर प्रदेश सरकार के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री कल्याण सिंह जी ने विवादित ढांचे को छोड़कर उसके चारों ओर का 2.77 एकड़ भूखण्ड तीर्थ यात्रियों के लिए सुविधाएं विकसित करने के उद्देश्य से अधिग्रहीत कर लिया। मुस्लिम पक्ष की ओर से अधिग्रहण को उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई। उच्च न्यायालय ने 25 अक्टूबर, 1991 को अन्तरिम आदेश दिया की अधिग्रहीत भूमि पर उत्तर प्रदेश सरकार कब्जा कर सकती है, परन्तु दायर याचिकाओं का अन्तिम निपटारा होने तक कोई पक्का निर्माण नहीं करा सकेगी। याचिकाओं पर अन्तिम सुनवाई 4 नवम्बर, 1992 को पूरी करके निर्णय सुरक्षित रख लिया गया।


अधिग्रहीत क्षेत्र का समतलीकरण
अधिग्रहीत 2.77 एकड़ भूखण्ड का समतलीकरण अप्रैल, 1992 में उत्तर प्रदेश सरकार के पर्यटन विभाग ने प्रारम्भ करा दिया। साथ-साथ ही जन्मभूमि को राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 8 (लखनऊ-फैजाबाद-अयोध्या-गोरखपुर राजमार्ग) से जोड़ने के लिए 80 फीट चौड़ी सड़क के निर्माण का काम भी लोक निर्माण विभाग द्वारा प्रारम्भ कर दिया गया। समतलीकरण के दौरान 18 जून, 1992 को ढांचे के दक्षिणी पूर्वी कोने पर लगभग 12 फीट नीचे नक्काशीदार पत्थरों का जखीरा अचानक निकल आया। जिसमें अनेक अलंकृत तथा तरासे हुये किन्तु खण्डित पत्थर थे।

आज वे सभी पुरावशेष अयोध्या संग्रहालय में संरक्षित हैं। पुरातत्ववेत्ताओं ने 2 व 3 जुलाई, 1992 को स्थान का निरीक्षण किया और वे इस निश्चय पर पहुंचे कि सभी अवशेष 12वीं शताब्दी में उत्तर भारत में प्रचलित शैली के मंदिर के हैं। प्राप्त पुरावशेषों में मुख्यत: शिखर आमलक, जाल अलंकरण, शीर्ष, छज्जा, जगती का तला थर, द्वारशाखा, शिव-पार्वती हैं। जिस स्थान पर विवादित ढांचा खड़ा था वहाँ पक्की इटों की एक विशाल दीवार भी मिली।

ढांचे की पूर्णाहुति
30 अक्टूबर, 1992 को दिल्ली में आयोजित पंचम धर्मसंसद में पुन: कारसेवा प्रारम्भ करने के लिए 6 दिसम्बर की तिथि घोषित कर दी गई। नवम्बर के अन्तिम सप्ताह से ही अयोध्या में कारसेवकों का पहुँचना प्रारम्भ हो गया। अपेक्षा थी कि उच्च न्यायालय 2.77 एकड़ अधिग्रहीत भूखण्ड के विरुद्ध दायर की गई याचिकाओं पर अपना सुरक्षित रखा गया निर्णय 6 दिसम्बर के पूर्व सुना देगा। उत्तर प्रदेश सरकार ने 25 नवम्बर को सर्वोच्च न्यायालय से प्रार्थना भी की थी कि सर्वोच्च न्यायालय स्वयं आदेश जारी कर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ से सुरक्षित रखा गया निर्णय शीघ्र सुना देने का अनुरोध करे, सर्वोच्च न्यायालय ने उचित निर्देश दिया भी परन्तु उच्च न्यायालय ने निर्णय सुनाने की तिथि 11 दिसम्बर घोषित कर दी।

उत्तर प्रदेश सरकार चाहती थी कि निर्णय का केवल क्रियान्वयन वाला भाग ही 6 दिसम्बर के पूर्व सुना दिया जाए ताकि अनिश्चितता का अन्त हो किन्तु यह दलील भी बेकार गई। उच्च न्यायालय का निर्णय 11 दिसम्बर को आया लेकिन तब तक हिन्दू समाज के आक्रोश का विस्फोट हो चुका था। 1528 ई0 में भारत के मस्तक पर लगा कलंक का प्रतीक तीन गुम्बदों वाला ढांचा 06 दिसम्बर, 1992 का शाम ढलते-ढलते स्वयं अतीत का हिस्सा बन चुका था।

शिलालेख की प्राप्ति
ढांचे की दीवारों पर जब हमला हुआ तो जर्जर हो चुकी पुरानी दीवारें भरभराकर गिर पड़ीं। दीवारें खोखली थीं। खोखली दीवारें मलबे से भरी थीं, दीवारों से निकलने वाले नक्काशीदार पत्थरों को कारसेवक उठा-उठाकर मंच के नीचे लाकर रखने लगे। इसी बीच एक शिलालेख वहाँ लाकर रखा गया। श्रीमती सुधा मलैया (भोपाल) की बहादुरी, पुरातत्ववेत्ता डॉ0 स्वराज प्रकाश गुप्ता की सूझबूझ और वरिष्ठ पत्रकार श्री रामशंकर अग्निहोत्री व फैजाबाद निवासी युवा व्यवसायी श्री अशोक चटर्जी की कुशलता के परिणामस्वरूप वह शिलापट समाज के सामने आ गया। कालान्तर में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर भारत सरकार के विशेषज्ञों द्वारा इस शिलालेख का फोटो व छाप ली गई, जो उच्च न्यायालय लखनऊ पीठ में सुरक्षित है।

यह शिलालेख विशेषज्ञों द्वारा पढ़ लिया गया है और यह स्थापित हो गया है कि 5 फीट लम्बे तथा 2.25 फीट चौड़े इस आयताकार शिलापट पर 20 पंक्तियों में 30 श्लोक उत्कीर्ण हैं, इनकी भाषा संस्कृत तथा लिपि नागरी है, जो 12वीं शताब्दी के गहड़वाल राजवंश के अभिलेखों में पाई जाती है। शिलालेख का प्रारम्भ ''ऊँ नम: शिवाय'' से हुआ है। शिलालेख में अयोध्या, साकेत मण्डल में बने स्वर्ण कलशयुक्त मन्दिर तथा अयोध्या की सुन्दरता का वर्णन है। शिलालेख में वर्णन है कि बलि और दशानन का मानमर्दन करने वाले किसी पराक्रमी का यह मन्दिर है।

इसके अतिरिक्त लगभग 250 अन्य पुरावशेष उस ढांचे से प्राप्त हुये जो आज श्रीराम जन्मभूमि परिसर में भारत सरकार के नियंत्रण में रखें हैं। इनमें से अनेक पुरावशेष ठीक वैसे ही हैं जैसे समतलीकरण के दौरान 18 जून, 1992 को प्राप्त हुए थे।

पूजा के अधिकार को अदालत की मान्यता
8 दिसम्बर, 1992 की प्रात:काल ब्रह्म मुहुर्त के पूर्व ही केन्द्रीय सुरक्षा बलों ने सम्पूर्ण श्रीराम जन्मभूमि परिसर अपने अधिकार में ले लिया, तब तक कारसेवक रात-दिन परिश्रम करके श्रीरामलला विराजमान के लिए एक अस्थायी कपड़े का मन्दिर का निर्माण कर चुके थे। रामलला के चारों ओर लकड़ी के बांस बल्लियाँ लगाकर कपड़े की छत और उसकी सुरक्षा के लिए चारों ओर र्इंटों की पक्की दीवार बना दी गई थी। इसी को आज Makeshift Structure कहते हैं। श्रीरामलला विराजमान की पूजा अर्चना तो 6 दिसम्बर की सायंकाल को ही प्रारम्भ हो चुकी थी।

सुरक्षा बल की देखरेख में भगवान की पूजा-अर्चना जारी रही परन्तु जनता का आना-जाना बन्द हो गया। 21 दिसम्बर 1992 को श्री हरिशंकर जैन एडवोकेट (लखनऊ) ने हिन्दू अधिवक्ता संघ की ओर से उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के सम्मुख याचिका (5314/1992) दायर करके प्रार्थना की कि शासन को निर्देशित किया जाए कि ''वे श्रीरामलला विराजमान के दर्शन-पूजन-आरती-भोग में किसी प्रकार की बाधा उपस्थित न करे, आरती पूजा-भोग सम्पन्न करने के लिए पुजारियों को श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर में प्रवेश की अनुमति दी जाए, पूजा सम्बन्धी कर्मकाण्ड में बाधा न डाली जाए, ढांचे के मलबे से प्राप्त ऐतिहासिक महत्व के पुरावशेषों की सुरक्षा एवं संरक्षण किया जाए”। न्यायमूर्ति श्री हरिनाथ तिलहरी एवं न्यायमूर्ति श्री ए.एन गुप्ता की खण्डपीठ ने 01 जनवरी 1993 को याचिका स्वीकार करते हुए, वादी के पक्ष में निर्णय दिया। जनता को दर्शन की आज्ञा पुन: प्राप्त हो गई।

अदालत की भूमिका
अयोध्या विवाद से सम्बंधित पाँच मुकदमे चल रहे हैं। प्रथम वाद 1950 में श्री गोपाल सिंह विशारद द्वारा (सिविल वाद संख्या 2/1950) सिविल जज फैजाबाद की अदालत में दायर किया था जिसमें मांग की गयी थी कि भगवान के निकट जाकर दर्शन और पूजा करने का वादी का अधिकार सुरक्षित रखा जाए, इसमें किसी प्रकार की बाधा या विवाद प्रतिवादियों द्वारा खड़ा न किया जाए तथा ऐसी निषेधाज्ञा जारी की जाए ताकि प्रतिवादी भगवान को अपने वर्तमान स्थान से हटा न सके। इसी प्रकार की मांग करते हुए दूसरा वाद (संख्या 25/1950) परमहंस रामचन्द्रदास जी महाराज ने दायर किया। श्री विशारद के वाद में निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) ने अन्तरिम निर्णय देकर श्रीरामलला की मूर्तियाँ उसी स्थान पर बनाए रखने तथा हिन्दुओं द्वारा उनकी पूजा अर्चा, आरती व भोग निर्बाध जारी रखने का आदेश दिया तथा एक रिसीवर नियुक्त कर दिया। इस अन्तरिम आदेश की पुष्टि इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा अप्रैल, 1955 में कर दी गई।

तृतीय वाद सन् 1959 में निर्मोही अखाड़ा द्वारा (संख्या 26/1959) दायर करके मांग की गई कि श्रीराम जन्मभूमि की पूजा व्यवस्था की देखभाल का दायित्व निर्मोही अखाड़े को दिया जाए और रिसीवर को हटा दिया जाए।

चतुर्थ वाद 18 दिसम्बर, 1961 को (अर्थात भगवान प्राकटय के 11 वर्ष 11 माह व 26 दिन बाद) उत्तर प्रदेश सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड द्वारा (संख्या 12/1961) दायर किया गया। अपने वाद में विवादित ढांचे को ''मस्जिद'' घोषित करने तथा पूजा सामग्री हटाने और ढांचे के चारों ओर के आसपास के भू-भाग को कब्रिस्तान घोषित करने की मांग की।

यह भी उल्लेखनीय है कि सुन्नी वक्फ बोर्ड ने फरवरी, 1996 में कब्रिस्तान सम्बंधी अपनी प्रार्थना को वापस ले लिया। परिणामस्वरूप विवाद केवल तीन गुम्बदों वाले ढांचे तक ही सीमित रह गया। यही छोटा सा स्थान अदालत के समक्ष आज विचाराधीन है।

अन्तिम व पंचम वाद भगवान श्रीरामलला विराजमान की ओर से 01 जुलाई, 1989 को श्री देवकीनन्दन अग्रवाल (पूर्व न्यायाधीश इलाहाबाद हाईकोर्ट) द्वारा दायर किया गया। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार प्राण-प्रतिष्ठित मूर्ति एक जीवित इकाई है अपना मुकदमा लड़ सकती है परन्तु प्राण-प्रतिष्ठित मूर्ति अवयस्क मानी जाती है। अत: उनका मुकदमा लड़ने के लिए किसी एक व्यक्ति को माध्यम बनाया जाता है। अत: न्यायालय ने रामलला का मुकदमा लड़ने के लिए श्री देवकीनन्दन अग्रवाल को रामलला के अभिन्न सखा (Next Friend) के रूप में अधिकृत कर दिया। इस वाद में अदालत से मांग की गई थी कि श्रीराम जन्मभूमि अयोध्या का सम्पूर्ण परिसर वादी (देव-विग्रह) का है, अत: श्रीराम जन्मभूमि पर नया मन्दिर बनाने का विरोध करने वाले अथवा इसमें किसी प्रकार की आपत्ति या बाधा खड़ी करने वाले प्रतिवादियों के विरूध्द स्थायी स्थगन आदेश जारी किया जाये।

भारत सरकार द्वारा अधिग्रहण
ढांचा गिर जाने के पश्चात् 7 जनवरी, 1993 को भारत सरकार ने अध्यादेश जारी करके श्रीराम जन्मभूमि का विवादित परिसर व उसके चारों ओर का 67 एकड़ भूखण्ड अधिग्रहीत कर लिया। केन्द्रीय सुरक्षा बल को इस सम्पूर्ण परिसर की सुरक्षा का दायित्व सौंप दिया गया। अनेक लोगों ने अधिग्रहण को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी। महामहिम राष्ट्रपति महोदय ने संविधान की धारा 143ए के अंतर्गत अपने अधिकार का उपयोग करते हुये सर्वोच्च न्यायालय से अपने एक प्रश्न कि ''क्या विवादित स्थल पर 1528 ई0 के पूर्व कोई हिन्दू मंदिर या भवन मौजूद था ?'' का उत्तर मांगा। अधिग्रहण के विरूद्ध दायर की गई याचिकाओं तथा महामहिम राष्ट्रपति महोदय के प्रश्न पर एक साथ सुनवाई हुई।

लगभग 20 माह तक सर्वोच्च न्यायालय की 5 सदस्यीय संविधान पीठ ने सभी पक्षों के विचार सुने और बहुमत के आधार पर 24 अक्टूबर, 1994 को अपना निर्णय दिया कि
1. महामहिम राष्ट्रपति महोदय का प्रश्न हम सम्मानपूर्वक अनुत्तरित वापस कर रहे हैं।
2. भारत सरकार द्वारा किया गया अधिग्रहण विधि अनुकूल है।
3. श्रीरामजन्मभूमि/बाबरी मस्जिद विवादित ढांचे वाले स्थान से सम्बन्धित सभी मुकदमों का निपटारा इलाहाबाद उच्च न्यायालय की तीन-सदस्यीय पीठ करेगी।

सर्वोच्च न्यायालय के उक्त निर्णय के पश्चात् से सभी वाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खण्डपीठ के समक्ष अन्तिम निपटारे हेतु आ गये। आज कुल चार वाद (प्रथम, तृतीय, चतुर्थ व पंचम) ही उच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है क्योंकि वर्ष 1990 में परमहंस रामचन्द्रदास जी महाराज ने अपना मुकदमा वापस ले लिया था।

जून 1996 में उच्च न्यायालय लखनऊ पीठ में वादी सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से गवाहों के मौखिक बयान प्रारम्भ हुए। मई 2002 तक लगभग 6 वर्ष में कुल 28 गवाहों के बयान रिकार्ड कराकर वादी पक्ष ने अपनी गवाही को समाप्त घोषित कर दिया। तत्पश्चात् वाद क्रमांक 5 रामलला विराजमान के गवाहों के बयान लिखना प्रारम्भ हुआ। जुलाई 2003 तक वादी पक्ष ने अपने 16 गवाहों के बयान रिकार्ड कराकर गवाही को समाप्त घोषित कर दिया। गोपाल सिंह विशारद के वाद क्रमांक 1 में भी तीन गवाहों के बयान लिखे गये। अगस्त 2003 में निर्मोही अखाड़ा वाद क्रमांक 3 की गवाही प्रारम्भ हुई, वह भी समाप्त हो चुकी है। इस प्रकार गवाहों के मौखिक बयान रिकार्ड किए जाने का कार्य समाप्त हो चुका है।

राडार तरंगों द्वारा फोटोग्राफी एवं उत्खनन
वाद के मुख्य प्रश्न '' कि क्या 1528 ई0 के पूर्व विवादित स्थल पर कोई हिन्दू मन्दिर खड़ा था ?'' का उत्तर खोजने के लिए उच्च न्यायालय ने स्वयं प्रेरणा से श्रीराम जन्मभूमि के परिसर में राडार तरंगों द्वारा फोटो सर्वेक्षण कराया। सर्वेक्षण रिपोर्ट फरवरी, 2003 में अदालत को प्राप्त हुई। कनाडा के नागरिक विशेषज्ञ ने अपनी सर्वेक्षण रिपोर्ट के निष्कर्ष में लिखा कि :-
"In conclusion, the GPR survey reflects in general a variety of anomalies ranging from 0.5 to 5.5 meters in depth that could be associated with ancient and contemporanous structures such as pillars, foundations walls, slab flooring extending over a large portion of the site. However, the exact nature of those anomalies has to be confirmed by systematic ground truthing, such as provided by archeological tranching."

इसी आधार पर पुरातत्व विभाग को सम्बंधित बिन्दुओं पर वैज्ञानिक तरीके से उत्खनन करके राडार तरंगों की सर्वेक्षण रिपोर्ट की सत्यता को जांचने का आदेश 05 मार्च, 2003 को उच्च न्यायालय ने दिया। पांच मास तक चले उत्खनन कार्य की रिपोर्ट 22 अगस्त, 2003 को पुरातत्व विभाग के द्वारा उच्च न्यायालय को सौंप दी गई। उत्खनन रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि-
The Hon'ble High Court, in order to get sufficient archaeological evidence on the issue involved "whether there was any temple/structure which was demolished and mosque was constructed on the disputed site" as stated on page 1 and further on p. 5 of their order dated 5 march 2003, had given directions to the Archaeological Survey of India to excavate at the disputed site where the GPR Survey has suggested evidence of anomalies which could be structure, pillars, foundation walls, slab flooring etc, which could be confirmed by excavation. Now, viewing in totality and taking into account the archaeological evidence of a massive structure just below the disputed structure and evidence of continuity in structural phasses from the tenth century onwards upto the construction of the disputed structure alongwith the yield of stone and decorated bricks as well as mutilated sculpture of divine couple and carved architectural members including foliage patterns, amalaka, kapotapali doorjamb with semi-circular pilaster, broken octagonal shaft of black schist pillar, lotus motif, circular shrine having pranala (waterchute) in the north, fifty pillar based in association of the huge structure, are indicative of remains which are distinctive features found associated with the temples of north India.

उत्खनन रिपोर्ट के कारण मुस्लिम समाज व कुछ इतिहासकारों, पुरातत्ववेत्ताओं व राजनेताओं में मची खलबली से सारा देश परिचित है। मुस्लिम पक्ष ने उत्खनन रिपोर्ट को रद्द कर दिए जाने की माँग अदालत से की। दोनों पक्षों की ओर से तर्क प्रस्तुत किए गए। अन्तत: उत्खनन रिपोर्ट न्यायालय के रिकार्ड पर रखे जाने का आदेश तो हो गया परन्तु यह भी आदेश हुआ कि सभी पक्ष विशेषज्ञ-पुरातत्ववेत्ताओं को अदालत में लाकर उनके मौखिक बयान के द्वारा उत्खनन रिपोर्ट की समीक्षा करेंगे।

अदालत की वर्तमान स्थिति
अदालत में पुरातत्ववेत्ताओं के उत्खनन रिपोर्ट पर बयान लिखे जाने का कार्य समाप्ति की ओर है। बयान समाप्ति के बाद वकीलों की जिरह प्रारम्भ होगी। जिरह समाप्ति के बाद ही फैसला लिखा जाएगा। उच्च न्यायालय का फैसला घोषित होने के बाद सर्वोच्च न्यायालय में कोई न कोई पक्ष अपील लेकर अवश्य जाएगा। सर्वोच्च न्यायालय कब और क्या निर्णय करेगा, इसकी भविष्यवाणी भी कोई नहीं कर सकता।

अदालत का फैसला आने के बाद भी उसको क्रियान्वयन करने का नैतिक बल सरकारों के पास होगा या नहीं, यह कहना बहुत कठिन है। बनारस के दोशीपुरा कब्रिस्तान से सम्बंधित शिया व सुन्नी मुस्लिमों के बीच पिछले 110 वर्षों से चले आ रहे विवाद में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा वर्ष 1983 में दिए गए निर्णय का क्रियान्वयन आज तक नहीं हुआ। क्या जागरूक और स्वाभिमानी समाज अपने धर्म की रक्षा का दायित्व सरकार की कृपा पर छोड़ दे ?

मन्दिर निर्माण की प्रगति
सितम्बर, 1990 में अयोध्या में मन्दिर निर्माण हेतु पत्थरों की आपूर्ति तथा ड्राईंग के अनुसार पत्थरों की नक्काशी प्रारम्भ हुई। अप्रैल, 1992 से पत्थर नक्काशी के काम में गति आई। बसन्त पंचमी 1996 से राजस्थान के पिण्डवाड़ा कस्बे में 3 कार्यशालाओं को नक्काशी का काम अनुबन्ध पर दिया गया। कार्य को तीव्र गति से करने के लिए अयोध्या में 2 बड़ी कटर मशीन लगाई गई। संगमरमर की चौखट बनाने का काम मकराना (राजस्थान) में अनुबन्ध पर दिया गया।

आज तक मन्दिर के फर्श पर लगने वाला सम्पूर्ण पत्थर, भूतल पर खड़े होने वाले सभी 106 स्तम्भ, भूतल एवं प्रथम तल के रंगमण्डप और गर्भगृह की दीवारें, भूतल की छत के बीम की नक्काशी पूर्णता की ओर है। नक्काशी किया हुआ सम्पूर्ण पत्थर अयोध्या में रामघाट पर स्थित कार्यशाला में दर्शनार्थ रखा गया है। लकड़ी का बना हुआ मन्दिर का एक माडल तथा वर्ष 1989 में पूजित 2.75 लाख रामशिलाएं भी इसी कार्यशाला में रखी हैं। प्रतिदिन सैंकड़ों दर्शनार्थी इन्हें देखने के लिए आते हैं।

जरा विचार करें
1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात के राजनीतिक नेतृत्व का व्यवहार श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन को समझने में बहुत सहायक है। आजादी के तत्काल बाद झण्डा बदला गया, युनियन जैक के स्थान पर तिरंगा लाया गया अर्थात युनियन जैक में गुलामी और तिरंगे में स्वातंत्र्य और स्वाभिमान के दर्शन किए गए। देश में जहाँ-जहाँ रानी विक्टोरिया की मूर्तियाँ स्थापित थीं, उन सबको एक-एक करके हटाया जाने लगा। अयोध्या का तुलसी उद्यान, अमृतसर का विक्टोरिया चौक, दिल्ली में चांदनी चौक का पार्क इसके उदाहरण हैं। दिल्ली में इण्डिया गेट के नीचे खड़ी अंग्रेज की मूर्ति हटाई गई। देश में सड़कों व पार्कों के नाम बदले गए, जी.टी. रोड, महात्मा गांधी मार्ग बन गया। कम्पनी गार्डन को गांधी पार्क कहा जाने लगा। दिल्ली के इर्विन हॉस्पिटल, विलिंग्टन हॉस्पिटल, मिन्टो ब्रिज ये सभी नाम बदल दिए गए। कारण स्पष्ट है कि इन नामों में विदेशी गुलामी की दुर्गन्ध आती थी।

गुलामी के प्रतीकों को समाप्त करने की प्रेरणा से प्रेरित होकर प्रथम गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल जी ने सोमनाथ मन्दिर की मुक्ति का संकल्प लिया था, केन्द्रीय मंत्री मण्डल नें प्रस्ताव पारित किया, महात्मा गांधी जी की सहमति से एक न्यास बना, रातों-रात सोमनाथ मन्दिर के स्थान पर बना ढांचा समुद्र में चला गया, सम्पूर्ण भूखण्ड न्यास को समर्पित हो गया, एक भव्य मन्दिर का निर्माण हुआ। मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा के समय प्रथम राष्ट्रपति डॉ0 राजेन्द्र बाबू जी स्वयं उपस्थित रहे। उनका भाषण हम सबके लिए व आने वाली पीढ़ियों के लिए भी मार्गदर्शक है। धीरे-धीरे मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति शुरू हो गई। पटेल जी की मृत्यु के बाद इस्लामिक गुलामी के चिन्हों को हटाने में राजनेताओं को अपना राजनीतिक जीवन समाप्त होता दिखने लगा। मुस्लिम समाज चुनावों में मुस्लिम हितों की रक्षा के लिए मतदान करता है जबकि हिन्दू समाज अपनी जाति, भाषा, पंथ के आधार पर अपनी रूचि के व्यक्ति को जिताने में आनन्दित होता है। वह अपने सम्मान की रक्षा के लिए वोट नहीं देता। इस परिस्थिति को बदलने का कार्य श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन ने किया। मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति पर अंकुश लगा।

हिन्दू समाज अपने, अपने पूर्वजों, अपने धर्म, अपनी संस्कृति के सम्मान की रक्षा के लिए जागरूक बना। यदि अंग्रेजों की गुलामी के प्रतीकों को हटाना राष्ट्रभक्ति है, सोमनाथ मन्दिर का निर्माण सरदार पटेल जी की राष्ट्रभक्ति का प्रतीक है, यदि प्रथम राष्ट्रपति राजेन्द्र बाबू जी का सोमनाथ मन्दिर में प्राण प्रतिष्ठा के अवसर पर उपस्थित रहना उनकी राष्ट्रभक्ति का प्रतीक है, तो श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति का आन्दोलन भी राष्ट्रभक्ति का ही प्रतीक है।

श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन यह किसी मन्दिर को प्राप्त करने की सामान्य लड़ाई नहीं है। कभी भी न बदलने वाली जन्मभूमि को प्राप्त करने का यह संघर्ष है। जन्मभूमि भी एक ऐसे महापुरुष की जिसे कोटि-कोटि हिन्दू भगवान के रूप में पूजता है, मृत्यु के समय भी जिस नाम के उच्चारण की लालसा रखता है। इससे भी अधिक यह संघर्ष विदेशी इस्लामिक आक्रमणकारी के कलंक को मिटाने का संघर्ष है, यह संघर्ष हिन्दू समाज की सांस्कृतिक आजादी की लड़ाई है।

राष्ट्रीयता बनाम अराष्ट्रीयता का संघर्ष है मंदिर-मस्जिद विवाद

श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन केवल हिन्दू मुस्लिम संघर्ष नहीं, मंदिर-मस्जिद विवाद नहीं बल्कि यह राष्ट्रीयता बनाम अराष्ट्रीय का संघर्ष है। राष्ट्र माने केवल भू भाग, जमीन का टुकड़ा नहीं वरन् उस जमीन पर बसने वाले समाज में विद्यमान एकत्व की भावना है। यह भावना देश का इतिहास, परम्परा, संस्कृति से निर्माण होती है। राम इस देश का इतिहास ही नहीं बल्कि एक संस्कृति और मर्यादा का प्रतीक हैं, एक जीता-जागता आदर्श हैं। इस राष्ट्र की हजारों वर्ष की सनातन परम्परा के मूलपुरुष हैं।

हिन्दुस्थान का हर व्यक्ति, चाहे पुरुष हो, महिला हो, किसी प्रांत या भाषा का हो उसे राम से, रामकथा से जो लगाव है, उसकी जितनी जानकारी है, जितनी श्रद्धा है और किसी में भी नहीं है। भगवान राम राष्ट्रीय एकता के प्रतीक हैं। राम राष्ट्र की आत्मा हैं।

संविधान निर्माताओं ने भी संविधान की मूल प्रति में लंका विजय के बाद पुष्पक विमान में बैठकर जाने वाले श्रीराम, माता जानकी व लक्ष्मण जी का चित्र दिया है। संविधान सभा में तो सभी मत-मतान्तरों के लोग थे। सभी की सहमति से ही चित्र छपा है। उस प्रथम प्रति में गीतोपदेश करते भगवान श्रीकृष्ण, भगवान बुद्ध, भगवान महावीर आदि श्रेष्ठ पुरूषों के चित्र हैं। ये हमारे राष्ट्रीय महापुरुष हैं। अतः ऐसे भगवान राम के जन्मस्थान की रक्षा करना हमारा संवैधानिक दायित्व भी है।

समाजवादी विचारधारा के सुप्रसिद्ध भारतीय विद्वान् डॉ. राममनोहर लोहिया जी को हम सब जानते हैं। उन्होंने कहा है- ‘‘राम-कृष्ण-शिव हमारे आदर्श हैं। राम ने उत्तर-दक्षिण जोड़ा और कृष्ण ने पूर्व-पश्चिम जोड़ा। अपने जीवन के आदर्श इस दृष्टि से सारी जनता राम-कृष्ण-शिव की तरफ देखती है। राम मर्यादित जीवन का परमोत्कर्ष हैं, कृष्ण उन्मुक्त जीवन की सिद्धि हैं और शिव यह असीमित व्यक्तित्व की संपूर्णता है। हे भारत माता! हमें शिव की बुद्धि दो, कृष्ण का हृदय दो और राम की कर्मशक्ति, एकवचनता दो।’’ ऐसे राष्ट्रीय महापुरूष के जन्मस्थान की रक्षा करना हमारा राष्ट्रीय कर्त्तव्य है। देश की एकता और अखण्डता के लिए करणीय कार्य है।

श्रीराम जन्मभूमि राष्ट्रीय अस्मिता व स्वाभिमान का विषय है। अपमान का परिमार्जन करना ही पुरुषार्थ है। इसके लिए यह आन्दोलन है। स्वाभिमान जागरण से ही देश खड़ा होता है और सारी समस्याओं का हल करने का सामर्थ्य बढ़ता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ऐसा प्रयत्न अपवाद स्वरूप में ही हुआ।

सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण यह अपवाद था। यह मंदिर 1026 से इक्कीस बार तोड़ा गया परन्तु बार-बार उसका पुनर्निर्माण होता रहा। आखिर औरंगजेब के आदेश से सन 1706 में यह मंदिर तोड़ा गया और वहां मस्जिद निर्माण की गई।


स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद गुलामी के चिह्न हटाने और स्वाभिमान जागरण के लिए सरदार पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया। महात्मा गांधी ने उसका समर्थन किया। पंडित नेहरू के मंत्रिपरिषद ने जिसमें मौलाना आजाद भी एक मंत्री थे, सभी ने सोमनाथ मंदिर निर्माण की अनुमति दी। संसद ने प्रस्ताव पारित किया।

उस समय देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद जी थे। उनके करकमलों से 11 मई 1951 को सोमनाथ में शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। उनके वहां जाने का कुछ सेक्युलरिस्टों ने विरोध किया परन्तु उन्होंने माना नहीं। यह देश की अस्मिता का, प्रतिष्ठा का विषय है, ऐसी डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की भावना थी।

उस समय डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने सोमनाथ में उन्होंने कहा, ‘‘सोमनाथ भारतीयों का श्रद्धा स्थान है। श्रद्धा के प्रतीक का किसी ने विध्वंस किया तो भी श्रद्धा का स्फूर्तिस्रोत नष्ट नहीं हो सकता। इस मंदिर के पुनर्निर्माण का हमारा सपना साकार हुआ। उसका आनन्द अवर्णनीय है।’’ इस कार्यक्रम में भगवान सोमनाथ को 121 तोपों से सलामी दी गई थी।

25 दिसम्बर 1947 को दिल्ली के बिरला हाउस में महात्मा गांधी द्वारा दिया गया प्रवचन महत्व का है। एक उर्दू समाचार पत्र में लेख आया था कि अगर सोमनाथ होगा तो फिर से गजनी आयेगा। उस प्रवचन में महात्मा गांधीजी बोले- “मोहम्मद गजनी ने जंगली, हीन काम किया। उसके बारे में यहां के मुसलमान गर्व का अनुभव करते हैं तो यह दुर्भाग्य का विषय है। इस्लामी राज में जो बुराइयाँ हुईं, उन्हें मुस्लिमों को समझना और कबूल करना चाहिए। अगर यहां के मुसलमान फिर से गजनी की भाषा बोलेंगे तो इसे यहां कोई बर्दाश्त नहीं करेगा।’’

सोमनाथ मंदिर के सम्बन्ध में जो भावना महात्मा गांधी, सरदार पटेल, डॉ. राजेन्द्रप्रसाद आदि महानुभावों की थी, वही भावना श्रीराम जन्मभूमि के संबंध में हमारी है। वर्ष 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश के चौराहों में, बगीचों में लगी महारानी विक्टोरिया और जार्ज पंचम की मूर्तियां हटाई गईं। सड़कों के नाम बदले, दिल्ली का इर्विन अस्पताल जयप्रकाश नारायण अस्पताल बना, मिण्टो ब्रिज को शिवाजी ब्रिज कहने लगे। मुम्बई में विन्सेट रोड बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर रोड हो गया और विक्टोरिया टर्मिनल रेलवे स्टेशन का नाम छत्रपति शिवाजी टर्मिनल हो गया। ये पुराने नाम गुलामी के चिह्न थे इसीलिए हटाए गए। बाबरी ढांचा गुलामी का चिह्न था; राम जन्मभूमि मंदिर यह स्वतंत्रता का चिह्न है।

आधा यूरोप अनेक साल इस्लामी वर्चस्व में रहा। उस समय इस्लामी आक्रान्ताओं ने अनेक चर्च गिराकर वहां मस्जिदें बनाईं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इन ईसाई यूरोपियन देशों ने ऐसी मस्जिदें ध्वस्त करके वहां फिर से चर्च बनाए। यह अपमान का परिमार्जन था। 1815 में पोलैण्ड रूस ने जीता। जीतने के बाद रूस ने पोलैण्ड की राजधानी वारसा में एक बड़े चौराहे पर एक चर्च का निर्माण किया। प्रथम महायुद्ध की समाप्ति के समय 1918 में पोलैण्ड स्वतंत्र हुआ। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पोलैण्ड की सरकार ने रूस निर्मित चर्च गिराया और उसी जगह दूसरे चर्च का निर्माण किया।

रूस और पोलैण्ड दोनों ईसाई हैं, तो भी रूसी चर्च क्यों गिराया गया ? स्वाभिमानी पोलैण्ड की सरकार का उत्तर था-रूसी चर्च गुलामी का चिह्न था, इसीलिए वह गिराया और अब यह नया चर्च हमारी स्वतंत्रता का प्रतीक है। इसको कहते हैं राष्ट्रीय स्वाभिमान। इसी भावना से अयोध्या, मथुरा, काशी के धर्मस्थान मुक्त होने चाहिए।


हम सब जानते हैं कि 1669 में औरंगजेब ने काशी विश्वनाथ का मंदिर तोडा और वहां ज्ञानवापी मस्जिद बनाई। यह समाचार मिलते ही शिवाजी ने औरंगजेब को चेतावनी देने वाला और काशी विश्वनाथ सहित अन्य धर्मस्थान मुक्त करने का संकल्प व्यक्त करने वाला पत्र लिखा था। अपने अन्य सरदार, मंत्रियों के साथ धर्मस्थान मुक्ति की चर्चा छत्रपति शिवाजी करते थे। स्वयं छत्रपति शिवाजी महाराज ने अनेक मंदिरों का पुनर्निर्माण किया था। वे जब दक्षिण भारत में गए थे तो आज के तमिलनाडु में दो मंदिरों का पुनर्निर्माण किया। कुछ वर्ष पहले दोनों मंदिर गिराकर मुसलमानों ने वहां मस्जिदें बनायी थी। मस्जिदें गिराकर फिर से मंदिर का निर्माण किया गया।

सभी मराठा सरदार, पेशवा इस संकल्प पूर्ति के लिए प्रयत्न करते थे। सुप्रसिद्ध ज्योर्तिलिंग त्र्यम्बकेश्वर, तीर्थ क्षेत्र नासिक स्थित सुंदर नारायण मंदिर, उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर जैसे अनेक मंदिरों को मुगल राज ने विध्वंस किया था। इन मंदिरों का पुनर्निर्माण मराठों ने बाद में किया था। जब मराठों के विजयी घोड़े उत्तर भारत में दौड़ने लगे तो धर्मस्थान मुक्ति का प्रयत्न प्रारंभ हुआ।

सन् 1751 से 1759 में अवध के नवाब को अयोध्या, प्रयाग, काशी की मुक्ति की शर्त लगाकर ही मदद की गयी थी। मराठों का लगातार दबाव रहा था। दुर्भाग्य से पानीपत की सन् 1761 की लड़ाई में हार हुई और काशी, अयोध्या उस समय मुक्त नहीं हो सके।

हमारा बाबर का क्या सम्बन्ध है ? वो एक विदेशी, विधर्मी हमलावर था। बाबर मध्य एशिया का था। उसने पहले अफगानिस्तान जीता, बाद में भारत में आया। बाबर की कब्र अफगानिस्तान में है। भारत का एक प्रतिनिधि मण्डल 1969 में अफगानिस्तान गया था। उसमें सुप्रसिद्ध विचारक, अफगानिस्तान-नीति के विशेषज्ञ डॉ. वेदप्रताप वैदिक भी थे। वे बाबर की कब्र देखने गए। वह कब्र जीर्ण-शीर्ण अवस्था में थी। उन्होंने एक अफगानी नेता से पूछा, बाबर के कब्र की ऐसी दुरावस्था क्यों ? अफगान नेता का उत्तर था- बाबर का हमारा क्या सम्बन्ध ? बाबर एक विदेशी हमलावर था, उसने हमारे ऊपर आक्रमण किया, हमें गुलाम बनाया। वह मुसलमान था इसीलिए यह कब्र हमने गिरायी नहीं। परन्तु जिस दिन गिरेगी, उस समय हरेक अफगानी को आनन्द होगा। बाबर हमारा शत्रु था, यह बोलने वाले श्री बबरक करमाल 1981 में अफगान के प्रधानमंत्री बने। उनकी भावना भारत के मुसलमानों को ध्यान में लेनी चाहिए।

इण्डोनेशिया की 90 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है। वह घोषित मुस्लिम देश है। परन्तु उनका सर्वश्रेष्ठ आदर्श आज भी ‘राम’ हैं। वहां के प्राथमिक विद्यालय में रामायण का अध्ययन अनिवार्य है। भारत में क्यों नहीं ? इण्डोनेशिया 700 वर्ष पहले हिन्दू-बौद्ध था। उन्होंने अपनी परंपराएं नहीं छोड़ी है।

ईरान मुस्लिम देश है परन्तु वे रूस्तम, सोहराब को राष्ट्रीय पुरूष मानते हैं। रूस्तक, सोहराब तीन हजार साल पहले हुए और वे पारसी थे; मुस्लिम नहीं। मिस्र देश में पिरामिड राष्ट्रीय प्रतीक हैं। पिरामिड साढ़े तीन हजार वर्ष पूर्व के हैं और उस समय इस्लाम था ही नहीं। भगवान राम हजारों वर्ष पूर्व हुए; उस समय इस्लाम था ही नहीं। भारत के मुसलमान भी 200-400-800 साल पहले हिन्दू ही थे। तो भारत के मुस्लिम राम को अपना पूर्वज, भारत का राष्ट्रीय महापुरूष क्यों नहीं मानते ?ईरान और मिस्र के मुस्लिमों का आदर्श यहां के मुसलमान रखेंगे तो सारी समस्या का हल हो जायेगा। भारत का उत्थान हो जायेगा। राष्ट्रीय एकता आयेगी।

भगवान श्रीराम भारत की पहचान है, राष्ट्रीयता के प्रतीक हैं। बाबर विदेशी हमलावर, हमारा शत्रु था। बाबर के संबंध में गुरू नानकदेवजी ने कहा है, बाबर का राज माने पाप की बारात। उस बाबर ने मंदिर तोड़ा, उस बाबरी ढांचे के लिए चिल्लाना यह अराष्ट्रीयता है। हम राम के भक्त हैं या बाबर के वारिस, यह प्रश्न सबको पूछना चाहिए ? राम मंदिर निर्माण यह राष्ट्रीयता का विषय है। उस पर समझौता नहीं हो सकता।

सेकुलर-वामपंथी बुद्धिजीवी बहुत दुखी हैं अयोध्या निर्णय से

अयोध्या पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का बहुप्रतीक्षित निर्णय आखिरकार मीडिया की भारी-भरकम काँव-काँव के बाद आ ही गया। अभी निर्णय की स्याही सूखी भी नहीं थी कि सदभावना-भाईचारा-अदालती सम्मान के जो नारे सेकुलर गैंग द्वारा लगाये जा रहे थे, 12 घण्टों के भीतर ही पलटी खा गये। CNN-IBN जैसे सुपर-बिकाऊ चैनल ने अदालत का नतीजा आने के कुछ घंटों के भीतर ही फ़्लैश चमकाना शुरु कर दिया था कि “मन्दिर तोड़कर नहीं बनाई थी मस्जिद…” मानो तीनो जजों से भी अधिक बुद्धिमान हो ये चैनल। हालांकि कांग्रेस द्वारा सभी चैनलों और अखबारों को बाकायदा शरीफ़ाना शब्दों में “धमकाया” गया था कि फ़ैसला चाहे जो भी आये, उसे ऐसे पेश करना है कि मुसलमानों को दुख न पहुँचे, जितना हो सके कोर्ट के निर्णय को “हल्का-पतला” करके दिखाना है, ताकि सदभावना बनी रहे और उनकी दुकानदारी भी चलती रहे।
परन्तु क्या चैनल, क्या अखबार, क्या सेकुलर बुद्धिजीवी और क्या वामपंथी लेखक… किसी का पेट-दर्द 8-10 घण्टे भी छिपाये न छिप सका और धड़ाधड़ बयान, लेख और टिप्पणियाँ आने लगीं कि आखिर अदालत ने यह फ़ैसला दिया तो दिया कैसे? सबूतों और गवाहों के आधार पर जजों ने उस स्थान को राम जन्मभूमि मान लिया, जजों ने यह भी मान लिया कि मस्जिद के स्थान पर कोई विशाल हिन्दू धार्मिक ढाँचा था (भले ही मन्दिर न हो), जजों ने यह भी फ़ैसला दिया कि वह मस्जिद गैर-इस्लामिक थी…और उस समूचे भूभाग के तीन हिस्से कर दिये, जिसमें से दो हिस्से हिन्दुओं को और एक हिस्सा मुसलमानों को दिया गया। (पूरा फ़ैसला यहाँ क्लिक करके पढ़ें… http://rjbm.nic.in/)
हिन्दू-विरोध की रोटी खाने वालों के लिये तो यह आग में घी के समान था, जो बात हिन्दू और हिन्दू संगठन बरसों से कहते आ रहे थे उस पर कोर्ट ने मुहर लगा दी तो वे बिलबिला उठे। मुलायम सिंह जैसे नेता उत्तरप्रदेश में सत्ता में वापसी की आस लगाये वापस अपने पुराने “मौलाना मुलायम” के स्वरूप में हाजिर हो गये, वहीं लालू और कांग्रेस की निराशा-हताशा भी दबाये नहीं दब रही। फ़ैसले के बाद सबसे अधिक कुण्ठाग्रस्त हुए वामपंथी और सेकुलर लेखक।
रोमिला थापर जैसे इतिहासकारों के कान के नीचे अदालत ने जो आवाज़ निकाली है उसकी गूंज काफ़ी दिनों तक सुनाई देती रहेगी। अब उनके लगुए-भगुए इस निर्णय की धज्जियाँ अपने-अपने तरीके से उड़ाने में लगे हैं, असल में उनका सबसे बड़ा दुःख यही है कि अदालत ने हिन्दुओं के पक्ष में फ़ैसला क्यों दिया? जबकि यही लोग काफ़ी पहले से न्यायालय का सम्मान, अदालत की गरिमा, लोकतन्त्र आदि की दुहाई दे रहे थे (हालांकि इनमें से एक ने भी अफ़ज़ल की फ़ाँसी में हो रही देरी पर कभी मुँह नहीं खोला है), और अब जबकि साबित हो गया कि वह जगह राम जन्मभूमि ही है तो अचानक इन्हें इतिहास-भूगोल-अर्थशास्त्र सब याद आने लगा है। जब भाजपा कहती थी कि “आस्था का मामला न्यायालय तय नहीं कर सकती” तो ये लोग जमकर कुकड़ूं-कूं किया करते थे, अब पलटी मारकर खुद ही कह रहे हैं कि “आस्था का मामला हाईकोर्ट ने कैसे तय किया? यही राम जन्मभूमि है, अदालत ने कैसे माना?”…
अब उन्हें कौन समझाये कि हिन्दुओं ने तो कभी नहीं पूछा कि यरुशलम में ईसा का जन्म हुआ था या नहीं? ईसाईयों ने कहा, हमने मान लिया… हिन्दुओं ने तो कभी नहीं पूछा कि कश्मीर की हजरत बल दरगाह में रखा हुआ “बाल का टुकड़ा” क्या सचमुच किसी पैगम्बर का है… मुस्लिमों ने कहा तो हमने मान लिया। अब जब करोड़ों हिन्दू मानते हैं कि यही राम जन्मभूमि है तो बाकी लोग क्यों नहीं मानते? इसलिये नहीं मानते, क्योंकि हिन्दुओं के बीच सेकुलर जयचन्दों और विभीषणों की भरमार है… इनमें से कोई वोट-बैंक के लिये, कोई खाड़ी से आने वाले पैसों के लिये तो कोई लाल रंग के विदेशियों की पुस्तकों से “प्रभावित”(?) होकर अपना काम करते हैं, इन लोगों को भारतीय संस्कृति, भारतीय आध्यात्मिक चरित्रों और परम्परागत मान्यताओं से न कोई लगाव है और न कोई लेना-देना।
अब आते हैं इस फ़ैसले पर – जो व्यक्ति कानून का जानकार नहीं है, वह भी कह रहा है कि “बड़ा अजीब फ़ैसला है”, एक आम आदमी भी समझ रहा है कि यह फ़ैसला नहीं है बल्कि बन्दरबाँट टाइप का समझौता है, क्योंकि जब यह मान लिया गया है कि वह स्थान राम जन्मभूमि है तो फ़िर ज़मीन का एक-तिहाई टुकड़ा मस्जिद बनाने के लिये देने की कोई तुक ही नहीं है। तर्क दिया जा रहा है कि वहाँ 300 साल तक मस्जिद थी और नमाज़ पढ़ी जा रही थी… इसलिये उस स्थान पर मुस्लिमों का हक है। यह तर्क इसलिये बोदा और नाकारा है क्योंकि वह मस्जिद ही अपने-आप में अवैध थी… अब वामपंथी बुद्धिजीवी पूछेंगे कि मस्जिद अवैध कैसे? इसका जवाब यह है कि बाबर तो अफ़गानिस्तान से आया हुआ एक लुटेरा था, उसने अपनी सेना के बल पर अयोध्या में जबरन कब्जा किया और वहाँ जो कुछ भी मन्दिरनुमा ढाँचा था, उसे तोड़कर मस्जिद बना ली… ऐसे में एक लुटेरे द्वारा जबरन कब्जा करके बनाई गई मस्जिद वैध कैसे हो सकती है? उसे वहाँ मस्जिद बनाने की अनुमति किसने दी?
कुछ तर्कशास्त्री कहते हैं कि वहाँ कोई मन्दिर नहीं था, चलो थोड़ी देर को मान लेते हैं कि मन्दिर नहीं था… लेकिन कुछ तो था… और कुछ नहीं तो खाली मैदान तो होगा ही… तब बाहर से आये हुए एक आक्रांता द्वारा अतिक्रमण करके स्थानीय राजा को जबरन मारपीटकर बनाई गई मस्जिद वैध कैसे हो गई? यानी जब शुरुआत ही गलत है तो वहाँ नमाज़ पढ़ने वाले किस आधार पर 300 साल नमाज पढ़ते रहे? अफ़गानिस्तान के गुंडों की फ़ौज द्वारा डकैती डाली हुई “खाली ज़मीन” (मान लो कि मन्दिर नहीं था) पर बनी मस्जिद में नमाज़ कैसे पढ़ी जा सकती है?
इसे दूसरे तरीके से एक काल्पनिक उदाहरण द्वारा समझते हैं – यदि अजमल कसाब ताज होटल पर हमला करता और किसी कारणवश या कमजोरीवश भारत के लोग अजमल कसाब को ताज होटल से हटा नहीं पाते, कसाब ताज होटल की छत पर चादर बिछाकर नमाज़ पढ़ने लगता, उसके दो-चार साथी भी वहाँ लगातार नमाज़ पढ़ते जाते… इस बीच 300 साल गुज़र जाते… तो क्या हमें ताज होटल का एक तिहाई हिस्सा मस्जिद बनाने के लिये दे देना चाहिये? सिर्फ़ इसलिये कि उस जगह पर कसाब और उसके वंशजों ने नमाज़ पढ़ी थी? मैं समझने को उत्सुक हूं कि आखिर बाबर और कसाब में क्या अन्तर है?
मूल सवाल यही है कि आखिर सन 1528 से पहले अयोध्या में उस जगह पर क्या था? क्या बाबर को अयोध्या के स्थानीय निवासियों ने आमंत्रण दिया था कि “आओ, हमें मारो-पीटो, एक मस्जिद बनाओ और हमें उपकृत करो…”? बाबर ने जो किया जबरन किया, किसी तत्कालीन राजा ने उसे मस्जिद बनाने के लिये ज़मीन आबंटित नहीं की थी, बाबर ने जो किया अवैध किया तो मस्जिद वैध कैसे मानी जाये? एक आक्रान्ता की निशानी को भारत के देशभक्त मुसलमान क्यों अपने सीने से चिपकाये घूम रहे हैं? हाईकोर्ट का निर्णय आने के बाद सबसे अधिक सदभावनापूर्ण बात तो यह होगी कि भारत के मुस्लिम खुद आगे आकर कहें कि हमें इस तथाकथित मस्जिद से कोई लगाव नहीं है और न ही हम ऐसी बलात कब्जाई हुई जगह पर नमाज़ पढ़ना चाहते हैं, अतः हिन्दुओं की भावनाओं की खातिर जो एक तिहाई हिस्सा कोर्ट ने दिया है हम उसका भी त्याग करते हैं और हिन्दू इस जगह पर भव्य राम मन्दिर का निर्माण करें, सभी मुस्लिम भाई इसमें सहयोग करेंगे… यह सबसे बेहतरीन हल है इस समस्या का, बशर्ते मुसलमानों को, सेकुलर और वामपंथी बुद्धिजीवी ऐसी कोई पहल करने दें और कोई ज़हर ना घोलें। ऐसी पहल शिया नेता कल्बे जव्वाद की शिया यूथ विंग “हुसैनी टाइगर” द्वारा की जा चुकी है, ज़ाहिर है कि कल्बे जव्वाद, “सेकुलर बुद्धिजीवियों” और “वामपंथी इतिहासकारों” के मुकाबले अधिक समझदार हैं…
परन्तु ऐसा होगा नहीं, मुलायम-लालू-चिदम्बरम सहित बुरका दत्त, प्रणव रॉय, टाइम्स समूह जैसे तमाम सेकुलरिज़्म के पैरोकार अब मुसलमानों की भावनाओं को कभी सीधे, तो कभी अप्रत्यक्ष तौर पर भड़कायेंगे, इसकी शुरुआत भी फ़ैसले के अगले दिन से ही शुरु हो चुकी है। उधर पाकिस्तान में भी “मुस्लिम ब्रदरहुड” नामक अवधारणा(?) हिलोरें मारने लगी है (यहाँ देखें…) और उन्हें हमेशा की तरह इस निर्णय में भी “इस्लाम पर खतरा” नज़र आने लगा है, मतलब उधर से भी इस ठण्डी पड़ती आग में घी अवश्य डाला जायेगा… और डालें भी क्यों नहीं, जब इधर के मुसलमान भी “कश्मीर में मारे जा रहे मुसलमानों और उन पर हो रहे अत्याचारों”(?) के समर्थन में एक बैठक करने जा रहे हैं (यहाँ देखिये…)। क्या यह सिर्फ़ एक संयोग है कि भारत से अलग होने की माँग करने वाले अब्दुल गनी लोन ने भी उसी सुर में सुर मिलाते हुए कहा है कि “अयोघ्या का फ़ैसला मुसलमानों के साथ धोखा है…” (ठीक यही सुर मुलायम सिंह का भी है)… क्या इसका मतलब अलग से समझाना पड़ेगा?
अब चिदम्बरम जी कह रहे हैं कि बाबरी ढाँचा तोड़ना असंवैधानिक था और उसके दोषियों को बख्शा नहीं जायेगा…। क्या हो गया है चिदम्बरम जी आपको? यदि कोई गुण्डा मेरे घर में घुस कर बरामदे में अपना पूजास्थल बना लेता है तो उसे तोड़ने का मुझे कोई हक नहीं है? चिदम्बरम जी के “कांग्रेसी तर्क” को अपना लिया जाये, तो क्यों न शक्ति स्थल के पास ही मुशर्रफ़ मस्जिद, याह्या खां मस्जिद बनाई जाये, या फ़िर नेहरु के शांतिवन के पास चाऊ-एन-लाई मेमोरियल बनाया जाये, ये लोग भी तो भारत पर चढ़ दौड़े थे, आक्रांता थे…
अब फ़ैसला तो वामपंथी और सेकुलरों को करना है कि वे किसके साथ हैं? भारत की संस्कृति के साथ या बाहर से आये हुए एक आक्रान्ता की “तथाकथित मस्जिद” के साथ?
अक्सर ऐसा होता है कि मीडिया जिस मुद्दे को लेकर भचर-भचर करता है उसमें हिन्दुत्व और हिन्दुओं का नुकसान ही होता है, क्योंकि उनकी मंशा ही ऐसी होती है… परन्तु इस बार इस मामले का सकारात्मक पक्ष यह रहा कि मीडिया द्वारा फ़ैलाये गये रायते, जबरन पैदा किये गये डर और मूर्खतापूर्ण हाइप की वजह से 1992 के बाद पैदा हुई नई पीढ़ी को इस मामले की पूरी जानकारी हो गई… हमें भी अपने नौनिहालों और टी-एजर्स को यह बताने में आसानी हुई कि बाबर कौन था? कहाँ से आया था? उसने क्या किया था? इतने साल से हिन्दू एक मन्दिर के लिये क्यों लड़ रहे हैं, जबकि कश्मीर में सैकड़ों मन्दिर इस दौरान तोड़े जा चुके हैं… आदि-आदि। ऐसे कई राजनैतिक-धार्मिक सवाल और कई मुद्दे जो हम अपने बच्चों को ठीक से समझा नहीं सकते थे, मीडिया और उसकी “कथित निष्पक्ष रिपोर्टिंग”(?) ने उन 17-18 साल के बच्चों को “समझा” दिये हैं। कश्मीरी पण्डितों की दुर्गति जानने के बाद, अब उन्हें अच्छी तरह से यह भी “समझ” में आ गया है कि भारत के मीडिया को कांग्रेस और मुस्लिमों का “दलाल” क्यों कहा जाता है। जैसे-जैसे आज की पीढ़ी इंटरनेट पर समय बिताएगी, ऑरकुट-फ़ेसबुक-मेल पर बतियाएगी और पढ़ेगी… खुद ही इन लोगों से सवाल करेगी कि आखिर इतने साल तक इस मुद्दे को किसने लटकाया? वे कौन से गिरे हुए बुद्धिजीवी हैं और किस प्रकार के घटिया इतिहासकार हैं, जो बाबर (या मीर बाकी) की बनाई हुई मस्जिद को “पवित्र” मानते रहे हैं…। नई पीढ़ी ये भी सवाल करेगी कि आखिर वे किस प्रकार के “धर्मनिरपेक्ष” अफ़सर और लेखक थे जिन्होंने राम और रामसेतु को काल्पनिक, तथा रामायण को एक नॉवेल बताया था…ये सभी लोग बामियान (अफ़गानिस्तान) में सादर आमंत्रित हैं…
अब देखना है कि भारत के मुसलमान इस अवैध मस्जिद को कब तक सीने से चिपकाये रखते हैं? पाकिस्तान, देवबन्द और उलेमा बोर्ड के भड़काने से कितने भड़कते हैं? अपने आपको सेकुलर कहने वाले मुलायम और वामपंथी लोगों के बहकावे में आते हैं या नहीं? दोहरी चालें चलने वाली कांग्रेस मामले को और लम्बा घसीटने के लिये कितने षडयन्त्र करती है? जो एक तिहाई हिस्सा उन्हें खामख्वाह मिल गया है क्या उसे सदभावना के तहत हिन्दुओं को सौंपते हैं? सब कुछ भविष्य के गर्भ में है… फ़िलहाल तो हिन्दू इस फ़ैसले से अंशतः नाखुश होते हुए भी इसे मानने को तैयार है… (भाजपा ने भी कहा कि विवादित परिसर से दूर एक विशाल मस्जिद बनाने में वह सहयोग कर सकती है), लेकिन कुछ “बुद्धिजीवी”(?) मुस्लिमों को भड़काने के अपने नापाक इरादों में लगे हुए हैं… अयोध्या फ़ैसले के बाद ये बुद्धिजीवी सदमे और सन्निपात की हालत में हैं और बड़बड़ा रहे हैं…। कहा नहीं जा सकता कि आगे क्या होगा, लेकिन अब गेंद मुसलमानों के पाले में है…। अभी समय है कि वे जमीन के उस एक-तिहाई हिस्से को हिन्दुओं को सौंप दें, ताकि मन्दिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो सके…। कहीं ऐसा न हो कि सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के बाद वह एक तिहाई हिस्सा भी उनके हाथ से निकल जाये

सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

दूसरा कश्मीर बनता असम

गुरुवार को असम में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के पीछे उल्फा या किस आतंकवादी संगठन का हाथ है, इसके बारे में फिलहाल कोई जानकारी नहीं है, लेकिन इतना तय है कि हाल के दिनों में सीमावर्ती असम के इलाकों में पाकिस्तानी झंडों के लहराए जाने से इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस तरह की घटनाओं के पीछे कौन लोग हो सकते हैं?

हाल के दिनों में देश के भीतर आतंकवाद की घटनाओं ने सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा दी है और सब परेशान हैं कि आखिर इसकी वजह क्या है? पूर्वोत्तर या असम में भी इस तरह के भीषण धमाके हो सकते हैं, इसका अंदाजा केन्द्र और राज्य सरकार को नहीं रहा होगा। तभी तो खुफिया एजेंसियाँ भी राज्य और केन्द्र सरकार को समय रहते आगाह नहीं कर सकीं।

पर असम में होने वाले धमाके बताते हैं कि देश के ज्यादातर राज्यों में स्लीपर सेल्स हैं, जो आतंकवादियों की हर तरह से मदद करते हैं और धमाकों को अंजाम देने के लिए स्थानीय आदमी भी मुहैया कराते हैं और असम भी इसका अपवाद नहीं है, वरन असम में तो सबसे ज्यादा हालात खराब हैं।

कई कारणों से असम का मामला अलग है, क्योंकि यह इलाका बांग्लादेशी घुसपैठ, पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी के मददगारों के जड़ें जमाने और स्थानीय स्तर के तनावों के चलते सांप्रदायिक, विभिन्न वर्गों या गुटीय हिंसा के मैदान के रूप में बड़ी तेजी से उभरा है।

असम में होने वाली हिंसा कहीं अधिक गंभीर और दूरगामी असर डालने वाली है। पाकिस्तान से सटे कश्मीर की तरह अब बांग्लादेश (कभी पूर्वी पाकिस्तान) से सटे असम में देश के दुश्मनों द्वारा चिंगारी भड़काई जा रही है। विशेषज्ञों की नजर में यदि समय रहते इसे बुझाया नहीं गया तो यह चिंगारी भयंकर आग का रूप धारण कर एक और कश्मीर बन सकती है।

क्या असम में फैली हिंसा बांग्लादेशी घुसपैठियों और आईएसआई के आकाओं तथा उल्का जैसे भारत विरोधी संगठनों की एक सोची-समझी साजिश है? क्या इसके पीछे हमेशा भारत को अस्थिर रखने की कोशिश में जुटा पाकिस्तान नहीं है? असम में रह रहे बांग्‍लादेशी घुसपैठियों ने उदालगिरी जिले के आइठनबारी, पूनिया, पानबारी, मोहनपुर सोनाईपारा मेपाकिस्तान के ही झंडे क्यों लहराए, बांग्‍लादेश के क्यों नहीं?

वर्ष 1979 से ही घुसपैठियों की समस्या से जूझते आ रहे असम और अब मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश तथा नगालैण्ड के लोग बांग्लादेशी मुसलमानों की घुसपैठ से तंग आ चुके हैं। ये अवैध बांग्लादेशी न केवल उनकी भूमि, व्यवसाय और संसाधनों पर कब्जा कर रहे हैं, बल्कि जिस भी क्षेत्र में उनकी संख्या 25 प्रतिशत से अधिक होती जा रही है, वहाँ से हिन्दुओं को भगाने के लिए षड्यंत्र रच रहे हैं। इसी कारण असम, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश और नगालैण्ड के निवासी अवैध बांग्‍लादेशियों को उनके राज्य से निकालने के लिए आंदोलन करते रहे हैं।

क्या असम में फैली हिंसा बांग्लादेशी घुसपैठियों और आईएसआई के आकाओं तथा उल्फा जैसे भारत विरोधी संगठनों की एक सोची-समझी साजिश है? क्या इसके पीछे हमेशा भारत को अस्थिर रखने की कोशिश में जुटा पाकिस्तान नहीं है
इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे छात्र संगठनों ने चेतावनी दी थी और बांग्‍लादेशियों को भारत छोड़ने का 'अल्टिमेटम' दे दिया था, पर इसके विरुद्ध बांग्लादेशी मुस्लिमों ने ऑल असम माइनारिटी स्टूडेन्ट्स यूनियन (आमसू) के बैनर तले 'असम बंद' की घोषणा की थी।

इस बंद के दौरान कट्टरपंथी मुस्लिम युवक हिंसक हो गए। उन्होंने अनेक वाहन फूँक दिए और 8 हिन्दुओं को मौत के घाट उतार दिया था। हिंसा का सिलसिला यहीं नहीं थमा, ईद के अगले ही दिन यानी 3 अक्टूबर को पूर्व योजना के तहत उदालगिरी जिले में बांग्लादेशी मुसलमानों ने हिन्दुओं और उनके गाँवों के विरुद्ध हिंसक अभियान छेड़ दिया।

बोडो, गारो, खासी, राभा, संथाल जनजातियों के साथ असमिया, बंगला और हिन्दी बोलने वाली जनजातियों के गाँवों पर योजनाबद्ध ढंग से हमला बोला गया। 40 से अधिक हिन्दू बहुल गाँवों पर हमला कर उन्हें आग के हवाले करने का प्रयास किया गया। इसमें इकबारी, बाताबारी, फाकिडिया, नादिका, चाकुआपारा, पूनिया, झारगाँव, जेरुआ, बोरबागीचा, आइठनबारी, राउताबागान और सिदिकुआ के सैकड़ों घर जल गए और हजारों हिन्दू पलायन कर गए।

उन्हें उदालगिरी डिग्री कॉलेज, उदालगिरी गर्ल्स हाईस्कूल, नलबाड़ी के एलपी स्कूल और कैलाइबारी के स्कूल में शिविर बनाकर रखा गया है। यह हिंसा निकटवर्ती दर्रांग जिले में भी फैल गई और वहाँ भी हजारों लोग जान बचाने के लिए शरणार्थी शिविरों में रहने को मजबूर हैं।


उदालगिरी के झाकुआपाड़ा में गाँव बूढ़ा (ग्राम प्रधान) को उसकी माँ और बहन के साथ जिंदा जला देने की घटना ने सभी को हिलाकर रख दिया। इसके बाद भड़के जनाक्रोश के कारण कांग्रेसी राज्य सरकार ने इस मामले पर मुँह खोला, वह भी अल्पसंख्यकों (अर्थात अवैध बांग्‍लादेशी मुसलमानों) को मरहम लगाने के लिए। राज्य सरकार ने इसे बोडो और संथालों तथा मुसलमानों के बीच साम्प्रदायिक हिंसा के रूप में परिभाषित करने का प्रयास किया।

यह भी कहा गया कि इसके लिए नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैण्ड (एनडीएफबी) दोषी है, जबकि सच्चाई यह है कि यह बांग्‍लादेशी मुसलमानों और असमिया हिन्दुओं के बीच संघर्ष है। यह इससे भी साफ होता है कि दर्रांग जिले में जो हिंसा हुई, उसमें ब्रह्मपुत्र नदी के पार मारीगाँव के मुसलमानों ने भी साथ दिया, जो ब्रह्मपुत्र के छोटे-छोटे द्वीपों से नाव द्वारा दर्रांग जिले में घुसे थे। ये सब सेना की वर्दी पहने हुए थे। यह वही पद्धति है, जो मुसलमानों ने 1983 के दंगों के समय अपनाई थी।

सूत्रों के अनुसार इस बार की हिंसा के दौरान ऑल असम माइनारिटी स्टूडेन्ट्स यूनियन (आमसू), स्टूडेन्ट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी), ऑल असम मुस्लिम छात्र परिषद् और मुस्लिम स्टूडेन्ट्स एसोशिएशन (मूसा) के नेता मुस्लिम बहुल गाँवों का लगातार दौरा करते रहे और उन्हें हिन्दुओं पर हमला करने के लिए निर्देशित करते रहे तथा हथियार उपलब्ध कराते दिखे।

दर्रांग जिले में जलाए गए हिन्दुओं के घरों पर मारीगाँव से नाव द्वारा ब्रह्मपुत्र पार करके आए मुस्लिमों द्वारा कब्जा जमा लेने की भी खबर है। सूत्रों के अनुसार उदालगिरी, दर्रांग और बक्सा जिलों के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में रमजान के दौरान ही गुप्त बैठकें हुईं। कट्टरपंथियों को इससे भी संबल मिला कि बदरुद्दीन अजमल द्वारा गठित असम यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के विधायक रसूल हक बहादुर तथा आमसू के अध्यक्ष अब्दुल अजीज ने निचले असम में अलग स्वायत्तशासी क्षेत्र की माँग की है और वहाँ से सभी असमिया लोगों को चले जाने की धमकी दी है।

इस संबंध में असम के एक वरिष्ठ पत्रकार, जो कि हिंसाग्रस्त क्षेत्रों का दौरा करके लौटे हैं, ने बताया कि 14 सितम्बर को आमसू द्वारा आहूत असम बंद के दौरान राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-58 पर स्थित रौटा (उदालगिरी) कस्बे में जबरन दुकानें बंद करने की कोशिश की गई। इस दौरान हुई झड़प में बोडो समुदाय के दो युवक मारे गए।

तभी से पूरे क्षेत्र में तनाव चला आ रहा था, लेकिन राज्य सरकार और जिला प्रशासन ने घोर लापरवाही बरती, जिसके कारण यह आग इतनी तेजी से भड़की। यह भी समझना होगा कि उदालगिरी एक नया बना जिला है, जो अति संवेदनशील है, क्योंकि यह सीमावर्ती राज्य है, जिसकी सीमाएँ भूटान और अरुणाचल प्रदेश से सटी हुई हैं।

इस संवेदनशील जिले को सिर्फ एक उपायुक्त (डीसी), एक अतिरिक्त उपायुक्त (एडीसी) एवं एक क्षेत्राधिकारी (सीओ) के भरोसे छोड़ रखा है। दो प्रखण्ड (सबडिवीजन) होने के बावजूद वहाँ किसी उप जिलाधिकारी (एसडीएम) की नियुक्ति नहीं की गई। एक संवदेनशील जिले में राज्य सरकार द्वारा इतना लचर प्रशासन रखने का क्या औचित्य है, यह समझ से परे है।
सूत्रों के अनुसार जब उदालगिरी जिला नहीं बना था तब इस विस्तृत दर्रांग जिले में ही 1962 में चीनी आक्रमण के समय पाकिस्तानी झण्डे मिले थे। 1965 और 1971 में पाकिस्तान से युद्ध के दौरान पाकिस्तानी झण्डे यहाँ लहराए गए थे और 1983 में दंगों के दौरान भी, इसलिए अब फिर पाकिस्तानी झण्डे फहाराने पर आश्चर्य नहीं।

...लेकिन बांग्‍लादेशी या कहें पूर्वी पाकिस्तानी आतंकवादियों की संख्या इतनी बढ़ गई है कि वे खुलेआम 'पाकिस्तान जिंदाबाद' के नारे लगाने के साथ हिंसक आक्रमण कर रहे हैं। न हिंसक वारदातों के बाद असम के अन्य वरिष्ठ पत्रकार ने भी अपनी रपट में लिखा कि जो बांग्‍लादेशी मुसलमान मारे गए हैं, उनमें से अधिकांश पुलिस फायरिंग में मरे, क्योंकि वे सुरक्षा बलों पर हमला कर रहे थे।

मुसलमानों को जान-माल की कम हानि हुई है, लेकिन इसके बावजूद वे जानबूझकर बड़ी संख्या में राहत शिविरों में भाग आए, ताकि सरकार से मिलने वाली राहत सामग्री ले सकें। केन्द्र और राज्य सरकार को भी यही दिखाई दे रहा है और वह बांग्लादेशी घुसपैठियों को 'अल्पसंख्यकों पर अत्याचार' के रूप में प्रचारित कर रही है। बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ असम, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश में छात्र संगठनों द्वारा चलाए जा रहे आंदोलन के कारण पाकिस्तानी गुप्तचर संस्था (आईएसआई) के इशारे पर ये हिंसक वारदातें हुई हैं, लेकिन घुसपैठियों को असमिया मुसलमान बताकर कांग्रेस अपना वोट बैंक बचा रही है।

ये सारी कोशिश इसलिए चल रही है कि बोडो, संथाल, गारो तथा खासी जनजातियों को उनके गाँवों से भगाकर वहाँ बांग्‍लादेशी मुसलमानों को बसाया जा सके। हम देख रहे हैं कि बांग्‍लादेशी मुस्लिम गाँवों की सुरक्षा के लिए पुलिस तैनात है पर असमिया लोगों के गाँवों की सुरक्षा के कोई उपाय नहीं किए गए हैं। सरकार कह रही है कि शरणार्थी शिविरों में लगभग 2 लाख मुस्लिम हैं। आखिर ये कहाँ से आए हैं? इनकी पहचान की जाए और जो असमिया मुस्लिम हैं, उन्हें वापस उनके घरों में भेजकर बाकी सब को बांग्लादेश में वापस भेज दिया जाए।

दरअसल घुसपैठ को सही मायने में देखा जाए तो यह कांग्रेस सरकार के वोटबैंक की गलत नीतियों व उसकी धूर्तता का ही दुष्परिणाम है कि बांग्लादेशी घुसपैठियों की असंवैधानिक तौर पर आज भी घुसपैठ जारी है। सत्तारूढ़ सरकार ने वोट बैंक पॉलिसी के मद्देनजर ऐसी नीतियाँ व कानून बनाए, जिसके चलते बांग्लादेशी घुसपैठियों का निकालना असंभव हो गया।

माननीय उच्चतम न्यायालय ने 15 जुलाई 2005 में अवैध घुसपैठ से जुड़ी आईएमडीटी एक्ट को असंवैधानिक ठहराया। लेकिन केन्द्र के सर पर जूँ तक नहीं रेंगी। उसने वोट बैंक की चिंता करते हुए फॉरनर्स एक्ट में ऐसे बदलाव किए, जिससे उसमें आईएमडीटी एक्ट की सारी चीजें आ गईं। जिससे यह स्पष्ट हो गया कि वर्तमान की केन्द्र सरकार वोट के लिए देश के भविष्य को भी दाँव पर लगा सकती है।

घुसपैठ को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट नें दिसम्बर 2006 के फैसले में कहा कि फॉरनर्स एक्ट के तहत नई व्यवस्था चार महीने के भीतर बनाई जाए पर कांग्रेस सरकार सब कुछ जानते हुए भी स्थिति से बिलकुल अनजान बनी हुई है।

घुसपैठ को सही मायने में देखा जाए तो यह कांग्रेस सरकार के वोटबैंक की गलत नीतियों व उसकी धूर्तता का ही दुष्परिणाम है कि बांग्लादेशी घुसपैठियों की असंवैधानिक तौर पर आज भी घुसपैठ जारी है।
उल्फा विदेशों में बैठे अपने आकाओं के आदेशानुसार असम में बांग्लादेशी मुसलमानों को बढ़ाने के साथ-साथ उसे विस्तारित करने की रणनीति को बड़े साफगोई से अंजाम दे रही है। इसमें बांग्लादेश की सोची-समझी चाल काम कर रही है। उसके इस चाल में हिन्दी भाषियों, गरीबों और मजदूरों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है। आज स्थिति यह है कि असम में बांग्लादेशियों की संख्या इतनी ज्यादा हो गई है कि उन पर नियंत्रण करना काफी मुश्किल है।

आज बांग्लादेश के कई कट्टरपंथी जेहादी संगठन असम व पश्चिम बंगाल के कई मुस्लिम बहुल इलाकों को अलग करके बृहत्तर बांग्लादेश की माँग करने की तैयारी में जुटे हैं। जो खूनी खेल आईएसआई ने कश्मीर में खेला, वही आज पूर्वोत्तर भारत में बांग्लादेश की मदद से दोहरा रही है। उल्फा इसका माध्यम बन रही है। पिछले एक दशक से असम के हालात बद से बदतर हो गए हैं। असम की मुस्लिम राजनीति में उफान आना कोई मामूली घटना नहीं है।

मुसलमानों की भलाई का नाटक करने वाली यहाँ असम की मुस्लिम पार्टियों में अधिकांशत: बांग्लादेशी हैं। पहले असम के शहरों में रिक्शा चलाने वाले, रेहड़ी वाले बिहारी मजदूर होते थे किंतु अब उनकी संख्या घटकर मात्र आधी से भी कम रह गई है। उनके द्वारा छोड़े गए कामों पर बांग्लादेशी घुसपैठिए अपना कब्जा चुके हैं। ये घुसपैठिए ठीक तरह से असमी भी नहीं बोल पाते, जिससे यह साफ जाहिर होता होता है कि ये बांग्लादेशी हैं।

दिन-प्रतिदिन भयावह होती असम की स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कठोर निर्णय लेने की जरूरत है। केंद्र सरकार को अपनी तुष्टिकरण और वोट बैंक की नीति को छोड़कर देश हित में फैसला लेने से असम अन्य राज्यों की तरह शांत रह सकता है। वर्ना वो दिन दूर नहीं जब जम्मू-कश्मीर के तरह ही असम भी भारत के लिए ऐसा नासूर बन जाएगा, जिसका दर्द सदियों तक हर भारतवासी को झेलना पड़ेगा।

बुधवार, 29 सितंबर 2010

भारतीयम असल अल्पसंख्यक

तो आप मानते हैं कि समूचा पूर्वांचल हमारा है। चीन अरुणाचल प्रदेश पर दावा करता है तो हम अमान्य करते हैं-वहां का इंच-इंच भारत है, वहां परशुराम कुण्ड है, तवांग है, रुक्मिणी भीष्मक नगर से आयी बताते हैं और इदु मिशिमी जाति तो स्वयं को यादवों का वंशज मानती है। वैसा ही अपना मणिपुर है-वहां की सांस्कृतिक विरासत में हमारा पौराणिक इतिहास छिपा है। मिजोरम, नागालैंड, मेघालय, त्रिपुरा, असम। खबरदार जो किसी ने उस ओर गलत दृष्टि से देखा-नाश्ते पर, पान खाते हुए या यूं ही देशभक्ति का राग-विलास छेड़ते हुए यह सब कहा ही जाता है।

ठीक है। अच्छा है।


पर क्या आप अरुणाचल प्रदेश के अपने किसी भाई या मित्र का नाम बता सकते हैं? क्या कोई जान सकता है कि मणिपुर में मीतेई नाम क्या होते हैं? नागालैंड से शहीद हुए कारगिल-वीर कैप्टन मीकेझाकुओ केंगुरिसे का नाम क्या किसी को वैसे ही याद होगा जैसे हम सामान्यतः अब्दुल हमीद या बाना सिंह का नाम याद रखते हैं? वहां के श्रेष्ठ सुरम्य शहर और दर्शनीय स्थल कौन से हैं? सच तो यह है कि हमारा हिन्दुस्तान उत्तर में अमरनाथ और पूर्वोत्तर में कोलकाता, या ज्यादा से ज्यादा कामाख्या तक ही सीमित है। हम सिर्फ उसी से सरोकार रखते हैं जो हमारे जैसा हो, हमारी भाषा, जात, पहनावे से साम्यता रखता हो। मणिपुर, अरुणाचल या मिजोरम के प्रति जो भी देशभक्ति का राग अलापा जाता है उसकी कलई तब खुल जाती है जब उनके चेहरे दिल्ली में देखकर हम बड़े सहज भाव से पूछते हैं- यू आर फ्राम चाइना?


जो भाव हम दलितों के प्रति दिखाते हैं-अपना कहेंगे, पर अपना मानेंगे नहीं, वही पूर्वोत्तर के बारे में है। कुछ समय पहले दिल्ली के एक विचारवान, संस्कृतिनिष्ठ पुलिस कमिश्नर ने पूर्वोत्तर की युवतियों को सही चालचलन और पहनावे के लिए बाकायदा चार पन्ने का पैम्पलेट निकाला था जिसमें बताया था कि वे कितने इंच के कपड़े पहनें, बाहें कितनी खुली रखें और कितनी ढकी हुई। इसकी वजह क्या थी? ऐसा इश्तहार कभी हरियाणा, पंजाब या यूपी की युवतियों के लिए तो नहीं निकाला। क्योंकि वे ‘हमारे जैसी हैं।’ अत्यंत पर्दानशीं, भारतीय मूल्यों के प्रति जान देने वालीं। ये पूर्वोत्तर की युवतियां ‘अवेलेबल’ मानी जाती है-इन्हें सिखाओ।


पिछले एक महीने से मणिपुर शेष भारत से कटा हुआ है। वहां नगा और मीतेई समाज में युद्ध जैसी स्थिति है। स्थानीय स्वायत्तशासी जनपदों को अधिक सत्ता-सम्पन्न बनाने की मांग लेकर मणिपुर को जोड़ने वाले दोनों राजमार्ग बंद कर दिए गए-16 अप्रैल से खाने-पीने की सारी आपूर्ति बंद। हम वहां 13 मई को गए थे। बसों, स्कूटरों और कारों की 5-5 किलोमीटर लम्बी लाइनें पेट्रोलपम्पों पर देखीं। पेट्रोल डीजल का राशन प्रति बड़ा वाहन 40 लीटर- वह भी दो दिन में। एक दिन तो पूरा लगता ही है तेल भरवाने के लिए। बाजार 6 बजे सन्नाटा ओढ़ लेता है। फिल्म का आखिरी शो 4 बजे का है। स्कूल, कालेज, पांच दिन खुलते है, तो पन्द्रह दिन बन्द। एक शहर से दूसरे शहर जाना मुश्किल-किराए अचानक दो-तीन गुने हो गए। हमारे टैक्सी वाले ने बताया कि वह 100 रुपये लीटर का डीजल ब्लैक में खरीदकर आया है। उस पर 16 जनवरी से सरकारी कर्मचारियों ने ‘पेनडाउन’ हड़ताल की हुई है। दफ्तर आते हैं।, काम नहीं करते-वेतन वृद्धि चाहिए। मुख्यमंत्री इबोबी सिंह उनसे मिलकर कोई समाधान निकालने को तैयार नहीं है। एक तो रास्ते बंद, उस पर सरकारी कर्मचारी हड़ताल पर। ऐसे में अलगाववादी विद्रोही संगठनों का खुलकर राज चल रहा है। उन्होंने (यानी जो प्रमुख संगठ है पीपुल्स लिब्रेशन आर्मी-पी.एल.ए.) गैर मणिपुरी नागरिकों को 31 मई तक मणिपुर से चले जाने का आदेश दिया है।

गैर मणिपुरी का अर्थ वही है जो राज ठाकरे की सल्तनत में गैरमराठियों का है। बिहार, यूपी, पंजाब, राजस्थान वाले। उनकी निगाह में ये सब शोषक हैं-मजदूर, अध्यापक, कुली, छात्र या दुकानदार होंगे। पर पीएलए के ‘फतवे’ में कहा गया कि इन्हें हम अपना नहीं मानते। गेट आउट। इन गैर मणिपुरी भारतीयों के संगठन का नाम है-‘हिन्दुस्तानी समाज।’ वाह, देखिए विधाता की अपार विडम्बना। ‘हिन्दुस्तानी समाज’ मणिपुर में अल्पसंख्यक है। डरा हुआ है। दहशत उनके चेहरों पर अंकित है। कमरे में आकर भी फुसफुसाहट भरे स्वर में अपनी वेदना कहते हैं। परिवार हैं, बच्चे हैं, 40-50-70 सालों से यहां रह रहे हैं। यहीं जन्मे हैं, यहां की भाषा बोलते हैं, फिर भी हमें यहां से चले जाने को कहा जा रहा है। प्रधानमंत्री को ज्ञापन भेजा, गृहमंत्री को भेजा, मुख्यमन्त्री से कहा, पुलिस आई.जी. को लिखा। किसी से कोई जवाब नहीं। पुलिस के अधिकारी कहते हैं-एक साथ मिलकर रहने लगे तो शायद बच जाओगे। या कुछ एकाध महीने घर-गांव चले जाओ। सुरक्षा की कोई बात नहीं करता। कोई यह नहीं कहता कि फिक्र क्यों कर रहे हो, तुम हिन्दुस्तानी हो, हिन्दुस्तान में ही रह रहे हो, फिर क्यों भगाए जाओगे?


ये ‘हिन्दुस्तानी समाज’ वाले जानते हैं कि जब कश्मीरी हिन्दुओं को भगाया गया और उनके घरों पर इश्तहार चिपकाए गये कि ‘पंडितो, अपनी स्त्रियां यहां छोड़ जाओ और तुम भाग जाओ’ तो उन्हें किसी दिल्ली वाले वीर ने नहीं बचाया था। संसद की चीखपुकार किसी और के लिए किसी और मसले के लिए होती है। ये नेता लोग जितनी ऊर्जा और बुद्धिमत्ता एक दूसरे को गिराने, जलाने और आपसी ईर्ष्या के मामले निबटाने में खर्च करते है, उसका सहस्त्रांश भी वे उनके लिए नहीं कर पाते जो मणिपुरी या कश्मीरी जैसे होते हैं।


दिल्ली से इम्फाल जाते हुए विमान में मेरे साथ एक 20 साल का लड़का भी था-थापुन। वह सेना में भर्ती हुआ है। सालभर ट्रेनिंग के बाद घर में बीमार मां देखने जा रहा था। कर्ज लिया-तब विमान का टिकट खरीदा। सड़क मार्ग तो एक माह से बंद है। बोला ‘यूजी’ (अन्डर ग्राउण्ड आतंकवादी) का बहुत दबदबा है। उन्हीं का राज है। सरकारी कर्मचारियों को भी अपने वेतन का एक हिस्सा 2 से 5 प्रतिशत हर माह देना पड़ता है। हिन्दुस्तान की कोई बात वहां चलती नहीं, सिवाय फौज के। हिन्दी फिल्में तो पिछले दस साल से प्रतिबंधित हैं। अब विडियो कैमरे से मणिपुरी फिल्में बनती हैं, उन्हीं को थियेटरों में दिखाते हैं।


आम आदमी कैसे जी रहा होगा मणिपुर में ?


पूर्वांचल का देशभक्त समाज सोचने लगा है कि दिल्ली के नेता-उनके प्रति संवेदनहीन हैं। उन्हें पूर्वांचल से उतना ही सरोकार है जहां तक उन्हें वहां से पैसा मिलता रहे। पूर्वांचल की भ्रष्ट राजनीति और अकर्मण्य प्रशासन के पीछे दिल्ली के भ्रष्ट नेताओं का हाथ है। वहां की वेदना के साथ हमने कभी खुद को जोड़ा नहीं। जिस मणिपुर में 16 जनवरी से सरकारी दफ्तर ‘बेकाम’ हों, जहां एक महीने से राजमार्ग बंद हों वहां के बारे में दिल्ली के महान नेताओं की नींद क्या कभी उड़ी? दिल्ली का अहंकार और गलीज राजनीति पूर्वोत्तर गंवा बैठेगी।


वे सोचते हैं, अब दिल्ली से कुछ समाधान नहीं निकलेगा, तो चीन या बर्मा में आत्मीयता खोजी जाए। जिस क्षेत्र में बच्चे स्कूल न जा रहे हों, घर में सब्जी न आ पाए, एमरजैंसी में बाहर निकलना असंभव हो, अस्पतालों में आक्सीजन के सिलेंडर नहीं, डॉक्टर दवा के अभाव में मरीज न देख पाएं, जहां ‘हिन्दुस्तानी’ होने का अर्थ हो अपमान तथा ‘प्रदेश निकाला’ और फिर भी दिल्ली के अखबार तथा साउथ और नार्थ ब्लाक के नियंता मुहल्ला किस्म की राजनीति में व्याप्त हों, वहां सवाल तो यह उठेगा ही कि आखिर मणिपुर क्योंकर भारत में रहे? वह पृथकता की मांग करे तो क्या इसे आश्चर्यजनक मानेंगे?


समूचा पूर्वोत्तर इस उपेक्षा का शिकार है। असम में तो 50 से अधिक विधानसभा क्षेत्र बंगलादेशी घुसपैठियों के बहुमत वाले हो गए हैं। वहां देशभक्त भारतीय डरे-डरे से रहते हैं और बंगलादेशी हमारी जमीन पर हमसे ही गुर्राते हैं क्योंकि उन्हें पता है दिल्ली के सेकुलर पत्रकार और नेता उनके सबे बड़े रक्षा कवच हैं। असम से राज्यसभा में जो राष्ट्रीय नेता चुनकर भेजे गये उनका नाम है डॉ. मनमोहन सिंह। वे प्रधानमंत्री भी हैं। असम के सेंटीनल अखबार के कल (14 मई) के सम्पादकीय में लिखा कि डॉ. मनमोहन सिंह संसद में असम का प्रतिनिधित्व करते हैं, क्या उन्होंने एक बार भी संसद में बंगलादेशी घुसपैठियों के मुद्दे को उठाया?


विदेशी घुसपैठिए आकर हमारी जमीन पर बस आए और मंत्री बन जाएं, लेकिन आम भारतीय को नागालैण्ड, अरुणाचल जाने के लिए इनरलाइन परमिट लेने के लिए बाध्य होना पड़े तो यह कैसा मजाक है? महाराष्ट्र हो या मणिपुर या कश्मीर हर जगह हिन्दुस्तानी अल्पसंख्यक हो गया है। हिन्दुस्तानी होने के अलावा आप जो कुछ भी हों, जात, मजहब, प्रान्त, भाषा की पहचान वाले, वह ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। अल्पसंख्यक मुसलमान नहीं, वे हैं जो अपनी पहचान सिर्फ हिन्दुस्तानी बताना चाहते हैं।