शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

अखण्ड भारत

पन्द्रह अगस्त का दिन कहता,
आजादी अभी अधूरी है।

सपने सच होने बाकी हैं,
रावी की शपथ न पूरी है।
लाशों पर पग धर कर,
आजादी भारत में आई।
अब तक हैं खानाबदोश,
गम की काली बदली छाई॥
के फुटपाथों पर, जो आंधी-पानी सहते हैं।
उनसे पूछो, पन्द्रह अगस्त के बारे में क्या कहते हैं॥
के नाते उनका दुख सुनते, यदि तुम्हें लाज आती।
तो सीमा के उस पार चलो, सभ्यता जहां कुचली जाती॥
इन्सान जहां बेचा जाता, ईमान खरीदा जाता है।
इस्लाम सिसकियां भरता है, डालर में मुस्काता है॥
को गोली, नंगों को हथियार पिन्हाये जाते हैं।
सूखे कण्ठों से, जेहादी नारे लगवाये जाते हैं॥

लाहौर, कराची, ढाका पर, मातम की है काली छाया।
पख्तूनों पर, गिलगित पर है, गमगीन गुलामी का साया॥

बस इसीलिए तो कहता हूं, आजादी अभी अधूरी है।
कैसे उल्लास मनाऊं मैं? थोड़े दिन की मजबूरी है॥

दूर नहीं खण्डित भारत को, पुन: अखण्ड बनायेंगे।
गिलगित से गारो पर्वत तक, आजादी पर्व मनायेंगे।

उस स्वर्ण दिवस के लिए, आज से कमर कसें, बलिदान करें।
जो पाया उसमें खो न जाएं, जो खोया उसका ध्यान करें॥

साध्वी ऋतंभरा की हुंकार

गत 30 दिसंबर को दिल्‍ली में आयोजित ऐतिहासिक रामसेतु रक्षा महासम्‍मेलन में साध्वी ऋतंभरा, प्रणेता, वात्सल्य ग्राम (वृंदावन) का उदबोधन-


इस देश का प्राणाधार हैं श्री राम। वे हमारी आस्थाओं और जन-जन की निष्ठाओं में बसते हैं। वे पंचवटी की छांव में मिलते हैं, अंगद के पांव में मिलते हैं, अनसुइया की मानवता में मिलते हैं और मां सीता की पावनता में दृष्टिगोचर होते हैं। राम मंदिर के फेरों में नहीं शबरी के झूठे बेरों में मिलते हैं। देख सकते हो तो देखो, सारा हिन्दू जनमानस भगवान राम से आलोकित और संचालित होता है।


अपने पुरखों और संस्कृति को नकारने से बड़ा दुर्भाग्य कुछ और नहीं हो सकता। आज जैसी स्थिति बनी है वैसी स्थिति पहले भी आई थी जब अयोध्या में प्रभु श्रीराम की जन्मभूमि पर पराभवी युग का प्रतीक सबकी आस्थाओं को चुनौती दे रहा था। 6 दिसम्बर 1992 को हिन्दू समाज की शक्ति के आगे वह प्रतीक देखते ही देखते ओझल हो गया। लेकिन आज परिस्थितियां बड़ी विचित्र हैं। रामसेतु को तोड़ना निशाचरी चिंतन है, आसुरी प्रवृत्ति है। रामसेतु केवल एक सेतु नहीं हमारी आस्था का दर्पण है। इसे ध्वस्त करने वालों के विरुध्द संकल्पित होकर प्रतिकार का शंख गुंजाना होगा, राजकाज के लिए सभी को आगे आना होगा।


करुणा हमारा स्वभाव है लेकिन जब कोई हमारी आस्थाओं को चुनौती देता है तो हम षडंत्रों के संहारी बनकर मंत्रों का नवनिर्माण करते हैं, जो क्रांति का मार्ग प्रशस्त करता है। ये देश राम का है, परिवेश राम का है, हम सब राम के हैं। तुम हिन्दू हो, जिन्होंने नक्षत्रों को संज्ञा दी है, जिन्होंने दधीचि बनकर अपनी हड्डियां राष्ट्र को समर्पित की हैं। तुम हिन्दू हो, जिन्होंने सागर की छाती पर पाषाणों को तैराया था, जिन्होंने स्वाभिमान के लिए अपने पुत्रों को दीवार में चिनवाया था। तुम हिन्दू हो, जिन्होंने युध्दों की चुनौतियां भी स्वीकार कर ली थीं, फांसी को फंदे को चूमा था, लेकिन मां भारती के स्वाभिमान और अस्तित्व के लिए अपने यौवन को न्योछावर किया था। हिन्दुओ, तुमने अन्दमान की काली कोठरी में पत्थरों पर अपने रक्त के शौर्य की कहानियां लिखी थीं। हिन्दुओ, तुमने घास की रोटियां खाई थीं लेकिन अपने स्वाभिमान को नहीं बेचा था। हिन्दुओ, तुमने हरिश्चंद्र बनकर मणिकर्णिका घाट पर अपना कर्तव्य निभाया था, अपने सम्मुख अपने पुत्र की लाश लिए खड़ी पत्नी को देखकर भी तुम विचलित नहीं हुए थे। हिन्दुओ, तुमने अपना सर्वस्व न्योछावर किया राष्ट्र के लिए, समाज, धर्म, संस्कृति के लिए। हम अपने लिए जीना जानते ही नहीं, हम अपनों के लिए जीना जानते हैं। हमने कण-कण में राम का दर्शन किया है। हम सारी दुनिया में वात्सल्य लुटाने वाले हैं। लेकिन आज अपनी धरती पर अपनी सहिष्णुता के कारण अपमानित होने को विवश हुए हैं। अपनी धरती पर शरणार्थी बन जाने का दंश एक हिन्दू से ज्यादा कौन जानता है? अपने ही देश के अंदर केसर की क्यारियों में बारूद पैदा की गई, हमारे ही देश के टुकड़े-टुकड़े करके तुष्टीकरण की राजनीति को परवान चढ़ाया गया। हम देखते रहे। और आज स्थिति यह हो गई कि लोग हमारे राम को नकारने की धृष्टता करने लगे हैं। इस देश में जब तक आसुरी ताकतें रहेंगी वंदनीय का वंदन नहीं होगा, दण्डनीयों का दण्ड नहीं होगा। इसलिए हिन्दू समाज को संतों का आदेश है कि आने वाले समय में इस देश के अंदर ऐसे वातावरण का निर्माण करें जहां कातिलों की मुक्ति के विधान नहीं रचे जाएंगे, अपितु देश के अंदर आतंकवादियों को सूली पर चढ़ाया जाएगा।


कातिलों की मुक्ति का विधान हो गया यहां

आज देशद्रोही भी महान हो गया यहां।

इक रिवाल्वर ने देशभक्ति को डरा दिया,

कातिलों की टोलियों को रहनुमा बना दिया।

कल लिए हुए खड़ा था बम बनाती टोलियां,

जो उजाड़ता रहा है मेहंदी, मांग, रोलियां।

जो सदा वतन की लाज को उघाड़ता रहा,

और भारती का मानचित्र फाड़ता रहा।

जो नकारता रहा है देश के विधान को,

थूकने की चीज मानता था संविधान को।

इसके सर पे ताज धरके हो रही है आरती,

रो रहा है देशप्रेम, रो रही है भारती।

जो हमारी रोती मातृभूमि को सुकून दे,

और देश द्रोहियों को गोलियों से भून दे,

ऐसे सरफरोश का हमें प्रकाश चाहिए,

देश के लिए पटेल या सुभाष चाहिए।


महात्मा गांधी ने इस देश की बागडोर पं. नेहरू के हाथों में न सौंपकर यदि सरदार पटेल के हाथों में सौंपी होती तो भारत, भारत के रूप में भारतीयता के गीत गाता दिखाई देता। उस समय हम चूके। लेकिन आज पुन: देश हमसे कुछ मांग रहा है। राम से प्रेम रखने वाले धर्मयोध्दाओं रामद्रोहियों के प्रतिकार का संकल्प करो। उन पाषाणों का स्मरण करो जो 'राम' नाम अंकित कर सागर की छाती पर तैराए गए थे, उस गिलहरी का स्मरण करो जो सेतु निर्माण में अपना किंचित योगदान देने आई थी। प्रभु राम ने भी गिलहरी के उस प्रयास को देखकर प्रेम से उसके शरीर पर हाथ फेरा था। इसलिए हिन्दुओ, अपने छोटे-छोटे प्रयत्नों से बिखरी शक्ति को संगठित करो। क्रंदन नहीं, हुंकार भरो हिन्दुओ।


जो सनातन नहीं मिटा लंकेश की तलवार से,

जो सनातन नहीं मिटा कंस की हुंकार से,

वो सनातन क्या मिटेगा मनमोहन की सरकार से


इस सत्य सनातन संस्कृति की जड़ें गहरी हैं, जिन्हें हमने अपनी श्रध्दा से सींचा है। इसलिए हिन्दू समाज रामसेतु रक्षार्थ संकल्पित हो।

गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

इस बहादुर विधवा की दर्दनाक आपबीती से मनमोहन सिंह की नींद उचाट नहीं होती

आप सभी को याद होगा कि किस तरह से ऑस्ट्रेलिया में एक डॉक्टर हनीफ़ को वहाँ की सरकार ने जब गलती से आतंकवादी करार देकर गिरफ़्तार कर लिया था, उस समय हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी ने बयान दिया था कि “हनीफ़ पर हुए अत्याचार से उनकी नींद उड़ गई है…” और उस की मदद के लिये सरकार हरसंभव प्रयास करेगी। डॉक्टर हनीफ़ के सौभाग्य कहिये कि वह ऑस्ट्रेलिया में कोर्ट केस भी जीत गया, ऑस्ट्रेलिया सरकार ने उससे लिखित में माफ़ी भी माँग ली है एवं उसे 10 लाख डॉलर की क्षतिपूर्ति राशि भी मिलेगी…

अब चलते हैं सऊदी अरब… डॉक्टर शालिनी चावला इस देश को कभी भूल नहीं सकतीं… यह बर्बर इस्लामिक देश, रह-रहकर उन्हें सपने में भी डराता रहेगा, भले ही मनमोहन जी चैन की नींद लेते रहें…

डॉक्टर शालिनी एवं डॉक्टर आशीष चावला की मुलाकात दिल्ली के राममनोहर लोहिया अस्पताल में हुई, दोनों में प्रेम हुआ और 10 साल पहले उनकी शादी भी हुई। आज से लगभग 4 वर्ष पहले दोनों को सऊदी अरब के किंग खालिद अस्पताल में नौकरी मिल गई और वे वहाँ चले गये। डॉ आशीष ने वहाँ कार्डियोलॉजिस्ट के रुप में तथा डॉ शालिनी ने अन्य मेडिकल विभाग में नौकरी ज्वाइन कर ली। सब कुछ अच्छा-खासा चल रहा था, लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था…

जनवरी 2010 (यानी लगभग एक साल पहले) में डॉक्टर आशीष चावला की मृत्यु हार्ट अटैक से हो गई, अस्पताल की प्रारम्भिक जाँच रिपोर्ट में इसे Myocardial Infraction बताया गया था अर्थात सीधा-सादा हार्ट अटैक, जो कि किसी को कभी भी आ सकता है। यह डॉ शालिनी पर पहला आघात था। शालिनी की एक बेटी है दो वर्ष की, एवं जिस समय आशीष की मौत हुई उस समय शालिनी गर्भवती थीं तथा डिलेवरी की दिनांक भी नज़दीक ही थी। बेटी का खयाल रखने व गर्भावस्था में आराम करने के लिये शालिनी ने अपनी नौकरी से इस्तीफ़ा पहले ही दे दिया था। इस भीषण शारीरिक एवं मानसिक अवस्था में डॉ शालिनी को अपने पति का शव भारत ले जाना था… जो कि स्थिति को देखते हुए तुरन्त ले जाना सम्भव भी नहीं था…।

फ़िर 10 फ़रवरी 2010 को शालिनी ने एक पुत्र “वेदांत” को जन्म दिया, चूंकि डिलेवरी ऑपरेशन (सिजेरियन) के जरिये हुई थी, इसलिये शालिनी को कुछ दिनों तक बिस्तर पर ही रहना पड़ा…ज़रा इस बहादुर स्त्री की परिस्थिति के बारे में सोचिये… उधर दूसरे अस्पताल में पति का शव पड़ा हुआ है, दो वर्ष की बेटी की देखभाल, नवजात शिशु की देखभाल, ऑपरेशन की दर्दनाक स्थिति से गुज़रना… कैसी भयानक मानसिक यातना सही होगी डॉ शालिनी ने…

लेकिन रुकिये… अभी विपदाओं का और भी वीभत्स रुप सामने आना बाकी था…

1 मार्च 2010 को नज़रान (सऊदी अरब) की पुलिस ने डॉ शालिनी को अस्पताल में ही नोटिस भिजवाया कि ऐसी शिकायत मिली है कि “आपके पति ने मौत से पहले इस्लाम स्वीकार कर लिया था एवं शक है कि उसने अपने पति को ज़हर देकर मार दिया है”। इन बेतुके आरोपों और अपनी मानसिक स्थिति से बुरी तरह घबराई व टूटी शालिनी ने पुलिस के सामने तरह-तरह की दुहाई व तर्क रखे, लेकिन उसकी एक न सुनी गई। अन्ततः शालिनी को उसके मात्र 34 दिन के नवजात शिशु के साथ पुलिस कस्टडी में गिरफ़्तार कर लिया गया व उससे कहा गया कि जब तक उसके पति डॉ आशीष का दोबारा पोस्टमॉर्टम नहीं होता व डॉक्टर अपनी जाँच रिपोर्ट नहीं दे देते, वह देश नहीं छोड़ सकती। डॉ शालिनी को शुरु में 25 दिनों तक जेल में रहना पड़ा, ज़मानत पर रिहाई के बाद उसे अस्पताल कैम्पस में ही अघोषित रुप से नज़रबन्द कर दिया गया, उसकी प्रत्येक हरकत पर नज़र रखी जाती थी…। चूंकि नौकरी भी नहीं रही व स्थितियों के कारण आर्थिक हालत भी खराब हो चली थी इसलिये दिल्ली से परिवार वाले शालिनी को पैसा भेजते रहे, जिससे उसका काम चलता रहा… लेकिन उन दिनों उसने हालात का सामना बहुत बहादुरी से किया। जिस समय शालिनी जेल में थी तब यहाँ से गई हुईं उनकी माँ ने दो वर्षीय बच्ची की देखभाल की। शालिनी के पिता की दो साल पहले ही मौत हो चुकी है…

डॉ आशीष का शव अस्पताल में ही रखा रहा, न तो उसे भारत ले जाने की अनुमति दी गई, न ही अन्तिम संस्कार की। डॉक्टरों की एक विशेष टीम ने दूसरी बार पोस्टमॉर्टम किया तथा ज़हर दिये जाने के शक में “टॉक्सिकोलोजी व फ़ोरेंसिक विभाग” ने भी शव की गहन जाँच की। अन्त में डॉक्टरों ने अपनी फ़ाइनल रिपोर्ट में यह घोषित किया कि डॉ आशीष को ज़हर नहीं दिया गया है उनकी मौत सामान्य हार्ट अटैक से ही हुई, लेकिन इस बीच डॉ शालिनी का जीवन नर्क बन चुका था। इन बुरे और भीषण दुख के दिनों में भारत से शालिनी के रिश्तेदारों ने सऊदी अरब स्थित भारत के दूतावास से लगातार मदद की गुहार की, भारत स्थित सऊदी अरब के दूतावास में भी विभिन्न सम्पर्कों को तलाशा गया लेकिन कहीं से कोई मदद नहीं मिली, यहाँ तक कि तत्कालीन विदेश राज्यमंत्री शशि थरुर से भी कहलवाया गया, लेकिन सऊदी अरब सरकार ने “कानूनों”(?) का हवाला देकर किसी की नहीं सुनी। मनमोहन सिंह की नींद तब भी खराब नहीं हुई…

शालिनी ने अपने बयान में कहा कि आशीष द्वारा इस्लाम स्वीकार करने का कोई सवाल ही नहीं उठता था, यदि ऐसा कोई कदम वे उठाते तो निश्चित ही परिवार की सहमति अवश्य लेते, लेकिन मुझे नहीं पता कि पति को ज़हर देकर मारने जैसा घिनौना आरोप मुझ पर क्यों लगाया जा रहा है।

इन सारी दुश्वारियों व मानसिक कष्टों के कारण शालिनी की दिमागी हालत बहुत दबाव में आ गई थी एवं वह गुमसुम सी रहने लगी थी, लेकिन उसने हार नहीं मानी और सऊदी प्रशासन से लगातार न्याय की गुहार लगाती रही। अन्ततः 3 दिसम्बर 2010 को सऊदी सरकार ने यह मानते हुए कि डॉ आशीष की मौत स्वाभाविक है, व उन्होंने इस्लाम स्वीकार नहीं किया था, शालिनी चावला को उनका शव भारत ले जाने की अनुमति दी। डॉ आशीष का अन्तिम संस्कार 8 दिसम्बर (बुधवार) को दिल्ली के निगमबोध घाट पर किया गया… आँखों में आँसू लिये यह बहादुर महिला तनकर खड़ी रही, डॉ शालिनी जैसी परिस्थितियाँ किसी सामान्य इंसान पर बीतती तो वह कब का टूट चुका होता…

यह घटनाक्रम इतना हृदयविदारक है कि मैं इसका कोई विश्लेषण नहीं करना चाहता, मैं सब कुछ पाठकों पर छोड़ना चाहता हूँ… वे ही सोचें…

1) डॉ हनीफ़ और डॉ शालिनी के मामले में कांग्रेस सरकार के दोहरे रवैये के बारे में सोचें…


2) ऑस्ट्रेलिया सरकार एवं सऊदी सरकार के बर्ताव के अन्तर के बारे में सोचें…


3) भारत में काम करने वाले, अरबों का चन्दा डकारने वाले, मानवाधिकार और महिला संगठनों ने इस मामले में क्या किया, यह सोचें…


4) डॉली बिन्द्रा, वीना मलिक जैसी छिछोरी महिलाओं के किस्से चटखारे ले-लेकर दिन-रात सुनाने वाले “जागरुक” व “सबसे तेज़” मीडिया ने इस महिला पर कभी स्टोरी चलाई? इस बारे में सोचें…


5) भारत की सरकार का विदेशों में दबदबा(?), भारतीय दूतावासों के रोल और शशि थरुर आदि की औकात के बारे में भी सोचें…

और हाँ… कभी पैसा कमाने से थोड़ा समय फ़्री मिले, तो इस बात पर भी विचार कीजियेगा कि फ़िजी, मलेशिया, पाकिस्तान, बांग्लादेश, सऊदी अरब और यहाँ तक कि कश्मीर, असम, बंगाल जैसी जगहों पर हिन्दू क्यों लगातार जूते खाते रहते हैं? कोई उन्हें पूछता तक नहीं…
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विषय से जुड़ा एक पुराना मामला –

जो लोग “सेकुलरिज़्म” के गुण गाते नहीं थकते, जो लोग “तथाकथित मॉडरेट इस्लाम”(?)की दुहाईयाँ देते रहते हैं, अब उन्हें डॉ शालिनी के साथ-साथ, मलेशिया के श्री एम मूर्ति के मामले (2006) को भी याद कर लेना चाहिये, जिसमें उसकी मौत के बाद मलेशिया की “शरीयत अदालत” ने कहा था कि उसने मौत से पहले इस्लाम स्वीकार कर लिया था। परिवार के विरोध और न्याय की गुहार के बावजूद उन्हें इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार दफ़नाया गया था। जी नहीं… एम मूर्ति, भारत से वहाँ नौकरी करने नहीं गये थे, मूर्ति साहब मलेशिया के ही नागरिक थे, और ऐसे-वैसे मामूली नागरिक भी नहीं… माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई की थी, मलेशिया की सेना में लेफ़्टिनेंट रहे, मलेशिया की सरकार ने उन्हें सम्मानित भी किया था… लेकिन क्या करें, दुर्भाग्य से वह “हिन्दू” थे…। विस्तार से यहाँ देखें…http://en.wikipedia.org/wiki/Maniam_Moorthy

भारत की सरकार जो “अपने नागरिकों” (वह भी एक विधवा महिला) के लिये ही कुछ नहीं कर पाती, तो मूर्ति जी के लिये क्या करती…? और फ़िर जब “ईमानदार लेकिन निकम्मे बाबू” कह चुके हैं कि “देश के संसाधनों पर पहला हक मुस्लिमों का है…” तो फ़िर एक हिन्दू विधवा का दुख हो या मुम्बई के हमले में सैकड़ों मासूम मारे जायें… वे अपनी नींद क्यों खराब करने लगे?

बहरहाल, पहले मुगलों, फ़िर अंग्रेजों, और अब गाँधी परिवार की गुलामी में व्यस्त, “लतखोर” हिन्दुओं को अंग्रेजी नववर्ष की शुभकामनाएं… क्योंकि वे मूर्ख इसी में “खुश” भी हैं…। विश्वास न आता हो तो 31 तारीख की रात को देख लेना…।

डॉ शालिनी चावला, मैं आपको दिल की गहराईयों से सलाम करता हूँ और आपका सम्मान करता हूँ, जिस जीवटता से आपने विपरीत और कठोर हालात का सामना किया, उसकी तारीफ़ के लिये शब्द नहीं हैं मेरे पास…
(…समाप्त)


मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

मुस्लिम तुष्टिकरण

जिस देश का गृहमंत्री अपने ही देश के बहुसंख्यक समाज को आतंकवादी कहे जबकि वह उसी समाज का हिस्सा है, तो यह सोचना होगा कि वह कहीं मानसिक दिवालियेपन का शिकार तो नहीं हो रहे या फिर इसके पीछे उनका कोई स्वार्थ है। लेकिन इस दिवालियेपन का शिकार तो उस सरकार के मुखिया प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी है जिन्होंने उन लोगों को स्वायत्ताता अर्थात लगभग आजादी का आश्वासन दे दिया है जो भारत का तिरंगा जलाते है, भारत की फौज पर हमला करते है, भारत मुर्दाबाद के नारे लगाते है। किसी भी देश की सरकार के इस प्रकार के बयानो को क्या देशहित मे कहेंगे जो देश को पुन: विभाजन की और धकेल रहे है।

आजादी के समय से ही इस सोच का भारत में विकास होना शुरू हो गया था। वर्तमान सरकार के पितृपुरुष तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरुजी ने इसकी नींव कश्मीर में रखी थी। 20 अक्टुबर 1947 को पाकिस्तानी सेना व कबाईलियो ने कश्मीर पर कब्जा करने के लिये हमला किया महाराजा की सेना के मुस्लिम सिपाहियो ने पाक सेना के साथ चली गयी। पाकिस्तानी सेना के इस हमले का करारा जवाब हमारी फौजो ने देना ही शुरु किया था कि नेहरु जी ने आल इन्डिया रेडियों पर घोषणा कर दी कि भारतीय फौजे जहाँ है वही रुक जाये, हम शान्ति विराम की घोषणा करते है साथ ही जनमत संग्रह का आश्वासन कश्मीरी जनता को देते है। उनकी इस घोषणा के बाद कश्मीर का एक तिहाई क्षेत्र पाकिस्तान के कब्जे में चला गया। तबसे आज तक पाकिस्तान भारत पर निगाहे गढ़ाये बैठा है। हमारी सरकार ने भी कश्मीरियों को भारत से जोड़ने के नाम पर उस राज्य के अन्य क्षेत्र जम्मू और लद्दाख की इतनी उपेक्षा की जिसकी हद नहीं। जरा इन आंकड़ो का ध्यान करें :

- जम्मू कश्मीर राज्य का क्षेत्रफल 1947 में 2,22,236 वर्ग कि.मी. था जो आज घटकर 1,01,387 वर्ग कि.मी. रह गया है। आज पाकिस्तान ने 78,114 वर्ग कि.मी. व चीन ने 42735 वर्ग कि.मी भूमि पर कब्जा किया हुआ है। यह हमारी राजनैतिक कमजोरी का परिणाम है।

- जम्मू का क्षेत्रफल 26,293 वर्ग कि.मी., कश्मीर का क्षेत्रफल 15853 वर्ग कि.मी. व लद्दाख का क्षेत्रफल 59241 वर्ग कि.मी. है।

- जम्मू की जनसंख्या लगभग 25 लाख व कश्मीर की जनसंख्या 24 लाख के आसपास है इसमें से लगभग 5 लाख कश्मीरी पण्डित पूरे देश में विस्थापितों का जीवन बिता रहे है। दोनो क्षेत्रो की लगभग समान जनसंख्या होने के बावजूद 37 विधानसभा सीटे जम्मू में, 4 विधानसभा सीटे लद्दाख में व 46 सीटें कश्मीर में रखी गयी। इन नौ सीटो के अन्तर ने आज तक गैर कश्मीरी और गैर मुस्लिम को जम्मू कश्मीर राज्य का मुख्यमंत्री नहीं बनने दिया। क्या यह बगैर योजना के सम्भव है।

- जम्मू और लद्दाख के साथ यह भेदभाव अन्य क्षेत्रों में भी बरता गया है। जैसे राजस्व प्राप्ति जम्मू से 70 प्रतिशत व कश्मीर से 30 प्रतिशत होती है। लेकिन विकास के नाम पर जम्मू पर 28 प्रतिशत, लद्दाख पर 10 प्रतिशत व कश्मीर पर 62 प्रतिशत खर्च होता है।

- पूरे जम्मू में व्यवस्था देखने के लिये 4 कमिश्नर है जबकि कश्मीर में 31 कमिश्नर/सचिव है।

- रोजगार के नाम पर केवल 10 प्रतिशत कर्मचारी ही जम्मू से प्रशासनिक सेवाओं में है जबकि कश्मीर से 90 प्रतिशत।

- केन्द्र सरकार से सम्बन्धित सभी विभागों एवं 13 राज्य निगमों के मुख्यालय कश्मीर में है जिसमें सभी कर्मचारी कश्मीरी है।

इस तुष्टिकरण के बाद भी कश्मीर शांत नहीं है। कश्मीर घाटी का यह विवाद जिसका खामियाजा आज पुरा भारत आतंकवाद के रुप में भुगत रहा है, इसे प्रधानमंत्री स्वायत्ताता के नाम पर हवा दे रहे है। क्या यह भारत को पुन: विभाजन की और धकेलना नही है।

क्या यह तुष्टिकरण कभी रुकेगा जिसके अनुगामी केवल नेहरू गांधी वंशज ही नही अन्य नेता भी हो रहे है। मुस्लिम तुष्टिकरण के नाम पर शुरू हुये इस सत्ता के खेल ने आज हिन्दु समाज को भी भगवा आतंकवादी करार दे दिया है। कहीं इस तुष्टिकरण ने हिन्दु समाज को एक समुह मे इकठ्रठा कर दिया तो नेहरू गांधी वंशज व उनके विचार के अनुगामी नेता सोच ले उनका किया हश्र होगा।


बस एक सरदार (पटेल )चाहिए कश्मीर के लिये

कश्मीर में अब निर्णय की उम्मीद दिखेगी इस आस में हम २७ अक्टूबर १९४७ से प्रतिक्षारत है। पाकिस्तान ने अपनी फौज को छदम रूप में भेजकर उस समय तक अधर में लटके कश्मीर को हड़पने की साजिश रची थी। तब से लेकर आज तक कश्मीर की बीमारी दूर होने के बजाय कुछ ऐसे बढ़ी जैसे के ज्यों –ज्यों इलाज किया मर्ज बढाता ही गया। आजादी के पहले के कश्मीर राज्य का लगभग पैंतालीस प्रतिशत भारत के पास है। पैंतीस प्रतिशत नापाक, पाक के कब्जे में है और बचा हुआ लगभग बीस प्रतिशत चीन ने अवैध रूप से दबा रखा हैं। भारतीय कश्मीर के भी तीन भाग है ,जम्मू में हिंदुओं का बाहुल्य है तो लद्दाख में बौद्ध धर्म के अनुयायी बहुतायात में है और कश्मीर घाटी मुस्लिम बाहुल्य है।

पाक कश्मीर को छोड़े तो भारतीय हिस्से में भी तीन तरह की विचार धारा वाले लोग है। एक पक्ष भारत में ही रहना चाहता है ,दूसरा पक्ष पाकिस्तान के साथ अपना भविष्य उज्जवल देखता है वही तीसरा धड़ा कश्मीर को एक अलग राज्य के रूप में स्वतंत्र किये जाने की मांग करता है। इस त्रिकोण में कश्मीर के अच्छे लोग और पर्यटन का प्रमुख व्यवसाय घुट-घुट कर मरणासन्न स्तिथि में आ चुका है। ये अलगाववादी लोग और इनके कार्यकर्ता अपने आप को आतंकवादी के स्थान पर तथाकथित स्वतंत्रता सेनानी मानते है और ऐसा प्रचार भी करते है। अफज़ल गुरु को आज भी ये अतिवादी आतंकवादी नहीं मानते और उसे कश्मीर के कथित स्वतंत्रता की मुहिम का सिपाही प्रचारित करते है। इस विचारधारा से संघर्ष एक बड़ी चुनौती बन गया है।

सैंतालीस में महाराजा हरि सिंह के भारत में शामिल होने के निर्णय में २० अक्टूबर से २७ अक्टूबर तक का समय निकल गया और इतनी देर में पाक ने पैंतीस प्रतिशत भू-भाग पर कब्ज़ा कर लिया, जो सिद्धांत रूप से गलत है। क्योंकि महाराजा ने पूरे कश्मीर का विलय भारत में चाहा था, विभाजित कश्मीर का नहीं। इसके बाद धीरे–धीरे घाटी से मुस्लिमों के अतिरिक्त अन्य धर्मावलंबियों को छल से या बल से बाहर कर दिया गया। आज भी ऐसे कई परिवार है जो कश्मीर में अपनी जमीन–जायदाद छोड़कर देश के कई भागों में शरणार्थियों के रूप में जी रहें है।

भारत पाकिस्तान का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ था, और दुनिया में सिर्फ इस विभाजन को छोड़ दे तो सभी जगह भूमि के साथ जनता ने अपने को विभाजित किया है, बुल्गारिया –तुर्की ,पौलैंड –जर्मनी ,बोस्निया –सर्बिया सहित पाकिस्तान और बंगलादेश ने भी विभाजन के बाद अन्य धर्मों के लोगो को बाहर का रास्ता दिखा दिया या फिर पीड़ित और प्रताडित किया। घाटी में मुस्लिम आबादी की अधिकता को देखकर पाकिस्तान इस पर अपने दांत गडाये बैठा है ,तो हमारे धर्मनिरपेक्ष स्वरुप के कारण ये हमारे लिए भी प्रतिष्ठा की बात है। सैंतालीस से कारगिल तक और आज भी इस भूमि पर स्वामित्व का संघर्ष जारी है। लेकिन ये प्रतिष्ठा की लड़ाई अब तक ना जाने कितने ही मानव और अर्थ संसाधन लील चुकी है और नतीजा सिफर है। कश्मीर में कानून –व्यवस्था राज्य सरकार का जिम्मा है फिर केंद्र सरकारों को भी अपनी पूरी दम–ख़म का इस्तेमाल करना पड़ रहा है।

कश्मीर उस सोये हुए ज्वालामुखी के सामान हो गया है ,जो अचानक कभी भी फट पड़ता है और परेशानी इस बात की है कि कोई भी इसकी तीव्रता का अंदाज नहीं लग सकता। कांग्रेस और मुफ्ती सईद की पिछली सरकार के समय ये ज्वालामुखी लगभग शांत सा बना रहा और पर्यटकों ने फिर कश्मीर को अपने कार्यक्रमों में शामिल कर लिया था, लेकिन कांग्रेस के हिस्से की सरकार के दौरान अमरनाथ यात्रा से उपजे विवाद ने जो माहौल खराब किया,तब से लेकर अब तक दिन –ब –दिन हालात खराब होते जा रहें है और उसे उमर अब्दुल्ला की वर्तमान सरकार भी नहीं सम्हाल पा रही है। इस आग में घी का कम एक लेखिका के बयान ने कर दिया जो सदा ही नक्सलियों और अलगाववादियों के साथ है। ,इस बयान की ध्वनि और अलगाववादियों के सुर एक से लगते है, जो किसी भारतीय को ललकारते से प्रतीत हो रहें है। सर्व –दलीय संसदीय दल के दौरे के विफलता के बाद नियुक्त तीन वार्ताकारों से कुछ आस बंधी थी के ये गैर राजनीतिक लोग शायद कुछ कर सके पर अफ़सोस की ऐसा कुछ भी नहीं दिख रहा। इन नव नियुक्त वार्ताकारों का दल भी असफलता के पथ पर जाते दिख रहा है।

भारत में कम्युनिस्ट मांग कर रहें है के कश्मीर के लिए एक विधिवत गठित संसदीय समित हो जो कश्मीर और जम्मू में लोगों से बात करे साथ ही विशेष सेना शक्ति अधिनियम को वापस लिया जाये, क्यो कि इस अधिनियम की आड़ में सेना कथित रूप से मानव अधिकारों का हनन का करती है, यद्यपि ये अधिनियम उत्तर-पूर्व के राज्यों में भी लागू है। इस तरह से सरकार में शामिल दलों और विपक्षी दलों की सोच भी एकरूप नहीं है।

अमरीकी राष्ट्रपति की भारत यात्रा ने इस विवाद को और भी गरमा दिए है और कश्मीर के अलगाववादियों ने ओबामा से बहुत उम्मीद बांध रखी है। हुर्रियत कांफ्रेंस ने तो ब-कायदा ५ नवम्बर तक एक हस्ताक्षर अभियान भी चलाया है ,इन हस्ताक्षरों को ६ नवम्बर को दिल्ली में अमरीकी दूतावास को सौंपा जायेगा। इस अभियान के द्वारा हुर्रियत अमेरिकी प्रमुख से ये अपील करना चाहती है कि कश्मीर के मसले पर अमरीकी सोच में बदलाव आये और भारत पर ये दवाब बनाया जाये की कश्मीर में जनमत संग्रह कर वह के लोगो की राय के हिसाब से इस मामले को हल किया जाये।

इस समस्या ने इस मिथक को भी तोड़ दिया की विकास की योजनाओं और बुनियादी अवशक्ताओ की पूर्ति से किसी भी समस्या का हल ढूंढा जा सकता है, कश्मीर में वो सब प्रयास विफल रहे है। वो हाथ जो डल झील में नाव चलाते थे, अब पत्थर-बाजी में शरीक है।

इन स्थितियों में तो ऐसा लगता है काश आज सरदार पटेल के कद और राजनीतिक दृढता वाला कोई नेता देश में होता तो अब तक ये विवाद कब का हल हो गया होता। हम एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी बिना नतीजा तक इस समस्या को स्थानान्तरित तो कर ही चुके है। अब तो कोई कड़ा और कड़वा निर्णय ही कश्मीर समस्या का हल दे पायेगा। नहीं तो यह विवाद ऐसे ही धधकता रहेगा और हमारे बहुमूल्य संसाधनों को ईधन के रूप में डकारता रहेगा.

विनायक सेन, माओवाद और बेचारा जनतंत्र

डा. विनायक सेन- एक मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं, पढ़ाई से डाक्टर हैं, प्रख्यात श्रमिक नेता स्व.शंकरगुहा नियोगी के साथ मिलकर मजदूरों के बीच काम किया, गरीबों के डाक्टर हैं और चाहते हैं कि आम आदमी की जिंदगी से अंधेरा खत्म हो। ऐसे आदमी का माओवादियों से क्या रिश्ता हो सकता है ? लेकिन रायपुर की अदालत ने उन्हें राजद्रोह का आरोपी पाया है। आजीवन कारावास की सजा दी है। प्रथम दृष्ट्या यह एक ऐसा सच है जो हजम नहीं होता। रायपुर में रहते हुए मैंने उन्हें देखा है। उनके जीवन और जिंदगी को सादगी से जीने के तरीके पर मुग्ध रहा हूं। किंतु ऐसा व्यक्ति किस तरह समाज और व्यवस्था को बदलने के आंदोलन से जुड़कर कुछ ऐसे काम भी कर डालता है कि उसके काम देशद्रोह की परिधि में आ जाएं, मुझे चिंतित करते हैं। क्या हमारे लोकतंत्र की नाकामियां ही हमारे लोगों को माओवाद या विभिन्न देशतोड़क विचारों की ओर धकेल रही हैं? इस प्रश्न पर मैं उसी समय से सोच रहा हूं जब डा. विनायक सेन पर ऐसे आरोप लगे थे।

अदालत के फैसले पर हाय-तौबा क्यों-

अदालत, अदालत होती है और वह सबूतों की के आधार पर फैसले देती हैं। अदालत का फैसला जो है उससे साबित है कि डा. सेन के खिलाफ आरोप जो थे, वे आरोप सच पाए गए और सबूत उनके खिलाफ हैं। अभी कुछ समय पहले की बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें इसी मामले पर जमानत दी थी। उस जमानत को एक बड़ी विजय के रूप में निरूपित किया गया था और तब हमारे कथित बुद्धिजीवियों ने अदालत की बलिहारी गायी थी। अब जब रायपुर की अदालत का फैसला सामने है तो स्वामी अग्निवेश से लेकर तमाम समाज सेवकों की भाषा सुनिए कि अदालतें भरोसे के काबिल नहीं रहीं और अदालतों से भरोसा उठ गया है और जाने क्या-क्या। ये बातें बताती हैं कि हम किस तरह के समाज में जी रहे हैं। जहां हम अपनी संवैधानिक संस्थाओं को सम्मान देना तो दूर उनके प्रति अविश्वास पैदा कर न्याय की बात करते हैं। निशाना यहां तक कि जनतंत्र भी हमें बेमानी लगने लगता है और हम अपने न्यायपूर्ण राज्य का स्वर्ग माओवाद में देखने लगते हैं। देश में तमाम ऐसी ताकतें, जिनका इस देश के गणतंत्र में भरोसा नहीं है अपने निजी स्वर्ग रचना चाहती हैं। उनकी जंग जनतंत्र को असली जनतंत्र में बदलने, उसे सार्थक बनाने की नहीं हैं। उनकी जंग तो इस देश के भूगोल को तितर-बितर कर देने के लिए है। वे भारत को सांस्कृतिक इकाई के रूप में स्वीकार नहीं करते हैं। शायद इसी वैचारिक एकता के नाते अलग काश्मीर का ख्वाब देखने वाले अलीशाह गिलानी, माओ का राज लाने में लगे कवि बरवर राव और देश को टुकड़ों का बांटने की स्वप्नदृष्टा अरूंघती राय, खालिस्तान के समर्थक नेता एक मंच पर आने में संकोच नहीं करते। यह आश्चर्यजनक है इन सबके ख्वाब और मंजिलें अलग-अलग हैं पर मंच एक हैं और मिशन एक है- भारत को कमजोर करना। यह अकारण नहीं है मीडिया की खबरें हमें बताती हैं कि जब छत्तीसगढ़ में माओवादियों की एक महत्वपूर्ण बैठक हुयी तो उसमें लश्करे तैयबा के दो प्रतिनिधि भी वहां पहुंचे।

उनकी लड़ाई तो देश के गणतंत्र के खिलाफ है-

आप इस सचों पर पर्दा डाल सकते हैं। देश के भावी प्रधानमंत्री की तरह सोच सकते हैं कि असली खतरा लश्करे तैयबा से नहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से है। चीजों को अतिसरलीकृत करके देखने का अभियान जो हमारी राजनीति ने शुरू किया है ,उसका अंत नहीं है। माओवादियों के प्रति सहानूभूति रखने वाली लेखिका अगर उन्हें हथियारबंद गांधीवादी कह रही हैं तो हम आप इसे सुनने के लिए मजबूर हैं। क्योंकि यह भारतीय लोकतंत्र ही है, जो आपको लोकतंत्र के खिलाफ भी आवाज उठाने की आजादी देता है। यह लोकतंत्र का सौन्दर्य भी है। हमारी व्यवस्था जैसी भी है किंतु उसे लांछित कर आप जो व्यवस्थाएं लाना चाहते हैं क्या वे न्यायपूर्ण हैं? इस पर भी विचार करना चाहिए। जिस तरह से विचारों की तानाशाही चलाने का एक विचार माओवाद या माक्सर्वाद है क्या वह किसी घटिया से लोकतंत्र का भी विकल्प हो सकता है? पूरी इस्लामिक पट्टी में भारत के समानांतर कोई लोकतंत्र खोजकर बताइए ? क्या कारण है अलग- अलग विचारों के लोग भारत के गणतंत्र या भारतीय राज्य के खिलाफ एक हो जाते हैं। उनकी लड़ाई दरअसल इस देश की एकता और अखंडता से है।

मोहरे और नारों के लिए गरीबों की बात करना एक अलग बात है किंतु जब काश्मीर के आतंकवादियों- पत्थर बाजों, मणिपुर के मुइया और माओवादी आतंकवादियों के सर्मथक एक साथ खड़े नजर आते हैं तो बातें बहुत साफ हो जाती हैं। इसे तर्क से खारिज नहीं किया जा सकता कि घोटालेबाज धूम रहे हैं और विनायक सेन को सजा हो जाती है। धोटालेबाजों को भी सजा होनी चाहिए, वे भी जेल में होने चाहिए। किसी से तुलना करके किसी का अपराध कम नहीं हो जाता। अरूंधती की गलतबयानी और देशद्रोही विचारों के खिलाफ तो केंद्र सरकार मामला दर्ज करने के पीछे हट गयी तो क्या उससे अरूंधती का पाप कम हो गया। संसद पर हमले के आरोपी को सजा देने में भारतीय राज्य के हाथ कांप रहे हैं तो क्या उससे उसका पाप कम हो गया। यह हमारे तंत्र की कमजोरियां हैं कि यहां निरपराध लोग मारे जाते हैं, और अपराधी संसद तक पहुंच जाते हैं। किंतु इन कमजोरियों से सच और झूठ का अंतर खत्म नहीं हो जाता। जनसंगठन बना कर नक्सलियों के प्रति सहानुभूति के शब्दजाल रचना, कूटरचना करना, भारतीय राज्य के खिलाफ वातावरण बनाना, विदेशी पैसों के बल पर देश को तोड़ने का षडयंत्र करना ऐसे बहुत से काम हैं जो हो रहे हैं। हमें पता है वे कौन से लोग हैं किंतु हमारे जनतंत्र की खूबियां हैं कि वह तमाम सवालों पर अन्यान्न कारणों से खामोशी ओढ़ लेता है। वोटबैंक की राजनीति ने हमारे जनतंत्र को सही मायने में कायर और निकम्मा बना दिया है। फैसले लेने में हमारे हाथ कांपते हैं। देशद्रोही यहां शान से देशतोड़क बयान देते हुए घूम सकते हैं। माओ के राज के स्वप्नदृष्टा जरा माओ के राज में ऐसा करके दिखाएं। माओ, स्टालिन को भूल जाइए ध्येन आन-मन चौक को याद कीजिए।

विचारों की तानाशाही भी खतरनाकः

सांप्रदायिकता और आतंकवाद के नाम पर भयभीत हम लोगों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इस धरती पर ऐसे हिंसक विचार भी हैं- जिन्होंने अपनी विचारधारा के लिए लाखों लोगों को मौत के घाट उतारा है। ये हिंसक विचारों के पोषक ही भारतीय जनतंत्र की सदाशयता पर सवाल खड़े कर रहे हैं। आप याद करें फैसले पक्ष में हों तो न्यायपालिका की जय हो , फैसले खिलाफ जाएं तो न्यायपालिका की ऐसी की तैसी। इसे आप राममंदिर पर आए न्यायालय के फैसले से देख सकते हैं। पहले वामविचारी बुद्धिवादी कहते रहे न्यायालय का सम्मान कीजिए और अब न्यायालय के फैसले पर भी ये ही उंगली उठा रहे हैं। इनकी नजर में तो राम की कपोल कल्पना हैं। मिथक हैं। जनविश्वास और जनता इनके ठेंगें पर। किंतु आप तय मानिए कि राम अगर कल्पना हैं मिथक हैं तो भी इतिहास से सच्चे हैं , क्योंकि उनकी कथा गरीब जनता का कंठहार है। उनकी स्तुति और उनकी गाथा गाता हुआ भारतीय समाज अपने सारे दर्द भूल जाता है जो इस अन्यायी व्यवस्था ने उसे दिए हैं।

डा. विनायक सेन, माओवादी आतंकी नहीं हैं। वे बंदूक नहीं चलाते। अरूंधती राय भी नक्सलवादी नहीं हैं। अलीशाह गिलानी भी खुद पत्थर नहीं फेंकते। वे तो यहां तक नाजुक हैं कि नहीं चाहते कि उनका बेटा कश्मीर आकर उनकी विरासत संभाले और मुसीबतें झेले। क्योंकि उसके लिए तो गरीब मुसलमानों के तमाम बेटे हैं जो गिलानी की शह पर भारतीय राज्य पर पत्थर बरसाते रहेंगें, उसके लिए अपने बेटे की जान जोखिम में क्यों डाली जाए। इसी तरह बरवर राव भी खून नहीं बहाते, शब्दों की खेती करते हैं। लेकिन क्या ये सब मिलकर एक ऐसा आधार नहीं बनाते जिससे जनतंत्र कमजोर होता है, देश के प्रति गुस्सा भरता है। माओवाद को जानने वाले जानते हैं कि यह आखिर लड़ाई किस लिए है। इस बात को माओवादी भी नहीं छिपाते कि आखिर वे किसके लिए और किसके खिलाफ लड़ रहे हैं। बहुत साफ है कि उनकी लड़ाई हमारे लोकतंत्र के खिलाफ है और 2050 तक भारतीय राजसत्ता पर कब्जा करना उनका घोषित लक्ष्य है। यह बात सारा देश समझता है किंतु हमारे मासूम बुद्धिवादी नहीं समझते। उन्हें शब्दजाल बिछाने आते है। वे माओवादी आतंक को जनमुक्ति और जनयुद्घ जैसे खूबसूरत नाम देते हैं और चाहते हैं कि माओवादियों के पाप इस शब्दावरण में छिप जाएं। झूठ, फरेब और ऐसी बातें फैलाना जिससे नक्सलवाद के प्रति मन में सम्मान का भाव का आए यही माओवादी समर्थक विचारकों का लक्ष्य है। उसके लिए उन्होंने तमाम जनसंगठन बना रखे हैं, वे कुछ भी अच्छा नहीं करते ऐसा कहना कठिन है। किंतु वे माओवादियों के प्रति सहानुभूति रखते हैं और उन्हें महिमामंडित करने का कोई अवसर नहीं चूकते इसमें दो राय नहीं हैं। ये सारी बातें अंततः हमारे हमारे जनतंत्र के खिलाफ जाती हैं क्या इसमें कोई दो राय है।

”वर्णसंकर हिन्दु ही नकार सकता है राम का अस्तित्व”

सनातन धर्म हिन्दु समाज के रग-रग में बसे भगवान राम के बारे में शायद ही कोई अभागा व्यक्ति होगा जो नही जानता होगा कि भगवान राम कौन थे? उनकी जन्मस्थली किस जगह पर हैं? जो व्यक्ति सनातन धर्म हिन्दु समाज से नहीं हैं अर्थात जो अन्य देश या धर्मों से जुड़े हैं वही व्यक्ति श्रीराम के बारे में प्रश्न कर सकता हैं लेकिन जो इसी देश याने हिन्दुस्थान में पैदा हुआ है और जो हिन्दु समाज से ही ताल्लुक रखता हैं अगर वह व्यक्ति भगवान राम के अस्तित्व पर प्रश्न उठाता है तो मुझे उसके ही व्यक्तित्व पर शंका होती हैं कि वह कहीं वर्णसंकर प्रजाती से तो नहीं हैं? क्योकि सिर्फ वर्णसंकर हिन्दु ही भगवान राम के अस्तित्व को नकार सकता हैं, दुसरा कोई नहीं!

वर्णसंकर प्रजाति से होने वाले नुकसानों से भगवान श्रीकृष्ण ने भी श्रीमद्भगवत गीता के माध्यम से लोगों को सावधान किया हैं-

सक्ड.रो नरकायैव कुलन्घानां कुलस्य च ।

पतन्ति पितरो हयोषां तुप्तपिण्डोदकक्रिया:॥

दोषैरेतै: कुलन्घानां वर्णसंकर कारकै:।

उत्साद्यन्ते जातिधर्मा: कुलधर्माश्रच शाश्वता:॥

अर्थात-: वर्णसंकर सन्तानों की वृद्धि से निश्चय ही परिवार के लिए तथा परिवारिक परंपरा को विनष्ट करने वालों के लिए नारकिय जीवन उत्पन्न होता है ऐसे पतित कुलों के पुरखे (पीतर) नर्क में जाते है क्योकि उन्हे जल तथा पीण्ड दान देने की क्रियाएं समाप्त हो जाती है, जो लोग कुल परंपरा को विनष्ट करते है और इस तरह वर्णसंकर संतानों को जन्म देते है उनके दुष्कर्मों से समस्त प्रकार की समुदायिक योजनाएं तथा पारिवारिक कल्याण-कार्य विनष्ट हो जाते हैं। (भगवत्गीता 1.41-42)

वर्णसंकर या राक्षस वंश हर युग में भगवान के विरोधी रहे है इस कलयुग में भी अगर कोई असुरी शक्ति भगवान के अस्तित्व को चुनौती देती है तो यह कोई आश्चर्य वाली बात नहीं है यह तो हमेशा से होता आया है और आगे भी होगा। प्रकृति का नियम भी यही कहती हैं। इन्ही बातों से दैवीय या असुरी वंशजों (वर्णसंकर) की पहचान भी होती हैं।

असुरी शक्तियों द्वारा हर युग मे भगवान के अस्तित्व उनके निशान एवं पहचान को नष्ट करने की कुचेष्टा की गई हैं, ऐसा हमें अनेक धार्मिक ग्रंथ, शास्त्र-पुराणों में उदाहरण मिल जाएंगे, चाहे वह रावण हो या कंस, हिरंण्यकश्यप हो या भस्मासुर या और भी अनेंक असुरों द्वारा।

यही कुचेष्टा इस कलयुग में भी जारी है जैसे- महमूद गजनवी ने सोमनाथ के मंदिर को ध्वस्त किया, महमुद गोरी ने विक्रमादित्य द्वारा स्थापित किया मिहिरावली के मंदिर-संकुल को तोड़ा और उसकी छाती में अपनी जीत की निशानी मस्जिद कुत्वतुलइस्लाम खड़ी की, फिर मलिक कफुर ने अलाउद्दीन खीलजी के साथ मिलकर दक्षिण भारत में कहर बनकर टुटा और देवगीरि को दौलताबाद बनाता हुआ रामेश्वरम के ऐतिहासिक मंदिर को तोड़ा, बहमनी सुल्तानों ने विजय नगर में खुनी आतंक खेला जो हम्पी के खंडहर आज भी खड़ें गवाही दे रहे हैं, बाबर ने अयोध्या का भव्य राम जन्मभूमि को ध्वस्त किया, औरंगजेब ने काशी विश्वनाथ मंदिर और मथुरा के कृष्ण जन्मभूमि पर खड़े भव्य मंदिर को तोड़कर उस पर अपनी आसुरी विजय के प्रतीक मस्जिद और ईदगाह खडी की, निरंजन ठाकुर ने कामाख्या देवी के मंदिर को ध्वस्त किया तो सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह भी धनुष कोटी के रामसेतु को तोड़ने पर आमादा हैं। हमारे देश में आज भी इन आसुरी सम्राटों को मानने वालों की कमी नहीं है। जो आसुरी शक्ति हमारे ही राष्ट्र में आकर हम पर ही जुल्म ढाया, हमारी संस्कृति को नष्ट करने की चेष्टा की गई, हमारे अराध्य देवी देवताओं के प्रति अपशब्द एवं उनके अस्तित्व को मिटाने की कोशिश की गई और हम पर ही राज किया, उसके बाद भी जो लोग इन्हें पुज्य मानकर अपना आदर्श मानते है वे वर्णसंकर नहीं तो और क्या हो सकते हैं।

सत्ता का मद शासक को अंधा बनाकर सही और गलत का भेद मिटा देता है। द्वापर और त्रेता युग में रावण और कंस दोनों को राम और कृष्ण के बारे में पुरी सच्चाई मालुम था कि ये भगवान हैं, लेकिन फिर भी उन दोनों ने हमेशा ही अपनी सत्ता के अहम को पहली प्राथमिकता दी और नतीजतन अपने विनाश को ही आमंत्रित किया। यही हाल कलयुग में भी चाहे जितने सनातन धर्म के विरोधी शासक अपने हिन्दुस्थान में राज किया सभी ने सच्चाई जानते हुए भी भगवान के अस्तित्व को मिटाने की कोशिश की हैं, नतीजा वे खुद ही मिट गए। अब उसी रस्ते पर हिन्दुस्थान के वर्तमान सरकार भी चलने जा रही हैं। कहते हैं न ”विनाश काले विपरित बुद्धि।”