शनिवार, 23 अक्टूबर 2010

मुस्लिम सांसदों के दबाव में शत्रु संपत्ति (संसोधन एवं विधिमान्यकरण) विधेयक-2010 में संसोधन स्वीकृत

इस देश की राजनीति में घुन लग गया है। राष्ट्रहित उसने खूंटी से टांग दिए हैं। इस देश की सरकार सत्ता प्राप्त करने के लिए कुछ भी कर सकती है। अधिक समय नहीं बीता था जब केन्द्र सरकार ने कश्मीर के पत्थरबाजों और देशद्रोहियों को करोड़ों का पैकेज जारी किया। वहीं वर्षों से टेंट में जिन्दगी बर्बाद कर रहे कश्मीरी पंडि़तों के हित की चिंता आज तक किसी भी सरकार द्वारा नहीं की गई और न की जा रही है। मेरा एक ही सवाल है- क्या कश्मीरी पंडि़त इस देश के नागरिक नहीं है। अगर हैं तो फिर क्यों उनकी बेइज्जती की जाती है। वे शांत है, उनके वोट थोक में नहीं मिलेंगे इसलिए उनके हितों की चिंता किसी को नहीं, तभी उन्हें उनकी जमीन, मकान और स्वाभिमान भरी जिन्दगी नहीं लौटाने के प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। वहीं भारत का राष्ट्रीय ध्वज जलाने वाले, भारतीय सेना और पुलिस पर पत्थर व गोली बरसाने वालों को 100 करोड़ का राहत पैकेज देना, उदार कश्मीरी पंडि़तों के मुंह पर तमाचा है। इतने पर ही सरकार नहीं रुक रही है। इस देश का सत्यानाश करने के लिए बहुत आगे तक उसके कदम बढ़ते जा रहे हैं।

एक पक्ष को तुष्ट करने के लिए सरकार कहां तक गिर सकती है उसका हालिया उदाहरण है शत्रु संपत्ति विधेयक-2010 का विरोध करना फिर उसमें मुस्लिम नेताओं के मनमाफिक संसोधन को केन्द्रीय कैबिनेट द्वारा स्वीकृति देना। कठपुतली (पपेट) प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में बुधवार को केंद्रीय कैबिनेट की बैठक आयोजित की गई थी। इसमें इसी बैठक में केंद्रीय गृह मंत्रालय के प्रस्ताव पर शत्रु संपत्ति (संसोधन एवं विधिमान्यकरण) विधेयक-2010 में संसोधन को स्वीकृति प्रदान की गई। भारत सरकार द्वारा वर्ष 1968 में पाकिस्तान गए लोगों की संपत्ति को शत्रु संपत्ति घोषित किया गया था, इस संपत्ति पर अब भारत में रह रहे पाकिस्तान गए लोगों के कथित परिजन कब्जा पा सकेंगे। जबकि पाकिस्तान गए सभी लोगों को उनकी जमीन व भवनों का मुआवजा दिया जा चुका है। उसके बाद कैसे और क्यों ये कथित परिजन उस संपत्ति पर दावा कर सकते हैं और उसे प्राप्त कर सकते हैं।

दरअसल पाकिस्तान गए लोगों की सम्पत्ति को प्राप्त करने के लिए पहले से ही उनके कथित परिजनों द्वारा प्रयास किया जा रहा है, क्योंकि 1968 में लागू शत्रु संपत्ति अधिनियम में कुछ खामी थी। उत्तरप्रदेश में यह प्रयास बड़े स्तर पर किए जा रहे हैं। 2005 तक ही न्यायालय में 600 मामलों की सुनवाई हो चुकी है और न्यायालय ने उन्हें वांछित शत्रु संपत्ति पर कब्जा देने के निर्देश दिए हैं। शत्रु संपत्ति हथियाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में 250 और मुम्बई उच्च न्यायालय में 500 के करीब मुकदमे लंबित हैं। मैं यहां कथित परिजन का प्रयोग कर रहा हूं, उसके पीछे कारण हैं। समय-समय पर इस बात की पुष्टि हो रही है कि बड़ी संख्या में पाकिस्तानी और बांग्लादेशी मुसलमान भारत के विभिन्न राज्यों में आकर बस जाते हैं। कुछ दिन यहां रहने के बाद सत्ता लोलुप राजनेताओं और दलालों के सहयोग से ये लोग राशन कार्ड बनवा लेते हैं, मतदाता सूची में नाम जुड़वा लेते हैं। फिर कहते हैं कि वे तो सन् 1947 से पहले से यहीं रह रहे हैं।

शत्रु संपत्ति अधिनियम-1968 की खामियों को दूर करने और कथित परिजनों को शत्रु संपत्ति को प्राप्त करने से रोकने के लिए गृह राज्यमंत्री अजय माकन ने 2 अगस्त को लोकसभा में शत्रु संपत्ति (संसोधन एवं विधिमान्यकरण) विधेयक-2010 प्रस्तुत किया गया था। इस विधेयक के प्रस्तुत होने पर अधिकांशत: सभी दलों के मुस्लिम नेता एकजुट हो गए। उन्होंने विधेयक में संसोधन के लिए पपेट पीएम मनमोहन सिंह और इटेलियन मैम सोनिया गांधी पर दबाव बनाया। दस जनपथ के खासमखास अहमद पटेल, अल्पसंख्यक मंत्रालय के मंत्री सलमान खुर्शीद, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद के नेतृत्व में मुस्लिम सांसदों ने प्रधानमंत्री से मिलकर उनके कान में मंत्र फंूका कि यह विधेयक मुस्लिम विरोधी है। अगर यह मंजूर हो गया तो कांग्रेस के माथे पर मुस्लिम विरोधी होने का कलंक लग जाएगा और कांग्रेस थोक में मिलने वाले मुस्लिम वोटों से हाथ धो बैठेगा। यह बात मनमोहन सिंह को जम गई। परिणाम स्वरूप विधेयक में संसोधन कर दिया गया और उसे पाकिस्तान गए मुसलमानों के कथित परिजनों के मुफीद बना दिया गया। जिस पर बुधवार को पपेट प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई केन्द्रीय कैबिनेट की बैठक में मुहर लगा दी गई। अब स्थित अराजक हो सकती है सरकार से उन सभी ऐतिहासिक और बेशकीमती भवनों व जमीन को ये कथित परिजन छीन सकते हैं, जो अभी तक शत्रु संपत्ति थी। जबकि इनका मुआवजा पाकिस्तान गए मुसलमान पहले ही अपने साथ भारत सरकार से थैले में भर-भरकर ले जा चुके हैं।

एक विडियो : क्‍या ये जनाब बात करने लायक है ?

क्या आपने सैयद अली शाह गिलानी का नाम सुना है ?
हाँ ! वो ही कश्मीर अवाम के महान नेता ….
गत माह केन्द्रीय प्रतिनिधिमंडल ने जिनके घर जाकर कश्मीर के साथ हो रहे अन्याय के लिये अफ़सोस जाहिर किया था…


कृपया ३ मिनट निकालकर इनका यह एक विडियो देखिये,

http://www.youtube.com/watch?v=KNF1xNml9ZE&feature=player_embedded#!

http://www.youtube.com/watch?v=PLkE92TpRTE&feature=related

विदेशी पैसों पर पल रहे सेकुलर-वामपंथी बुद्धिजीवियों का एक और प्रपंच :- “कारवाँ टू फ़िलीस्तीन”…

जैसा कि अब सभी जान चुके हैं, भारत में सेकुलरों और मानवाधिकारवादियों की एक विशिष्ट जमात है, जिन्हें मुस्लिमों का विरोध करने वाला व्यक्ति अथवा देश हमेशा से “साम्प्रदायिक” और “फ़ासीवादी” नज़र आते हैं, जबकि इन्हीं सेकुलरों को सभी आतंकवादी “मानवता के मसीहा” और “मासूमियत के पुतले नज़र आते हैं। कुछ ऐसे ही ढोंगी और नकली सेकुलरों द्वारा इज़राइल की गाज़ा पट्टी नीतियों के खिलाफ़ भारत से फ़िलीस्तीन तक रैली निकालने की योजना है। 17 एशियाई देशों के “जमूरे” दिसम्बर 2010 में फ़िलीस्तीन की गाज़ा पट्टी में एकत्रित होंगे।
इज़राइल के ज़ुल्मों(?) से त्रस्त और अमेरिका के पक्षपात(?) से ग्रस्त “मासूम” फ़िलीस्तीनियों के साथ एकजुटता दिखाने के लिये इस कारवां का आयोजन रखा गया है। गाज़ा पट्टी में इज़राइल ने जो नाकेबन्दी कर रखी है, उसके विरोध में यह लोग 2 दिसम्बर से 26 दिसम्बर तक भारत, पाकिस्तान, ईरान, जोर्डन, सीरिया, लेबनान और तुर्की होते हुए गाज़ा पट्टी पहुँचेंगे औरइज़राइल का विरोध करेंगे। इस दौरान ये सभी लोग प्रेस कांफ़्रेंस करेंगे, विभिन्न राजनैतिक व्यक्तित्वों से मिलेंगे, रोड शो करेंगे और भी तमाम नौटंकियाँ करेंगे…
इस “कारवाँ टू फ़िलीस्तीन”कार्यक्रम को अब तक भारत से 51 संगठनों और कुछ “छँटे हुए” सेकुलरों का समर्थन हासिल हो चुका है जो इनके साथ जायेंगे। इनकी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि ये लोग सताये हुए फ़िलीस्तीनियों के लिये नैतिक समर्थन के साथ-साथ, आर्थिक, कूटनीतिक और “सैनिक”(?) समर्थन के लिये प्रयास करेंगे। हालांकि फ़िलहाल इन्होंने अपने कारवां के अन्तिम चरण की घोषणा नहीं की है कि ये किस बन्दरगाह से गाज़ा की ओर कूच करेंगे, क्योंकि इन्हें आशंका है कि इज़राइल उन्हें वहीं पर जबरन रोक सकता है। इज़राइल ने फ़िलीस्तीन में जिस प्रकार का “जातीय सफ़ाया अभियान” चला रखा है उसे देखते हुए स्थिति बहुत नाज़ुक है… (“जातीय सफ़ाया”, यह शब्द सेकुलरों को बहुत प्रिय है, लेकिन सिर्फ़ मासूम मुस्लिमों के लिये, यह शब्द कश्मीर, पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि में हिन्दुओं के लिये उपयोग करना वर्जित है)। एक अन्य सेकुलर गौतम मोदी कहते हैं कि “इस अभियान के लिये पैसों का प्रबन्ध कोई बड़ी समस्या नहीं है…” (होगी भी कैसे, जब खाड़ी से और मानवाधिकार संगठनों से भारी पैसा मिला हो)। आगे कहते हैं, “इस गाज़ा कारवां में प्रति व्यक्ति 40,000 रुपये खर्च आयेगा” और जो विभिन्न संगठन इस कारवां को “प्रायोजित” कर रहे हैं वे यह खर्च उठायेंगे… (सेकुलरिज़्म की तरह का एक और सफ़ेद झूठ… लगभग एक माह का समय और 5-6 देशों से गुज़रने वाले कारवां में प्रति व्यक्ति खर्च सिर्फ़ 40,000 ???)। कुछ ऐसे ही “अज्ञात विदेशी प्रायोजक” अरुंधती रॉय और गिलानी जैसे देशद्रोहियों की प्रेस कांफ़्रेंस दिल्ली में करवाते हैं, और “अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता”(?) के नाम पर भारत जैसे पिलपिले नेताओं से भरे देश में सरेआम केन्द्र सरकार को चाँटे मारकर चलते बनते हैं। वामपंथ और कट्टर इस्लाम हाथ में हाथ मिलाकर चल रहे हैं यह बात अब तेजी से उजागर होती जा रही है। वह तो भला हो कुछ वीर पुरुषों का, जो कभी संसद हमले के आरोपी जिलानी के मुँह पर थूकते हैं और कभी गिलानी पर जूता फ़ेंकते हैं, वरना अधिसंख्य हिन्दू तो कब के “गाँधीवादी नपुंसकता” के शिकार हो चुके हैं।

कारवाँ-ए-फ़िलीस्तीन के समर्थक, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य मौलाना अब्दुल वहाब खिलजी कहते हैं कि “भारत के लोग फ़िलीस्तीन की आज़ादी के पक्ष में हैं और उनके संघर्ष के साथ हैं…” (इन मौलाना साहब की हिम्मत नहीं है कि कश्मीर जाकर अब्दुल गनी लोन और यासीन मलिक से कह सकें कि पंडितों को ससम्मान वापस बुलाओ और उनका जो माल लूटा है उसे वापस करो, अलगाववादी राग अलापना बन्द करो)। फ़िलीस्तीन जा रहे पाखण्डी कारवां में से एक की भी हिम्मत नहीं है कि पाकिस्तान के कबीलाई इलाके में जाकर वहाँ दर-दर की ठोकरें खा रहे प्रताड़ित हिन्दुओं के पक्ष में बोलें। सिमी के शाहनवाज़ अली रेहान और “सामाजिक कार्यकर्ता”(?) संदीप पाण्डे ने इस कारवां को अपना नैतिक समर्थन दिया है, ये दोनों ही बांग्लादेश और मलेशिया जाकर यह कहने का जिगर नहीं रखते कि “वहाँ हिन्दुओं पर जो अत्याचार हो रहा है उसे बन्द करो…”।

“गाज़ा कारवां” चलाने वाले फ़र्जी लोग इस बात से परेशान हैं कि रक्षा क्षेत्र में भारत की इज़राइल से नज़दीकियाँ क्यों बढ़ रही हैं (क्या ये चाहते हैं कि हम चीन पर निर्भर हों? या फ़िर सऊदी अरब जैसे देशों से मित्रता बढ़ायें जो खुद अपनी रक्षा अमेरिकी सेनाओं से करवाता है?)। 26/11 हमले के बाद ताज समूह ने अपने सुरक्षाकर्मियों को प्रशिक्षण के लिये इज़राइल भेजा, तो सेकुलर्स दुखी हो जाते हैं, भारत ने इज़राइल से आधुनिक विमान खरीद लिये, तो सेकुलर्स कपड़े फ़ाड़ने लगते हैं। मुस्लिम पोलिटिकल काउंसिल के डॉ तसलीम रहमानी ने कहा – “हमें फ़िलीस्तीनियों के प्रति अपना समर्थन व्यक्त करना चाहिये और उनके साथ खड़े होना चाहिये…” (यानी भारत की तमाम समस्याएं खत्म हो चुकी हैं… चलो विदेश में टाँग अड़ाई जाये?)।

गाज़ा कारवां के “झुण्ड” मे कई सेकुलर हस्तियाँ और संगठन शामिल हैं जिनमें से कुछ नाम बड़े दिलचस्प हैं जैसे -

“अमन भारत”

“आशा फ़ाउण्डेशन”

“अयोध्या की आवाज़”(इनका फ़िलीस्तीन में क्या काम?)

“बांग्ला मानवाधिकार मंच” (पश्चिम बंगाल में मानवाधिकार हनन नहीं होता क्या? जो फ़िलीस्तीन जा रहे हो…)

“छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा” (नक्सली समस्या खत्म हो गई क्या?)

“इंडियन फ़ेडरेशन ऑफ़ ट्रेड यूनियन” (मजदूरों के लिये लड़ने वाले फ़िलीस्तीन में काहे टाँग फ़ँसा रहे हैं?)

“जमीयत-उलेमा-ए-हिन्द” (हाँ… ये तो जायेंगे ही)

“तीसरा स्वाधीनता आंदोलन” (फ़िलीस्तीन में जाकर?)

“ऑल इंडिया मजलिस-ए-मुशवारत” (हाँ… ये भी जरुर जायेंगे)।

अब कुछ “छँटे हुए” लोगों के नाम भी देख लीजिये जो इस कारवां में शामिल हैं -

आनन्द पटवर्धन, एहतिशाम अंसारी, जावेद नकवी, सन्दीप पाण्डे (इनमें से कोई भी सज्जन गोधरा ट्रेन हादसे के बाद कारवां लेकर गुजरात नहीं गया)

सईदा हमीद, थॉमस मैथ्यू (जब ईसाई प्रोफ़ेसर का हाथ कट्टर मुस्लिमों द्वारा काटा गया, तब ये सज्जन कारवां लेकर केरल नहीं गये)

शबनम हाशमी, शाहिद सिद्दीकी (धर्मान्तरण के विरुद्ध जंगलों में काम कर रहे वयोवृद्ध स्वामी लक्ष्मणानन्द सरस्वती की हत्या होने पर भी ये साहब लोग कारवाँ लेकर उड़ीसा नहीं गये)… कश्मीर तो खैर इनमें से कोई भी जाने वाला नहीं है… लेकिन ये सभी फ़िलीस्तीन जरुर जायेंगे।

तात्पर्य यह है कि अपने “असली मालिकों” को खुश करने के लिये सेकुलरों की यह गैंग, जिसने कभी भी विश्व भर में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार और जातीय सफ़ाये के खिलाफ़ कभी आवाज़ नहीं उठाई… अब फ़िलीस्तीन के प्रति भाईचारा दिखाने को बेताब हो उठा है।इन्हीं के “भाईबन्द” दिल्ली-लाहौर के बीच “अमन की आशा” जैसा फ़ूहड़ कार्यक्रम चलाते हैं जबकि पाकिस्तान के सत्ता संस्थान और आतंकवादियों के बीच खुल्लमखुल्ला साँठगाँठ चलती है…। कश्मीर समस्या पर बात करने के लिये पहले मंत्रिमण्डल का समूह गिलानी के सामने गिड़गिड़ाकर आया था परन्तु उससे मन नहीं भरा, तो अब तीन विशेषज्ञों(?) को बात करने(?) भेज रहे हैं, लेकिन पिलपिले हो चुके किसी भी नेता में दो टूक पूछने / कहने की हिम्मत नहीं है कि “भारत के साथ नहीं रहना हो तो भाड़ में जाओ… कश्मीर तो हमारा ही रहेगा चाहे जो कर लो…”।

(सिर्फ़ हिन्दुओं को) उपदेश बघारने में सेकुलर लोग हमेशा आगे-आगे रहे हैं, खुद की फ़टी हुई चड्डी सिलने की बजाय, दूसरे की धोने में सेकुलरों को ज्यादा मजा आता है…और इसे वे अपनी शान भी समझते हैं। कारवाँ-ए-फ़िलीस्तीन भी कुछ-कुछ ऐसी ही “फ़ोकटिया कवायद” है, इस कारवाँ के जरिये कुछ लोग अपनी औकात बढ़ा-चढ़ाकर बताने लगेंगे, कुछ लोग सरकार और मुस्लिमों की “गुड-बुक” में आने की कोशिश करेंगे, तो कुछ लोग एकाध अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार की जुगाड़ में लग जायेंगे… न तो फ़िलीस्तीन में कुछ बदलेगा, न ही कश्मीर में…। ये फ़र्जी कारवाँ वाले, इज़राइल का तो कुछ उखाड़ ही नहीं पायेंगे, जबकि गिलानी-मलिक-शब्बीर-लोन को समझाने कभी जायेंगे नहीं… मतलब “फ़ोकटिया-फ़ुरसती” ही हुए ना?

गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010

धर्मनिरपेक्षता की जय ?

क्या आप धर्मनिरपेक्ष हैं ? जरा फ़िर सोचिये और स्वयं के लिये इन प्रश्नों के उत्तर खोजिये.....
१. विश्व में लगभग ५२ मुस्लिम देश हैं, एक मुस्लिम देश का नाम बताईये जो हज के लिये "सब्सिडी" देता हो ?
२. एक मुस्लिम देश बताईये जहाँ हिन्दुओं के लिये विशेष कानून हैं, जैसे कि भारत में मुसलमानों के लिये हैं ?
३. किसी एक देश का नाम बताईये, जहाँ ८५% बहुसंख्यकों को "याचना" करनी पडती है, १५% अल्पसंख्यकों को संतुष्ट करने के लिये ?
४. एक मुस्लिम देश का नाम बताईये, जहाँ का राष्ट्रपति या प्रधानमन्त्री गैर-मुस्लिम हो ?
५. किसी "मुल्ला" या "मौलवी" का नाम बताईये, जिसने आतंकवादियों के खिलाफ़ फ़तवा जारी किया हो ?
६. महाराष्ट्र, बिहार, केरल जैसे हिन्दू बहुल राज्यों में मुस्लिम मुख्यमन्त्री हो चुके हैं, क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि मुस्लिम बहुल राज्य "कश्मीर" में कोई हिन्दू मुख्यमन्त्री हो सकता है ?
७. १९४७ में आजादी के दौरान पाकिस्तान में हिन्दू जनसंख्या 24% थी, अब वह घटकर 1% रह गई है, उसी समय तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब आज का अहसानफ़रामोश बांग्लादेश) में हिन्दू जनसंख्या 30% थी जो अब 7% से भी कम हो गई है । क्या हुआ गुमशुदा हिन्दुओं का ? क्या वहाँ (और यहाँ भी) हिन्दुओं के कोई मानवाधिकार हैं ?
८. जबकि इस दौरान भारत में मुस्लिम जनसंख्या 10.4% से बढकर 14.2% हो गई है, क्या वाकई हिन्दू कट्टरवादी हैं ?
९. यदि हिन्दू असहिष्णु हैं तो कैसे हमारे यहाँ मुस्लिम सडकों पर नमाज पढते रहते हैं, लाऊडस्पीकर पर दिन भर चिल्लाते रहते हैं कि "अल्लाह के सिवाय और कोई शक्ति नहीं है" ?
१०. सोमनाथ मन्दिर के जीर्णोद्धार के लिये देश के पैसे का दुरुपयोग नहीं होना चाहिये ऐसा गाँधीजी ने कहा था, लेकिन 1948 में ही दिल्ली की मस्जिदों को सरकारी मदद से बनवाने के लिये उन्होंने नेहरू और पटेल पर दबाव बनाया, क्यों ?
११. कश्मीर, नागालैण्ड, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय आदि में हिन्दू अल्पसंख्यक हैं, क्या उन्हें कोई विशेष सुविधा मिलती है ?
१२. हज करने के लिये सबसिडी मिलती है, जबकि मानसरोवर और अमरनाथ जाने पर टैक्स देना पड़ता है, क्यों ?
१३. मदरसे और क्रिश्चियन स्कूल अपने-अपने स्कूलों में बाईबल और कुरान पढा सकते हैं, तो फ़िर सरस्वती शिशु मन्दिरों में और बाकी स्कूलों में गीता और रामायण क्यों नहीं पढाई जा सकती ?
१४. गोधरा के बाद मीडिया में जो हंगामा बरपा, वैसा हंगामा कश्मीर के चार लाख हिन्दुओं की मौत और पलायन पर क्यों नहीं होता ?
१५. क्या आप मानते हैं - संस्कृत सांप्रदायिक और उर्दू धर्मनिरपेक्ष, मन्दिर साम्प्रदायिक और मस्जिद धर्मनिरपेक्ष, तोगडिया राष्ट्रविरोधी और ईमाम देशभक्त, भाजपा सांप्रदायिक और मुस्लिम लीग धर्मनिरपेक्ष, हिन्दुस्तान कहना सांप्रदायिकता और इटली कहना धर्मनिरपेक्ष ?
१६. अब्दुल रहमान अन्तुले को सिद्धिविनायक मन्दिर का ट्रस्टी बनाया गया था, क्या मुलायम सिंह को हजरत बल दरगाह का ट्रस्टी बनाया जा सकता है ?
१७. एक मुस्लिम राष्ट्रपति, एक सिख प्रधानमन्त्री और एक ईसाई रक्षामन्त्री, क्या किसी और देश में यह सम्भव है, यह सिर्फ़ सम्भव है हिन्दुस्तान में क्योंकि हम हिन्दू हैं और हमें इस बात पर गर्व है, दिक्कत सिर्फ़ तभी होती है जब हिन्दू और हिन्दुत्व को साम्प्रदायिक कहा जाता है ।
स्वामी विवेकानन्द ने कहा था - "हिन्दुत्व कोई धर्म नहीं है, यह एक उत्तम जीवन पद्धति है" । गाँधी के खिलाफ़त आन्दोलन के समर्थन और धारा ३७० पर भी काफ़ी कुछ लिखा जा चुका है और ज्यादा लिखने की जरूरत नहीं है, इसलिये नहीं लिखा, फ़िर भी.....उपरिलिखित विचार किसी राजनैतिक उद्देश्य के लिये नहीं हैं, ये सिर्फ़ ध्यान से चारों तरफ़ देखने पर स्वमेव ही दिमाग में आते हैं और एक सच्चे देशभक्त नागरिक होने के नाते इन पर प्रकाश डालना मेरा कर्तव्य है ।

ममता बैनर्जी का रेल्वे सेकुलरिज़्म और 24 परगना जिले के दंगे… ...

विगत 5 सितम्बर की शाम से पश्चिम बंगाल के उत्तरी चौबीस परगना जिले के अल्पसंख्यक हिन्दू परिवार भय, असुरक्षा और आतंक के साये में रह रहे हैं। ये अल्पसंख्यक हिन्दू परिवार पिछले कुछ वर्षों से इस प्रकार की स्थिति लगातार झेल रहे हैं, लेकिन इस बार की स्थिति अत्यंत गम्भीर है। सन् 2001 की जनगणना के मुताबिक देगंगा ब्लॉक में मुस्लिम जनसंख्या 69% थी (जो अब पता नहीं कितनी बढ़ चुकी होगी)। पश्चिम बंगाल का यह इलाका, बांग्लादेश से बहुत पास पड़ता है। यहाँ जितने हिन्दू परिवार बसे हैं उनमें से अधिकतर या तो बहुत पुराने रहवासी हैं या बांग्लादेश में मुस्लिमों द्वारा किये गये अत्याचार से भागकर यहाँ आ बसे हैं। उत्तरी 24 परगना से वर्तमान में तृणमूल कांग्रेस से हाजी नूर-उल-इस्लाम सांसद है, और तृणमूल कांग्रेस से ही ज्योतिप्रिया मलिक विधायक है। 24 परगना जिले में भारत विभाजन के समय से ही विस्थापित हिन्दुओं को बसाया गया था, लेकिन पिछले 60-65 साल में इस जिले के 8 ब्लॉक में मुस्लिम जनसंख्या 75% से ऊपर, जबकि अन्य में लगभग 40 से 60 प्रतिशत हो चुकी है, जिसमें से अधिकतर बांग्लादेशी हैं और तृणमूल और माकपा के वोटबैंक हैं।




5 तारीख (सितम्बर) को देगंगा के काली मन्दिर के पास खुली ज़मीन, जिस पर दुर्गा पूजा का पंडाल विगत 40 वर्ष से लग रहा है, को लेकर जेहादियों ने आपत्ति उठाना शुरु किया और उस ज़मीन की खुदाई करके एक नहर निकालने की बात करने लगे ताकि पूजा पाण्डाल और गाँव का सम्पर्क टूट जाये जिससे उस ज़मीन पर अवैध कब्जे में आसानी हो, उस वक्त स्थानीय पुलिस ने उस समूह को समझा-बुझाकर वापस भेज दिया। 6 सितम्बर की शाम को इफ़्तार के बाद अचानक एक उग्र भीड़ ने मन्दिर और आसपास की दुकानों पर हमला बोल दिया। (चित्र - खाली पड़ी सरकारी भूमि जहाँ से विवाद शुरु किया गया)


माँ काली की प्रतिमा तोड़ दी गई, कई दुकानों को चुन-चुनकर लूटा गया और धारदार हथियारों से लोगों पर हमला किया गया। चार बसें जलाई गईं और बेराछापा से लेकर कदमगाछी तक की सड़क ब्लॉक कर दी गई। भीड़ बढ़ती ही गई और उसने कार्तिकपुर के शनि मन्दिर और देगंगा की विप्लबी कालोनी के मन्दिरों में भारी तोड़फ़ोड़ की।


देगंगा पुलिस थाने के मुख्य प्रभारी अरुप घोष इस हमले में बुरी तरह घायल हुए और उनके सिर पर चोट तथा हाथों में फ़्रेक्चर हुआ है (चित्र - जलाये गये मकान और हिन्दू संतों की तस्वीरें)। जमकर हुए बेकाबू दंगे में 6 सितम्बर को 25 लोग घायल हुए। 7 सितम्बर को भी जब हालात काबू में नहीं आये तब रैपिड एक्शन फ़ोर्स और सेना के जवानों को लगाना पड़ा, उसमें भी तृणमूल कांग्रेस की नेता रत्ना चौधरी ने पुलिस पर दबाव बनाया कि वह मुस्लिम दंगाईयों पर कोई कठोर कार्रवाई न करे, क्योंकि रमज़ान का महीना चल रहा है, जबकि सांसद हाजी नूर-उल-इस्लाम भीड़ को नियंत्रित करने की बजाय उसे उकसाने में लगा रहा।



बेलियाघाट के बाज़ार में RAF के 6-7 जवानों को दंगाईयों की भीड़ ने एक दुकान में घेर लिया और बाहर से शटर गिराकर पेट्रोल से आग लगाने की कोशिश की, हालांकि अन्य जवानों के वहाँ आने से उनकी जान बच गई (चित्र - सांसद नूरुल इस्लाम)। 7 सितम्बर की शाम तक दंगाई बेलगाम तरीके से लूटपाट, छेड़छाड़ और हमले करते रहे, कुल मिलाकर 245 दुकानें लूटी गईं और 120 से अधिक व्यक्ति घायल हुए। प्रशासन ने आधिकारिक तौर पर माना कि 65 हिन्दू परिवार पूरी तरह बरबाद हो चुके हैं और उन्हें उचित मुआवज़ा दिया जायेगा।

जैसी कि आशंका पहले ही जताई जा रही थी कि बंगाल के आगामी चुनावों को देखते हुए माकपा और तृणमूल कांग्रेस में मुस्लिम वोट बैंक हथियाने की होड़ और तेज़ होगी, और ऐसी घटनाओं में बढ़ोतरी होना तय है। घटना के तीन दिन बाद तक भाजपा के एक प्रतिनिधिमण्डल को छोड़कर अन्य किसी भी पार्टी के कार्यकर्ता या नेता ने वहाँ जाना उचित नहीं समझा, क्योंकि सभी को अपने वोटबैंक की चिंता थी। राष्ट्रीय अखबारों में सिर्फ़ पायनियर और स्टेट्समैन ने इन खबरों को प्रमुखता से छापा, जबकि "राष्ट्रीय" कहे जाने वाले भाण्ड चैनल दिल्ली की फ़र्जी बाढ़, तथा दबंग और मुन्नी की दलाली (यानी प्रमोशन) के पुनीत कार्य में लगे हुए थे। यहाँ तक कि पश्चिम बंगाल में भी स्टार आनन्द जैसे प्रमुख बांग्ला चैनल ने पूरे मामले पर चुप्पी साधे रखी।

राष्ट्रीय मीडिया की ऐसी ही "घृणित और नपुंसक चुप्पी" हमने बरेली के दंगों के समय भी देखी थी, जहाँ लगातार 15 दिनों तक भीषण दंगे चले थे और हेलीकॉप्टर से सुरक्षा बलों को उतारना पड़ा था। उस वक्त भी "तथाकथित राष्ट्रीय अखबारों" और "फ़र्जी सबसे तेज़" चैनलों ने पूरी खबर को ब्लैक आउट कर दिया था…। यहाँ सेना के फ़्लैग मार्च और RAF की त्वरित कार्रवाई के बावजूद आज एक सप्ताह बाद भी मीडिया ने इस खबर को पूरी तरह से दबा रखा है। 24 सितम्बर को आने वाले अयोध्या के निर्णय की वजह से मीडिया को अपना "सेकुलर" रोल निभाने के कितने करोड़ रुपये मिले हैं यह तो पता नहीं, अलबत्ता "आज तक" ने संतों के स्टिंग ऑपरेशन को "हे राम" नाम का शीर्षक देकर अपने "विदेश में बैठे असली मालिकों" को खुश करने की भरपूर कोशिश की है।



ऐसी ही एक और भद्दी लेकिन "सेकुलर" कोशिश ममता बैनर्जी ने भी की है जब उन्होंने हिज़ाब में नमाज़ पढ़ते हुए अपनी फ़ोटो, रेल्वे की एक परियोजना के उदघाटन समारोह के विज्ञापन हमारे टैक्स के पैसों पर छपवाई है और पश्चिम बंगाल के मुसलमानों से अघोषित वादा किया है कि "यह रेल तुम्हारी है, रेल सम्पत्ति तुम्हारी है, मैं नमाज़ पढ़ रही हूं, मुझे ही वोट देना, माकपा को नहीं…"। फ़िर बेचारी अकेली ममता को ही दोष क्यों देना, जब वामपंथी बरसों से केरल और बंगाल में यही गंदा खेल जारी रखे हुए हैं और मनमोहन सिंह खुद कह चुके हैं कि "देश के संसाधनों पर पहला हक मुस्लिमों का है…", तब भला 24 परगना स्थित देगंगा ब्लॉक के गरीब हिन्दुओं की सुनवाई कौन और कैसे करेगा? उन्हें तो मरना और पिटना ही है…।

जिस प्रकार सोनिया अम्मा कह चुकी हैं कि भोपाल गैस काण्ड और एण्डरसन पर चर्चा न करें (क्योंकि उससे राजीव गाँधी का निकम्मापन उजागर होता है), तथा गुजरात के दंगों को अवश्य याद रखिए (क्योंकि भारत के इतिहास में अब तक सिर्फ़ एक ही दंगा हुआ है)… ठीक इसी प्रकार मनमोहन सिंह, दिग्विजय सिंह, ममता बनर्जी, वामपंथी सब मिलकर आपसे कह रहे हैं कि, बाकी सब भूल जाईये, आपको सिर्फ़ यह याद रखना है कि हिन्दुओं को एकजुट करने की कोशिश को ही "साम्प्रदायिकता" कहते है…

बहराइच में हिन्दू एक आक्रान्ता की कबर पर सर झुकाते हैं !!

जैसा कि पहले भी कई बार कहा जा चुका है कि वामपंथियों और कांग्रेसियों ने भारत के गौरवशाली हिन्दू इतिहास को शर्मनाक बताने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है… क्रूर, अत्याचारी और अनाचारी मुगल शासकों के गुणगान करने में इन लोगों को आत्मिक सुख की अनुभूति होती है। लेकिन यह मामला उससे भी बढ़कर है, एक मुगल आक्रांता, जो कि समूचे भारत को “दारुल-इस्लाम” बनाने का सपना देखता था, की कब्र को दरगाह के रूप में अंधविश्वास और भेड़चाल के साथ नवाज़ा जाता है, लेकिन इतिहास को सुधार कर देश में आत्मगौरव निर्माण करने की बजाय हमारे महान इतिहासकार इस पर मौन हैं।मुझे यकीन है कि अधिकतर पाठकों ने सुल्तान सैयद सालार मसूद गाज़ी के बारे में नहीं सुना होगा, यहाँ तक कि बहराइच (उत्तरप्रदेश) में रहने वालों को भी इसके बारे में शायद ठीक-ठीक पता न होगा। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं बहराइच (उत्तरप्रदेश) में “दरगाह शरीफ़”(???) पर प्रतिवर्ष ज्येष्ठ मास के पहले रविवार को लगने वाले सालाना उर्स के बारे में…। बहराइच शहर से 3 किमी दूर सैयद सालार मसूद गाज़ी की दरगाह स्थित है, ऐसी मान्यता है(?) कि मज़ार-ए-शरीफ़ में स्नान करने से बीमारियाँ दूर हो जाती हैं (http://behraich.nic.in/) और अंधविश्वास के मारे लाखों लोग यहाँ आते हैं। सैयद सालार मसूद गाज़ी कौन था, उसकी कब्र “दरगाह” में कैसे तब्दील हो गई आदि के बारे में आगे जानेंगे ही, पहले “बहराइच” के बारे में संक्षिप्त में जान लें – यह इलाका “गन्धर्व वन” के रूप में प्राचीन वेदों में वर्णित है, ऐसा माना जाता है कि ब्रह्मा जी ने ॠषियों की तपस्या के लिये यहाँ एक घने जंगल का निर्माण किया था, जिसके कारण इसका नाम पड़ा “ब्रह्माइच”, जो कालांतर में भ्रष्ट होते-होते बहराइच बन गया।

पर… पाठकगंण महमूद गज़नवी (गज़नी) के बारे में तो जानते ही होंगे, वही मुगल आक्रांता जिसने सोमनाथ पर 16 बार हमला किया और भारी मात्रा में सोना हीरे-जवाहरात आदि लूट कर ले गया था। महमूद गजनवी ने सोमनाथ पर आखिरी बार सन् 1024 में हमला किया था तथा उसने व्यक्तिगत रूप से सामने खड़े होकर शिवलिंग के टुकड़े-टुकड़े किये और उन टुकड़ों को अफ़गानिस्तान के गज़नी शहर की जामा मस्जिद की सीढ़ियों में सन् 1026 में लगवाया। इसी लुटेरे महमूद गजनवी का ही रिश्तेदार था सैयद सालार मसूद… यह बड़ी भारी सेना लेकर सन् 1031 में भारत आया। सैयद सालार मसूद एक सनकी किस्म का धर्मान्ध मुगल आक्रान्ता था। महमूद गजनवी तो बार-बार भारत आता था सिर्फ़ लूटने के लिये और वापस चला जाता था, लेकिन इस बार सैयद सालार मसूद भारत में विशाल सेना लेकर आया था कि वह इस भूमि को “दारुल-इस्लाम” बनाकर रहेगा और इस्लाम का प्रचार पूरे भारत में करेगा (जाहिर है कि तलवार के बल पर)।सैयद सालार मसूद अपनी सेना को लेकर “हिन्दुकुश” पर्वतमाला को पार करके पाकिस्तान (आज के) के पंजाब में पहुँचा, जहाँ उसे पहले हिन्दू राजा आनन्द पाल शाही का सामना करना पड़ा, जिसका उसने आसानी से सफ़ाया कर दिया। मसूद के बढ़ते कदमों को रोकने के लिये सियालकोट के राजा अर्जन सिंह ने भी आनन्द पाल की मदद की लेकिन इतनी विशाल सेना के आगे वे बेबस रहे। मसूद धीरे-धीरे आगे बढ़ते-बढ़ते राजपूताना और मालवा प्रांत में पहुँचा, जहाँ राजा महिपाल तोमर से उसका मुकाबला हुआ, और उसे भी मसूद ने अपनी सैनिक ताकत से हराया। एक तरह से यह भारत के विरुद्ध पहला जेहाद कहा जा सकता है, जहाँ कोई मुगल आक्रांता सिर्फ़ लूटने की नीयत से नहीं बल्कि बसने, राज्य करने और इस्लाम को फ़ैलाने का उद्देश्य लेकर आया था। पंजाब से लेकर उत्तरप्रदेश के गांगेय इलाके को रौंदते, लूटते, हत्यायें-बलात्कार करते सैयद सालार मसूद अयोध्या के नज़दीक स्थित बहराइच पहुँचा, जहाँ उसका इरादा एक सेना की छावनी और राजधानी बनाने का था। इस दौरान इस्लाम के प्रति उसकी सेवाओं(?) को देखते हुए उसे “गाज़ी बाबा” की उपाधि दी गई।इस मोड़ पर आकर भारत के इतिहास में एक विलक्षण घटना घटित हुई, ज़ाहिर है कि इतिहास की पुस्तकों में जिसका कहीं जिक्र नहीं किया गया है। इस्लामी खतरे को देखते हुए पहली बार भारत के उत्तरी इलाके के हिन्दू राजाओं ने एक विशाल गठबन्धन बनाया, जिसमें 17 राजा सेना सहित शामिल हुए और उनकी संगठित संख्या सैयद सालार मसूद की विशाल सेना से भी ज्यादा हो गई। जैसी कि हिन्दुओ की परम्परा रही है, सभी राजाओं के इस गठबन्धन ने सालार मसूद के पास संदेश भिजवाया कि यह पवित्र धरती हमारी है और वह अपनी सेना के साथ चुपचाप भारत छोड़कर निकल जाये अथवा उसे एक भयानक युद्ध झेलना पड़ेगा। गाज़ी मसूद का जवाब भी वही आया जो कि अपेक्षित था, उसने कहा कि “इस धरती की सारी ज़मीन खुदा की है, और वह जहाँ चाहे वहाँ रह सकता है… यह उसका धार्मिक कर्तव्य है कि वह सभी को इस्लाम का अनुयायी बनाये और जो खुदा को नहीं मानते उन्हें काफ़िर माना जाये…”।उसके बाद ऐतिहासिक बहराइच का युद्ध हुआ, जिसमें संगठित हिन्दुओं की सेना ने सैयद मसूद की सेना को धूल चटा दी। इस भयानक युद्ध के बारे में इस्लामी विद्वान शेख अब्दुर रहमान चिश्ती की पुस्तक मीर-उल-मसूरी में विस्तार से वर्णन किया गया है। उन्होंने लिखा है कि मसूद सन् 1033 में बहराइच पहुँचा, तब तक हिन्दू राजा संगठित होना शुरु हो चुके थे। यह भीषण रक्तपात वाला युद्ध मई-जून 1033 में लड़ा गया। युद्ध इतना भीषण था कि सैयद सालार मसूद के किसी भी सैनिक को जीवित नहीं जाने दिया गया, यहाँ तक कि युद्ध बंदियों को भी मार डाला गया… मसूद का समूचे भारत को इस्लामी रंग में रंगने का सपना अधूरा ही रह गया।बहराइच का यह युद्ध 14 जून 1033 को समाप्त हुआ। बहराइच के नज़दीक इसी मुगल आक्रांता सैयद सालार मसूद (तथाकथित गाज़ी बाबा) की कब्र बनी। जब फ़िरोज़शाह तुगलक का शासन समूचे इलाके में पुनर्स्थापित हुआ तब वह बहराइच आया और मसूद के बारे में जानकारी पाकर प्रभावित हुआ और उसने उसकी कब्र को एक विशाल दरगाह और गुम्बज का रूप देकर सैयद सालार मसूद को “एक धर्मात्मा”(?) के रूप में प्रचारित करना शुरु किया, एक ऐसा इस्लामी धर्मात्मा जो भारत में इस्लाम का प्रचार करने आया था। मुगल काल में धीरे-धीरे यह किंवदंती का रूप लेता गया और कालान्तर में सभी लोगों ने इस “गाज़ी बाबा” को “पहुँचा हुआ पीर” मान लिया तथा उसकी दरगाह पर प्रतिवर्ष एक “उर्स” का आयोजन होने लगा, जो कि आज भी जारी है। इस समूचे घटनाक्रम को यदि ध्यान से देखा जाये तो कुछ बातें मुख्य रूप से स्पष्ट होती हैं-(1) महमूद गजनवी के इतने आक्रमणों के बावजूद हिन्दुओं के पहली बार संगठित होते ही एक क्रूर मुगल आक्रांता को बुरी तरह से हराया गया (अर्थात यदि हिन्दू संगठित हो जायें तो उन्हें कोई रोक नहीं सकता)(2) एक मुगल आक्रांता जो भारत को इस्लामी देश बनाने का सपना देखता था, आज की तारीख में एक “पीर-शहीद” का दर्जा पाये हुए है और दुष्प्रचार के प्रभाव में आकर मूर्ख हिन्दू उसकी मज़ार पर जाकर मत्था टेक रहे हैं।(3) एक इतना बड़ा तथ्य कि महमूद गजनवी के एक प्रमुख रिश्तेदार को भारत की भूमि पर समाप्त किया गया, इतिहास की पुस्तकों में सिरे से ही गायब है।जो कुछ भी उपलब्ध है इंटरनेट पर ही है, इस सम्बन्ध में रोमिला थापर की पुस्तक “Dargah of Ghazi in Bahraich” में उल्लेख हैएन्ना सुवोरोवा की एक और पुस्तक “Muslim Saints of South Asia” में भी इसका उल्लेख मिलता है,जो मूर्ख हिन्दू उस दरगाह पर जाकर अभी भी स्वास्थ्य और शारीरिक तकलीफ़ों सम्बन्धी तथा अन्य दुआएं मांगते हैं उनकी खिल्ली स्वयं “तुलसीदास” भी उड़ा चुके हैं। चूंकि मुगल शासनकाल होने के कारण तुलसीदास ने मुस्लिम आक्रांताओं के बारे में ज्यादा कुछ नहीं लिखा है, लेकिन फ़िर भी बहराइच में जारी इस “भेड़िया धसान” (भेड़चाल) के बारे में वे अपनी “दोहावली” में कहते हैं –लही आँखि कब आँधरे, बाँझ पूत कब ल्याइ ।कब कोढ़ी काया लही, जग बहराइच जाइ॥अर्थात “पता नहीं कब किस अंधे को आँख मिली, पता नहीं कब किसी बाँझ को पुत्र हुआ, पता नहीं कब किसी कोढ़ी की काया निखरी, लेकिन फ़िर भी लोग बहराइच क्यों जाते हैं…” (यहाँ भी देखें)“लाल” इतिहासकारों और धूर्त तथा स्वार्थी कांग्रेसियों ने हमेशा भारत की जनता को उनके गौरवपूर्ण इतिहास से महरूम रखने का प्रयोजन किया हुआ है। इनका साथ देने के लिये “सेकुलर” नाम की घृणित कौम भी इनके पीछे हमेशा रही है। भारत के इतिहास को छेड़छाड़ करके मनमाने और षडयन्त्रपूर्ण तरीके से अंग्रेजों और मुगलों को श्रेष्ठ बताया गया है और हिन्दू राजाओं का या तो उल्लेख ही नहीं है और यदि है भी तो दमित-कुचले और हारे हुए के रूप में। आखिर इस विकृति के सुधार का उपाय क्या है…? जवाब बड़ा मुश्किल है, लेकिन एक बात तो तय है कि इतने लम्बे समय तक हिन्दू कौम का “ब्रेनवॉश” किया गया है, तो दिमागों से यह गंदगी साफ़ करने में समय तो लगेगा ही। इसके लिये शिक्षण पद्धति में आमूलचूल परिवर्तन करने होंगे। “मैकाले की अवैध संतानों” को बाहर का रास्ता दिखाना होगा, यह एक धीरे-धीरे चलने वाली प्रक्रिया है। हालांकि संतोष का विषय यह है कि इंटरनेट नामक हथियार युवाओं में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है, युवाओं में “हिन्दू भावनाओं” का उभार हो रहा है, उनमें अपने सही इतिहास को जानने की भूख है। आज का युवा काफ़ी समझदार है, वह देख रहा है कि भारत के आसपास क्या हो रहा है, वह जानता है कि भारत में कितनी अन्दरूनी शक्ति है, लेकिन जब वह “सेकुलरवादियों”, कांग्रेसियों और वामपंथियों के ढोंग भरे प्रवचन और उलटबाँसियाँ सुनता है तो उसे उबकाई आने लगती है, इन युवाओं (17 से 23 वर्ष आयु समूह) को भारत के गौरवशाली पृष्ठभूमि का ज्ञान करवाना चाहिये। उन्हें यह बताने की जरूरत है कि भले ही वे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के नौकर बनें, लेकिन उन्हें किसी से “दबकर” रहने या अपने धर्म और हिन्दुत्व को लेकर किसी शर्मिन्दगी का अहसास करने की आवश्यकता नहीं है। जिस दिन हिन्दू संगठित होकर प्रतिकार करने लगेंगे, एक “हिन्दू वोट बैंक” की तरह चुनाव में वोटिंग करने लगेंगे, उस दिन ये “सेकुलर” नामक रीढ़विहीन प्राणी देखते-देखते गायब हो जायेगा। हमें प्रत्येक दुष्प्रचार का जवाब खुलकर देना चाहिये, वरना हो सकता है कि किसी दिन एकाध “गधे की दरगाह” पर भी हिन्दू सिर झुकाते हुए मिलें…


बी एन शर्मा -भोपाल

बुधवार, 13 अक्टूबर 2010

मीडिया ने चुनौती दी है राष्ट्र को

मीडिया ने चुनौती दी है राष्ट्र को—————————-

——————————————————यशेन्द्र की बतकही

पूरा देश बम-बम है इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय को सुनकर I सच कहूँ तो इस प्रकार के निर्णय की आशा न थी I सैकड़ों वर्षों से मन मार के सहने की आदत जो पड़ चुकी है हमें I हमें पता था कि आज के युग में केवल तथ्यों के भरोसे रहने पर कुछ नहीं होता I पर उच्च न्यायालय ने तथ्यों के आधार पर निर्णय सुना दिया I

नतीज़ा यह हुआ कि अधिकांश मीडिया ( टी.वी एवं प्रिन्ट दोनों) में कोहराम मच गया I अंग्रेज़ी के कुछ महानतम समाचारपत्र तो सन्न रह गए ! न्यायालय ने हिन्दुओं की बात कैसे मान ली ? पिछली रात शायद ‘पब’ में बैठकर जिन महान पत्रकारों ने भाजपा और संघ-परिवार की बखिया उधेड़ने की योजना बनाई थी उनकी तो फट गई I वैसे मुझे आज तक यह नहीं समझ आया है कि जब कहीं श्रीराम का नाम उठता हैं तो इन्हें भाजपा एवं संघ – परिवार की ही याद क्यों आती है ? आसेतुहिमाचल उन करोड़ों भारतीयों की याद क्यों नहीं आती जिनके ह्रदय में श्रीराम बसते हैं — जो राम मन्दिर का निर्माण करना चाहते है पर कोई प्रदर्शन नहीं कर पाते I 1962 में भारत पर चीन के आक्रमण का समर्थन करने वाले महान वामपंथ के नेता सीताराम येचुरी तक के नाम में ‘सीताराम’ बसते हैं ! बहुसंख्यक हिन्दू समुदाय का संघ-परिवार से कोई सरोकार नहीं है और ना ही ये इस्लाम का विरोधी है I पर इसे इस बात का पता है कि बाबरी मस्जिद का निर्माण राम-मंदिर का ध्वंस कर के ही हुआ था I


अधिकांश टी.वी. चैनलों ने वामपंथी इतिहासकार और चाचा नेहरु के पद-चिन्हों पर चलने वाले विद्वानों को एकत्रित किया I सभी आग बबूला थे I ‘विश्वास’ को आधार बनाकर उच्च न्यायालय ने वहाँ राम की जन्मभूमि कैसे मान ली ? पर किसी ने भी यह जिक्र नहीं किया कि यह ‘विश्वास’ इस्लाम के जन्म के हजारों वर्ष पहले से चला आ रहा है ! किसी ने यह जिक्र करने की जरुरत नहीं समझी कि मस्जिद में अल्लाह बसते हैं क्या यह ‘विश्वास’ नहीं है ? अल्लाह का अस्तित्व ‘विश्वास’ नहीं तो और क्या है ?

महानतम पत्रकारों में से एक – बरखा दत्त – तो बौखला गईं : ” अगर सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस निर्णय पर अपनी मुहर लगा दी तो उस ‘worst case scenario ‘ में ‘हम’ क्या करेंगे ?” उनके इस वक्तव्य की वीडियो रेकॉर्डिंग इन्टरनेट पर सहज उपलब्ध है I जिन ‘हम’ लोगों का जिक्र उन्होंने किया, सत्य ही उन लोगों के लिए भारतवर्ष के आदर्श मर्यादा-पुरूषोत्तम श्रीराम का मंदिर- निर्माण एक ‘ worst case scenario ‘ के अतिरिक्त और क्या हो सकता है ! सचमुच देखने लायक है बरखा दत्त के उस कार्यक्रम की वीडियो रेकॉर्डिंग जिसमे उन्होंने ‘भव्य मंदिर’ शब्द- युग्म का जम कर माखौल उड़ाया है I मीडिया के इस वर्ग के लिए राम का नाम लेने वाला हर भारतीय ‘संघ- परिवार’ का सदस्य है I

उच्च न्यायालय ने 2-1 के बहुमत से यह निर्णय दिया कि वहाँ एक हिन्दू धार्मिक-स्थल का ध्वंस कर मस्जिद का निर्माण कराया गया था I जिन एक न्यायाधीश ने ध्वंस करने की बात नहीं मानी उन्होंने भी स्वीकार किया कि मस्जिद बना तो हिन्दू धार्मिक-स्थल के ध्वंसावशेष पर ही था, और निर्माण में अवशेष की संरचनाओं का उपयोग भी हुआ था !पर इस मूल तथ्य पर मीडिया का ध्यान क्यों जाए ! सैकड़ो वर्षों तक मुस्लिम हमलावरों ने जिस दरिदंगी और हैवानियत का खेल खेला है वह इनके लिए तथ्य कैसे हो सकता है ! मुस्लिमों की प्रत्येक बात का समर्थन किये बिना कोई ‘सेक्युलर’ अथवा सफल पत्रकार थोड़े ही बन सकता है ! मीडिया के इस बहुसंख्यक वर्ग का ध्यान सिर्फ इस पर केन्द्रित है कि 1992 में हिन्दू धार्मिक-स्थल का ध्वंस कर बनाये गए बाबरी मस्जिद को क्यों तोड़ा गया ? इन महान पत्रकारों के लिए इतिहास भी 22 दिसम्बर 1949 से प्रारम्भ होता है जब रामलला की मूर्तियाँ बाबरी मस्जिद में जबरदस्ती रखी गयी थी I उसके पहले क्या हुआ था उससे मीडिया को क्या मतलब ?!

वास्तव में यदि देखें तो बाबरी मस्जिद को तोड़कर वहाँ श्रीराम-मंदिर बनाने का दायित्त्व भारत सरकार का था I 15 अगस्त 1947 के तुरंत बाद ही यह कार्य हो जाना चाहिए था I अयोध्या ही नहीं, मथुरा, काशी एवं अन्य ऐसे सभी स्थलों से राष्ट्रीय-कलंक के प्रतीकों को मिटाने के लिए 1947 अथवा 1950 में ही ‘राष्ट्रीय-चेतना मंत्रालय’ का गठन हो जाना चाहिए था I राष्ट्र को धर्म-निरपेक्ष घोषित किये जाने के बाद संवैधानिक रूप से यह सरकार का दायित्त्व बनता था कि मुस्लिम हमलावरों द्वारा किए गए ध्वंस पर हुए निर्माण को मिटा दे I जब तक ऐसा नहीं होता हम सरकार को धर्म निरपेक्ष कैसे मान लें ? इस्लाम के नाम का दुरूपयोग करने वाले हमलावरों द्वारा किये गए कुकृत्यों के स्मारकों को मिटाए बिना हम धर्म-निरपेक्षता की बात कैसे कर सकते है ?सरकार ने कुछ नहीं किया तो भारत के लोगों ने 6 दिसम्बर 1992 को स्वयं इस कार्य का शुभारम्भ कर दिया I जो इस महान कार्य को मुस्लिम- विरोधी दृष्टिकोण से देखते हैं वह भयंकर भूल करते हैं I बाबरी मस्जिद के ध्वंस से स्वयं को गौरवान्वित समझने वाला बृहत् हिन्दू समाज इस्लाम का विरोधी नहीं हैं I भारत का यह बहुसंख्यक समाज मस्जिद की उतनी ही श्रद्धा करता है जितनी मंदिर की I रामकृष्ण परमहंस, गायत्री परिवार के संस्थापक आचार्य श्रीराम शर्मा, संत कबीर, गुरु नानक आदि महान भारतीय संतों ने पैगम्बर मोहम्मद एवं पवित्र कुरान को पूर्ण श्रद्धा की दृष्टि से देखा है I बिहार, बंगाल, उड़ीसा एवं अन्य क्षेत्रों में श्रीश्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र जी (1888-1969) के शिष्यगण श्रीराम, कृष्ण, बुद्ध, ईसा एवं मोहम्मद सबकी समान-रूप से प्रतिदिन आराधना करते हैं I पर यह सारी बातें मीडिया के लिए तथ्य नहीं है I इससे उनकी टी.आर. पी. नहीं बढ़ती Iउच्च न्यायालय ने निर्णय सुनाया कि भारतीय पुरातत्त्व विभाग के शोध ने यह प्रमाणित कर दिया कि एक हिन्दू धर्मस्थल का ध्वंस कर मस्जिद बनाई गयी थी I ऐसी स्थिति में वह मस्जिद अल्लाह की इबादत योग्य स्थान कैसे रही ? वह तो कलंक थी हमारी सभ्यता और संस्कृति पर I यदि भारत को वास्तविक रूप से धर्म-निरपेक्ष बनाना है तो ऐसे सभी कलंको को मिटाना होगा I

भारतीय मुस्लिम समाज को इस यथार्थ को स्वीकारना होगा कि इस्लाम की शिक्षा भले अरब से आई हो, पर उनकी संस्कृति भारतीय है, अरब की नहीं I उन्हें गौरी, गज़नी, ख़िलज़ी और बाबर के वंश पर गर्व करना छोड़ना होगा I यह सभी भारतीय -संस्कृति के ध्वंसकर्त्ता हैं I नालंदा, विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालयों का विध्वंस करने वाले बख्तियार खिलजी के नाम पर एक शहर है बिहार में– बख्तियारपुर ! औरंगजेब के नाम पर तो कई शहर हैं, और राजधानी नई दिल्ली का एक प्रमुख मार्ग उसी के नाम पर है I यह भारत के पतन का परिचायक नहीं तो और क्या है ? अजमल कसाब के नाम पर मुंबई का नाम ‘कसाबपुर’ या ताज होटल का नाम ‘कसाबधाम’ रख देना क्या धर्म- निरपेक्षता होगी ? संसद पर हमला करने वाले अफज़ल गुरु को फाँसी न देना क्या धर्मं निरपेक्षता है ?सनातन धर्म ‘सर्वधर्म-समभाव’ पर आधारित है I अनादिकाल से चली आ रही इस सभ्यता को तहस-नहस करना चाहा है मुस्लिम आक्रमणकारियों ने I हजारों मंदिरों को ही नहीं, विश्वविद्यालयों तक को नेस्तनाबूद कर डाला उन्होंने I दारा शिकोह जैसी किसी शख्सियत ने भारतीय दर्शन में यदि रूचि भी दिखाई तो उन्हें हाथियों द्वारा कुचलवा दिया गया I पर इन तथ्यों से मीडिया को क्या फर्क पड़ता है !

‘सर्वधर्म-समभाव’ की भावना मूल इस्लाम में अवश्य है, पर अनुयायियों ने उसे विकृत कर दिया I अब इसका मुस्लिम-सोच में कोई स्थान नहीं I मुस्लिम संस्कृति भारत की राष्ट्रीयता की परिचायक नहीं I हाँ, जहाँ वे अल्पसंख्यक हैं वहाँ ‘सेकुलरिज्म’ बात वे जरुर करेंगे I पर जहाँ वे बहुसंख्यक हैं वहाँ क्या होता है ? सउदी अरब, दुबई, खाड़ी- देश, पाकिस्तान एवं बांग्लादेश में ‘सर्वधर्मं समभाव’ या ‘सेक्युलरिज्म’ की बात करने वाले जीवित नहीं छोड़े जाते I काश्मीर के मुस्लिम ‘सर्वधर्म समभाव’ की बात क्यों नहीं करते ?!! मुस्लिम जिस क्षेत्र में बहुसंख्यक होंगे वहां वे अलग राष्ट्र की माँग करेंगे, यह ध्रुव सत्य है I पाकिस्तान एवं बांग्लादेश का निर्माण इसी कारण हुआ था I आज जो कश्मीर की समस्या है उसका कारण बस यही है कि वहाँ मुस्लिम बहुसंख्यक हैं I काश्मीर से अधिक पिछड़े बिहार जैसे अन्य क्षेत्र में पृथक राष्ट्र की माँग क्यों नहीं उठती ? सशस्त्र विद्रोह पर उतर आए नक्सलवादी भी पृथक राष्ट्र की माँग नहीं कर रहे !पिछले महीने ही पश्चिम बंगाल के देगंगा में मुस्लिमों ने जो हिन्दुओं पर जो कहर बरपा किया उस पर मीडिया चुप क्यों है ? वे शायद इस अवसर की प्रतीक्षा में है कि कब हिन्दू प्रत्याक्रमण करें और वे कैमरा और सेकुलरिज्म का झंडा लेकर कूद पड़ें ! भला हो मीडिया की शीर्ष-संस्था का जिसने खबरिया चैनलों पर अंकुश लगा दिए थे I वर्ना अपनी टी. आर. पी. बढ़ने के लिए ये चैनल सबको भड़का कर पूरे देश में दंगा करवा देने से शायद ही हिचकें I और फिर चेहरे पर पाउडर पोत कर इनके संवाददाता मरने वालों के परिजनों से पूछते फिरते “कैसा महसूस हो रहा है ?” !!राजनीतिक नेताओ को तो चुनावों में जनता को जवाब देना होता है I पर मीडिया वाले सिर्फ व्यापारी हैं I स्वयं पर स्व-घोषित रूप से ‘जनता की आवाज़’ का नकाब ओढ़े हुए है I साथ ही साथ बहुसंख्यक जनता के मत की आलोचना भी करते हैं !! उन्हें टी. आर. पी. चाहिए और वे उसी की सुनेंगे जो उन्हें धन दे I धन तभी मिलेगा जब ज्यादा विज्ञापन मिलेंगे और यह तभी संभव है जब देश में उपभोक्तावाद बढे तथा भारत का अधिक से अधिक बाजारीकरण हो I

परन्तु सनातन धर्म की मूल भारतीय- संस्कृति तो त्याग पर आधारित है ! यह विषयोपभोग को पतन मानती है, विकास नहीं I ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ I इन्द्रियों एवं स्वयं की आवश्यकताओं पर संयम रखने की शिक्षा देता है सनातन धर्म का विज्ञान I मूल इस्लाम की आध्यात्मिकता के भी यही मूल्य हैं I यह पाश्चात्य संस्कृति एवं मूल्यों के ठीक विपरीत है जिनका आदर्श है – अधिक से अधिक उपभोग I यही कारण है कि अधिकांश मीडिया (चैनल एवं प्रिंट) वालो को सनातन धर्म के मूल्य फूटी आँखों नहीं सुहाते I वैदिक शिक्षा हो या निजामुद्दीन औलिया की, अधिकांश मीडिया को आध्यात्मिक मूल्यों से ही चिढ़ है I हिन्दू- मुस्लिम सबको समझ लेना होगा कि मीडिया अपनी रोटी सेंकना चाहता है Iइसके अतिरिक्त, चाचा नेहरु की वज़ह से भारतीय शिक्षा पद्वति एवं भारतीय इतिहास का प्रस्तुतीकरण वामपंथ के दृष्टिकोण पर आधारित हैं I यह वामपंथ सनातन धर्म पर आधारित भारतीय संस्कृति एवं उसके इतिहास के तथ्यों से घृणा करता है I सनातन धर्म की हमारी सभ्यता आसुरिक एवं पैशाचिक संस्कृति की विरोधी है I उन्मुक्त यौन-सम्बन्ध, समलैंगिकता, सिद्धांत -विहीन स्वछन्दता, विवाह-संस्था का पतन, परिवार का बिखराव, मदिरापान एवं मांसाहार जैसे तामसिक कृत्य आसुरिक संस्कृति के अंग है I यह संस्कृति व्यक्ति को इन्द्रियों का गुलाम बनाकर भोगवाद सिखाती है I इसी से समाज में उपभोक्तावाद बढ़ता है I यही कारण है कि आधुनिक मीडिया का अधिकांश भाग इन्ही कृत्यों के गुण गाता है और ‘विकास’ का जामा पहनाकर इन दुष्प्रवृत्तियों को समाज में बढ़ाना चाहता है Iमीडिया की राह का सबसे बड़ा रोड़ा है सनातन धर्म ! श्रीराम इसी सनातन धर्म के प्रतीक हैं जो ‘सर्वधर्म समभाव’ एवं ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ पर आधारित है I यह भोगवाद एवं उपभोक्तावाद के विरुद्ध है I इसीलिये मीडिया चुनौती दे रहा है भारतवर्ष की सनातन संस्कृति को जो हमारे राष्ट्र का वज़ूद है I श्रीराम मंदिर का निर्माण उनके लिए ‘worst case scenario’ है I
राम जन्मभूमि का मामला शायद राजनीतिक दलों के हाथ से निकल चुका है I अब जो युद्ध है वह भारतवर्ष और भारत की मीडिया के बीच है ! मीडिया ने उच्च न्यायालय के निर्णय एवं राममंदिर-निर्माण का माखौल उड़ा कर समग्र राष्ट्र को ललकारा है I उनकी इस चुनौती का सामना करना होगा पूरे देश को एकजुट हो कर I


“समर शेष है, अहंकार इनका हरना बाकी है,
वृक को दंतहीन, अहि को निर्विष करना बाकी है ।
समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध,
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध ।” (-दिनकर )