बुधवार, 29 सितंबर 2010

सावधान! कश्मीर खतरे में है

अगर एक झूठ हजार बार दोहराया जाए तो वही सत्य लगने लगता है. कुछ ऐसी ही स्थिति कश्मीर के साथ भी है. तथाकथित उदारवादियों, निहित स्वार्थों से युक्त अलगावादियों, मीडिया के एक विशेष वर्ग और छद्म मानवाधिकारवादियों तथा विभिन्न कूटनीतिक कारणों से युक्त अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा कश्मीर की स्थिति पर ऐसी रिपोर्टें, खबरें पेश की जाती हैं, जिससे यह साबित हो कि वहां कि जनता का भारत द्वारा दमन होता रहा है और जनमत भारत विरोधी रुख अख्तियार करता जा रहा है. यकीनन यह सब कुछ एक खास उद्देश्य से परिचालित होता है तो फिर मंतव्य स्पष्ट है कि करना क्या है.


कभी स्वर्ग का दूसरा रुप कहे जाने वाले कश्मीर की हालत आज नरक के दूसरे रुप की तरह हो चुकी है. घाटी में शांति बहाली के कोई आसार नजर आते नहीं दिख रहे. अभी हाल ही में प्रधानमंत्री ने एक सर्वदलीय बैठक बुलाई जिसमें भी कोई उचित परिणाम नजर नहीं आया. अब तो यह लगने लगा है कि कश्मीर की आवाम का एक हिस्सा अलगावादियों जैसा बर्ताव करने लगी है.


एक बहुत पुरानी कहावत है कि अगर लकड़ियों को आप अलग-अलग तोड़ेंगे तो वह जल्दी टूट जाएँगी और अगर उन्हीं लकड़ियों को आप एक साथ गठ्ठे के रुप में तोड़ेंगे तो नामुमकिन होगा. कश्मीर में भी यही हो रहा है जिस राज्य को हमारी सरकार ने पहले ही गठ्ठे से अलग कर दिया था आज वह टूटने की ओर अग्रसर है.


कश्मीर में किसी चीज की कमी नहीं है. केन्द्र सरकार द्वारा सबसे अधिक भत्ता और अन्य वित्तीय सहायता में विशेष रियायत से लेकर विशेष राज्य का दर्जा हर चीज हर सहूलियत कश्मीर को दी गई. जिस विशेष दर्जे को कश्मीर के लिए अमृत समझा गया था वह ही इसकी एकता के पतन का कारण बनती जा रही है.


कश्मीर मुद्दा कोई ऐसा मुद्दा नहीं है जिस पर हम खुले में बैठकर दस लोगों के साथ विचार- विमर्श कर लें क्योंकि यह कदम पहले उठाना था, अब तो वहां की जनता का एक हिस्सा ही अलगाववादियों का राग अलाप रही है. अलगाववादियों का असर ऐसा है कि वह चाहते हैं कि जनता किसी की ना सुने बस एकमत बनाए और जो भी करना है कर गुजरे, फिर चाहे वह भारत से अलग होना चाहे या पाकिस्तान में मिलना चाहे.


जम्मू-कश्मीर देश का एकमात्र मुस्लिम बहुल प्रांत है जहां इस्लाम के नाम पर आतंकवादियों ने स्थानीय नेताओं की मौन परस्त प्रत्यक्ष सहमति से हिंदुओं को अपमानित करके बाहर निकाल दिया है. श्रीनगर का तंत्र पूर्णत: सांप्रदायिक विद्वेष के आधार पर काम करता है. वहां लद्दाख के बौद्ध इतने संत्रस्त हैं कि उन्होंने श्रीनगर से मुक्ति के लिए लद्दाख को पृथक ‘केंद्र शासित प्रदेश’ बनाने का आंदोलन छेड़ा और स्थानीय शासन में बहुमत हासिल किया.


लेकिन यह सब होने के पीछे हमारे अपनों ने ही गलती की थी. नेहरू सरकार की नीति का असर है कि कश्मीर और भारत के हालात आज एक ही देश में, अपने ही एक राज्य में दो निशान, दो विधान और दो प्रधान की पद्धति जैसे हो गए हैं. आज तक देश नेहरू की कश्मीर नीति का नतीजा भुगत रहा है. देश में कश्मीर के पृथक एजेंडे के विरुद्ध असंतोष और गुस्सा है. वहां धारा 370 के कारण अलगाव को मजबूती मिली है. ‘पत्थरबाजी’ इसी का नतीजा है.


आज बहुत से लोग ये कह रहे हैं कि कश्मीर से सशस्त्र सेना विशेष अधिकार कानून को हटा लेना चाहिए शायद उन्हें इसके परिणाम का अंदाजा नहीं और यदि उन्हें मालूम है कि परिणाम क्या होगा तो इससे बड़ा धोखा राष्ट्र के क्या साथ होगा. सच तो यह है कि आज सशस्त्र सेना विशेष अधिकार कानून की वजह से ही जो वहां थोड़ी-बहुत शांति है वरना हालात और अधिक बिगड़ भी सकते हैं.


लोगों के आक्रोश की मूल वजह नेता और नेताओं द्वारा होने वाला शोषण है. अलगाववादियों ने इसी बात का फायदा उठाते हुए वहां के कुछ लोगों को अपने साथ मिला लिया और अपने कुछ लोगों को जनता में फैला कर ऐसा दिखाने की कोशिश की है कि जनता भी अब उनके साथ है.

एकता और मजबूत शासन की कमी को अगर दूर किया जाए तो कश्मीर में दुबारा शांति बहाली की जा सकती है.


कश्मीर घाटी को पूर्ण रुप से शांत रखने और भारत राष्ट्र के प्रति निष्ठा कायम करवाने के लिए एक साथ कई विकल्पों पर कार्य करने की आवश्यकता है. सबसे पहला और सबसे जरुरी तत्व है भारत विरोधी प्रचार माध्यमों और तत्वों पर किसी भी माध्यम से नियंत्रण कायम करना. झूठे प्रचार माध्यमों द्वारा फैलाए गए भ्रामक तथ्यों की काट पेश कर और सेना को विभिन्न शक्तियों से सुसज्जित कर इस तरह की गतिविधियों पर रोक लगाई जा सकती है. घाटी के विकास, बेरोजगारी-गरीबी दूर करके और बदहाल क्षेत्रों की तरफ विशेष ध्यान देकर जनता को अलगाववादियों के चंगुल से मुक्त करवाया जा सकता है.

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